Thursday, August 11, 2016

7> || 6कल्कि अवतार=( 1 to 1 )

7>||-6=कल्कि अवतार=( 1 to 1 )

1>महाभारत कथा : कल्कि अवतार कब होगा पृथ्वी पर? 


पुराणों में बताया गया है कि कलियुग का अंत करने भगवान कल्कि अवतरित होंगे। ऐसा कहा जाता है, वे एक सफेद घोड़े पर बैठ कर आएंगें। क्या सच में दिव्य अवतरण होगा? या फिर ये बस युग परिवर्तन का संकेत मात्र है?

प्रतिभागीः सद्‌गुरु, मैं युगों की अवधारणा को लेकर थोड़ा भ्रमित हूं। पुराणों में कहा गया है कि कलियुग में विष्णु का दसवां अवतार कल्कि के रूप में जन्म लेगा। क्या आप इसके बारे में और जानकारी दे सकते हैं?

सद्‌गुरु : कलियुग की आशय है ‘अंधकार का युग’; जैसा कि मैंने पहले कहा कि धरती को राशि मंडल की पूरी परिक्रमा करने या चक्कर लगाने में कुल 25,920 साल का समय लगता है। अगर आप इस चक्र को दो हिस्सों में बांटे तो इसमें चार युगों के दो दौर आएंगे, इस तरह से कुल आठ युग होंगे। इनमें से केवल कलियुग और सतयुग एक साथ जुड़े हुए हैं। इन में दो सतयुग और दो कलियुग बारी-बारी से आते हैं। जबकि अन्य दो द्वापर युगों के बीच में दो कलियुग और दो त्रेता युगों के बीच में दो सतयुग आते हैं।
कलियुग यानी ‘अंधेरे का युग’

कलियुग को जो चीज अलग करती है, वह है सौर मंडल और जिस ‘महा सूर्य’ के आस पास सौर-मंडल परिक्रमा कर रहा है, उसकी दूरी अपने चरम पर है। जितनी इन दोनों के बीच की दूरी बढ़ेगी, उतनी ही धरती पर इंसान की बुद्धिमानी या समझदारी कम होगी। चूंकि कलियुग में इन दोनों के बीच की दूरी सबसे ज्यादा होती है, इसलिए मानव बुद्धि अपने सबसे निचले स्तर पर होती है।

जब यह कहा गया कि ’कल्कि सफेद उड़न घोड़े पर आएगा’ तो उसका एक लाक्षणिक मतलब था। जहां कहने का आशय था कि जब युग बदलेगा तो रोशनी आएगी और अंधियारे को नष्ट करेगी।

अपनी चरम गिरावट पर होती है। जबकि उसके बाद आने वाले युगों में जैसे-जैसे सौर मंडल ‘महा सूर्य’ के करीब होता जाता है, मानवीय बुद्धिमत्ता निखरनी शुरू हो जाती है। यहां तक कहा गया है कि जैसे-जैसे धरती महा-सूर्य के करीब होती जाती है, वैसे-वैसे इंसान की इंसानी सिस्टम में विद्युतीय और चुंबकीय बल का प्रयोग करने की क्षमता बढ़ जाती है। दूरी बढ़ने पर क्षमता कम हो जाती है।

बुनियादी रूप से आपकी बुद्धिमत्ता इस पर निर्भर करती है कि आपके मस्तिष्क में स्नायु कोशिकाएं या नयूरोंस किस तरह से चटक अथवा खिल रहे हैं। अगर आप मस्तिष्क के काम करने की कृत्रिम आकृति पर नजर डालें तो आप देखेंगे कि यह वास्तव में बिजली से जगमगा/चमचमा रहा है। मस्तिष्क द्वारा विद्युतीय आवेश को उठा पाने की क्षमता से ही यह तय होता है कि आप कितनी अच्छी और सुस्पष्ट तरीके से सोच सकते हैं। सौर प्रणाली को संचालित करने वाले भौतिक नियमों पर गौर करें तो भौतिक शास्त्री हाल ही में इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि अब इंसानी मस्तिष्क के और ज्यादा विकसित होने की कोई गुंजाइश नहीं बची है। जबकि योगिक विज्ञान यह बात काफी लंबे समय से कहता आ रहा है। ऐसा इसलिए क्योंकि अगर आप न्यूरॉन का आकार बढ़ाएंगे तो मस्तिष्क और अधिक क्षमतावान तो होगा, लेकिन इसमें बहुत ज्यादा बिजली या विद्युत की खपत होगी।


फिलहाल आप यहां बैठे हुए हैं, आपकी कुल ऊर्जा का 20 फीसदी हिस्सा मस्तिष्क में खर्च हो रहा है। इसका मतलब हुआ कि यह शरीर का सबसे ज्यादा ऊर्जा खपत करने वाला अंग है। मान लीजिए कि आपका मस्तिष्क बड़ा हो गया तो आपको अपनी क्षमता से ज्यादा ऊर्जा देने की जरूरत होगी। दूसरी ओर अगर आप अपने न्यूरॉन का आकार बढ़ाने की बजाय उनकी संख्या बढ़ा लें तो आप उसी शक्ति में बेहतर काम कर सकते हैं। लेकिन अगर आप न्यूरॉन की संख्या बढ़ा लेते हैं तो अभी वे जिस तरह से संयोजित हैं, तब आप संकेतों की स्पष्टता को खोने लगेंगे। कई अति सक्रिय बच्चों में यही होता है, उनके मस्तिष्क में सामान्य बच्चों की अपेक्षा न्यूरॉन की संख्या ज्यादा होती है। वे लोग जबरदस्त मेधावी होते हैं, लेकिन उनमें बिखराव या अस्त-वयस्तता होती है। वे सीधा सोच ही नहीं सकते। उनकी सोच से कोई ठोस चीज निकल ही नहीं सकती, क्योंकि उसमें कोई स्पष्टता ही नहीं होती।

इसलिए न तो मस्तिष्क का आकार बड़ा होना काम करता है और न उसमें न्यूरॉन की बढ़ी हुई संख्या। वैज्ञानिकों का कहना है कि भौतिक नियमों के अनुसार मानव मस्तिष्क के लिए अब आगे और विकास कर पाना संभव नहीं है, लेकिन हम इसका बेहतर इस्तेमाल करना तो सीख ही सकते हैं। फिलाहल इंसान इसका इस्तेमाल बेहद औसत दर्जे से कर रहा है। अगर आप इसका इस्तेमाल विवेकपूर्ण ढंग से करेंगे तो आप अपने मस्तिष्क की क्षमता कई गुना बढ़ा सकते हैं।

योगिक विज्ञान ने बहुत पहले ही कह दिया था कि मानव मेधा और मानव शरीर अब आगे और अधिक विकास नहीं कर सकते, क्योंकि भौतिक नियम अपने चरम पर पहुँच चुके हैं। जिस तरह से धरती सूर्य के चारों तरफ घूमती है और जैसे चंद्रमा पृथ्वी की परिक्रमा करता है, उसी अनुपात में मानव शरीर अपनी पूर्ण संभावनाओं तक पहुँच गया है।

कलियुग को जो चीज अलग करती है, वह है सौर मंडल और जिस ‘महा सूर्य’ के आस पास सौर-मंडल परिक्रमा कर रहा है, उसकी दूरी अपने चरम पर है। जितनी इन दोनों के बीच की दूरी बढ़ेगी, उतनी ही धरती पर इंसान की बुद्धिमानी या समझदारी कम होगी।

यह अब आगे और नहीं बढ़ सकता, लेकिन इसी के साथ योगिक विज्ञान यह भी कहता है कि कुछ चीजें करके आप अपने मस्तिष्क को इस्तेमाल करने की अपनी क्षमता बढ़ा सकते हैं। इनमें से एक चीज ब्रह्मचर्य है। इसके जरिए आप इतनी क्षमता और ऊर्जा विकसित कर लेते हैं कि अगर आपके शरीर में 10 या 25 मस्तिष्क भी होते तो यह उन सभी को शक्ति प्रदान कर सकता था। अगर आप चाहें तो अपने भीतर आवश्यक ऊर्जा पैदा कर, कुंडलिनी को जगा कर, अपनी ऊर्जाओं को उनकी पूरी क्षमताओं व ताकत तक लाकर आप अपने आसपास के एक हजार दिमाग तक को शक्ति दे सकते हैं।

कल्कि अवतार कब होगा?

कहा गया है कि कलियुग के अंत में कल्कि का जन्म होगा। दरअसल, समय की प्रकृति ही कुछ ऐसी है कि न तो उसे शुरू करने की जरूरत होती है और न ही खत्म करने की। यह अपने आप आगे बढ़ता रहता है। अगर आपके जीवन में कुछ भी घटित न हो तो भी समय अपने हिसाब से गुजरेगा। सिर्फ यही चीज है, जिसकी आप गांरटी ले सकते हैं। मान लीजिए कि आपको वरदान मिल जाए और आप अमर हो जाएं, फिर भी आप वक्त को गुजरने से नहीं रोक सकते। इसलिए युग को शुरू करने या खत्म करने के लिए किसी की कोई जरूरत नहीं है। जब यह कहा गया कि ’कल्कि सफेद उड़न घोड़े पर आएगा’ तो उसका एक लाक्षणिक मतलब था। जहां कहने का आशय था कि जब युग बदलेगा तो रोशनी आएगी और अंधियारे को नष्ट करेगी।
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Saturday, February 20, 2016

6> गाय चोरी करने के चलते भीष्म+भीष्म ने कृष्ण को कर दिया था मजबूर प्रतिज्ञा तोड़ने+द्रौपदी से अधिक प्रेम करता था+Draupadi from Mahabharat

6>|| *गाय चोरी करने के चलते भीष्म***( 1 to 6 )

1>गाय चोरी करने के चलते भीष्म को भुगतनी पड़ी थी ये यातना!
2>==भीष्म ने कृष्ण को कर दिया था मजबूर प्रतिज्ञा तोड़ने के लिए!
3>=वो कौन है जो द्रौपदी से अधिक प्रेम करता था ?
4>==Draupadi from Mahabharat could have 14 husbands instead of 5
5>भीष्म ने युधिस्ठर को बताई थी चार महत्वपूर्ण बाते, जिनसे अकाल मृत्यु को भी टाला जा सकता है !
6>क्यों थे भीष्म पितामह एक अजेय योद्धा?
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1>गाय चोरी करने के चलते भीष्म को भुगतनी पड़ी थी ये यातना!
मरने से पहले भीष्म ने अपने लिए सिरहाने की मांग की तो अर्जुन ने बाणो से सिरहाने भी बना दिया, मुंह में तुलसी का पत्ता रखा और गंगा जल माँगा तो अर्जुन ने बाण छोड़ सीधी गंगा की धार उनके मुंह में पहुंचा दी. जब प्राण निकल रहे थे तो युधिष्ठिर को बुला उन्होंने विष्णुसहश्त्र नाम ( जो उनके द्वारा ही रचित था) सौंपा और चल बसे.
महाभारत के सबसे तकड़े चरित्रों में से एक थे लेकिन सवाल ये है की उनकी ये दुर्गति क्यों हुई क्यों उन्हें ये कष्ट भोगना पड़ा, जानने के लिए उनके पिछले जन्म में जाना पड़ेगा. हमारे शास्त्रो में अष्ट वसुओ का वर्णन, वो एक दिन वशिष्ठ ऋषि के आश्रम गए और कामधेनु को देख उनका जी ललचा गया.
उनमे से एक प्रभास ने उसे चोरी करने का निर्णय किया जिसमे बाकि सभी ने सहायता की लेकिन पकडे गए, तब उन्हें श्राप में मनुष्य जन्म भुगतना था. जब सब ने क्षमा मांगी तो बाकि 7 को जन्मते ही मुक्ति मिली लेकिन प्रभास को चिर आयु तक जीवन मिला वो ही भीष्म थे.

परशुराम ने उन्हें युद्ध कला तो इंद्र ने अश्त्र दिए, मार्कण्डेय ने उन्हें चीर यौवन तो बाकि सब ने राजपथ और राजनीती की शिक्षा दी थी. महाभारत के युद्ध में वो रोज दस हजार सैनिको और एक हजार घुड़सवारों को मारते थे, पांडवो से स्नेह के कारण वो उन्हें नही मार रहे थे.
इस पर दुयोधन ने उन बुरा भला कहा तो उन्होंने प्रण किया की या तो वो कल अर्जुन को मार देंगे या फिर कृष्ण की हथियार न उठाने की प्रतिज्ञा तुड़वा देंगे. अर्जुन शक्तिशाली था पर उन्हें सामने कुछ न था, उन्होंने अर्जुन को पछाड़ दिया और जैसे ही मारने लगे तो कृष्ण ने रथ का पहिया उठा लिया जो उनकी प्रतिज्ञा के विपरीत था.
तब अर्जुन कृष्ण के कहने पर रात में उनक शिविर में गया और उनकी मौत का करक पूछने लगा तो शिखंडी का समाधान मिला. उनके जीवित रहते धरती पे उनके समाल कोई पराक्रमी नही था और उनके रहते पांडवो का जीवित रहना भी नामुनकिन था, ऐसे भीष्म तब दुनिया से मुक्त ब्रह्म लोक में चले गए.
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2>==भीष्म ने कृष्ण को कर दिया था मजबूर प्रतिज्ञा तोड़ने के लिए!


बात तब की है जब महाभारत के युद्ध के लिए अपनी तरफ से लड़ने के लिए कौरव और पांडव समर्थन जूता रहे थे, द्वारका के राजा कृष्ण के पास दोनों ही पहुंचे पर दुर्योधन अर्जुन से पहले पहुँच गया.


पहले पहुँचने के चलते कृष्ण ने उसे पहले मांगने का अवसर दिया और अपने समर्थन के दो हिस्से किये एक तरफ तो कृष्ण की पूरी अक्षोणी सेना थी तो दूसरी तरफ कृष्ण अकेले निहत्थे.


दोनों ही मित्र पक्ष होने के कारण कृष्ण ने प्रतिज्ञा की के वो युद्ध के दौरान शास्त्र नही उठाएंगे, ऐसे में लोभ वष दुर्योधन ने कृष्ण की सेना का समर्थन ही मांग लिया निहत्थे कृष्ण उसके किस काम के थे. इस पर कृष्ण मुस्कुराये और अर्जुन ने तब कृष्ण को अपने सारथि के रूप में मांग लिया, जब दुर्योधन हस्तिनापुर पहुंचा तो शकुनि ने उसे बहुत दुत्कारा और कहा की कृष्ण निहत्था ही सब पे भारी पड़ेगा.


लेकिन जब युद्ध का तीसरा दिन शुरू हुआ और भीष्म ने गरुड़ व्यूवरचना से पांडवो को घेरा तो सारी पांडव सेना और मित्र देश के राजा भाग खड़े हुए, अर्जुन पितामह से प्रेम वश उनपे पूरी शक्ति से हमला नही कर रहा था और इस कारन भीष्म और उग्र थे उन्होंने कृष्ण अर्जुन पे वाणो की ऐसी वर्षा की के दोनों घायल हो गए.


तब पर भी अर्जुन को क्रोध न आया और उसका मोह न टुटा तो कृष्ण ने अपनी प्रतिज्ञा तोड़ते हुए सुदर्शन चक्र उठा लिया और भीष्म और कौरवो की तरफ ऐसे बढे की कौरवो में जान का भय पैदा हो गया.


हालाँकि भीष्म विचलित नही हुए और अपने हथियार डाल के कृष्ण के आगे नतमस्तक हो गए और उन्हें नमस्कार किया, बोले आज मेरा पुरुषार्थ सिद्ध हो गया मैंने स्वयं भगवन को अपनी प्रतिज्ञा तुड़वाने पर विवश कर दिया.

इतने में अर्जुन पीछे से दौड़ते हुए आया और कृष्ण से माफ़ी मांगी और अपनी प्रतिज्ञा न तोड़ने की गुहार की और तब जाके कृष्ण का क्रोध शांत हुआ, तब से अर्जुन कुछ लोहा लेने लगा लेकिन कृष्ण के विराट स्वरुप दिखा गीता ज्ञान देने के बाद ही वो भीष्म को मार पाया.
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3>=वो कौन है जो द्रौपदी से अधिक प्रेम करता था ?

आप सभी जानते है कि पांचाल राज्य की राजकुमारी द्रौपदी का स्वयंवर अर्जुन अर्जुन के साथ हुआ था जबकि माता कुंती की आज्ञा के कारण ही द्रौपदी को पांचों पांडवों से शादी करनी पड़ी। और नियमानुसार द्रौपदी हर भाई के साथ कुछ समय तक ही रहती थी।


जब एक भाई द्रौपदी के कक्ष में रहता था तो अपने जूते को कक्ष के बाहर छोड़ देता था जिससे कि कोई भी दूसरा भाई द्रौपती के कमरे में आ नहीं सके। और एक बार जब युधिष्ठिर द्रौपदी के साथ में थे तब गलती पूर्वक अर्जुन उनके कक्ष में पहुंच गए लेकिन बाहर खुले जूते कुत्ता लेकर भाग गया था।

एवं अर्जुन को इसका दंड मिला और उसे जंगल में रहना पड़ा। अर्जुन को वन में जाने से द्रौपदी को बहुत दुःख हुआ परन्तु द्रौपदी के सबसे अधिक प्रेमी अर्जुन नहीं थे। कुछ घटनाएं ऐसी घटी थी कि जिनसे ऐसा पता चलता है द्रौपदी का सबसे बड़ा प्रेम करने वाला था तो वो भीम थे।

आपको बता दे कि महाभारत में एक घटना यह भी है कि दुर्योधन ने एक सोची समझी साजिश रची जिसमें युधिष्ठिर को जुआ खेलने के लिए बुलाया। और दुर्योधन ने धोके से युधिष्ठिर को जुए में हरा दिया। दुर्योधन के बहुत अधिक उकसाने पर युधिष्ठिर ने जुए में एक-एक करके अपने सभी भाइयों को जुए में लगा दिया और हार गए।

और अंत में युधिष्ठिर ने द्रौपदी को भी दाव पर लगाया। तभी द्रौपदी को दांव पर लगाने पर सबसे अधिक क्रोधित भीम ही हुए थे एवं युधिष्ठिर से बहस भी किया था।


भीम की नहीं मानने पर जब युधिष्ठिर द्रौपदी को जुए में हार गए और दुश्‍शासन द्रौपदी को बालों से पकड़कर भरी सभा में ले आया तो भीम अपने गुस्से को काबू नहीं रख सका और उसी वक्त प्रतिज्ञा ले ली कि दुश्शासन की छाती का खून पीहुँगा । महाभारत के युद्ध के समय भीम ने अपनी प्रतिज्ञा को पूरा किया था।


जुए में हार जाने के बाद पाण्डवों को बारह वर्ष का वनवास और एक साल का अज्ञातवास मिला। अज्ञातवास के वक्त पाण्डव राजा विराट के यहां पर अपना भेष बदलकर रहे। राजा विराट का साला कीचक द्रौपदी को देखते ही कामाशक्त हो गया था।


कीचक ने द्रौपदी को रात के वक्त अपने कमरे में बुलाया। और यह बात जब द्रौपदी ने भीम को बताई तो भीम ने कीचक को मौत देने का संकल्प लिया और रात के समय द्रौपदी की जगह खुद कीचक के कक्ष में पहुंच गए।

द्रौपदी समझकर जैसे ही कीचक ने हाथ लगाया। भीम ने कीचक को उठाकर पटक दिया। और दोनों के बीच युद्ध होने लगा और भीम ने कीचक को मर दिया।


भीम द्रौपदी से काफी प्यार करते थे कि उन्हें द्रौपदी का कोई भी अपमान करे पसंद नहीं था। द्युत खेल के समय जब जुए में युधिष्ठिर सब कुछ हार चुके थे और द्रौपदी को दुश्शासन ने सभा में खींचकर लाया था उस समय भीम गुस्से से आग बबूला हो रहे थे।

ऐसे वक्त में दुर्योधन ने अपनी जंघ पिटकर द्रौपदी को जंघा पर बैठने के लिए कहा था। भीम से द्रौपदी का अपमान सहन नहीं हुआ और भीम ने दुर्योधन को ललकारते हुए कहा कि युद्ध में मैं तुम्हारी जंघा तोड़कर ही द्रौपदी के अपमान का बदला लूंगा।

महाभारत युद्ध के अंतिम में जब भीम और दुर्योधन का युद्ध हुआ तभी भीम ने द्रौपदी के अपमान का बदला ले लिया।

और भीम के प्यार की दास्तान चौथी घटना उस समय हुई जब पाण्डव अपना राज पाट परीक्षित को सौंपकर स्वर्ग के लिए चले। स्वर्ग की यात्रा बहुत ही कठिन और दुःखदायी थी। इस यात्रा के समय भीम ने द्रौपदी का सबसे ज्यादा ध्यान रखा।

यात्रा करते हुए जब पाण्डव ब्रदीनाथ पहुंचे और वहां से आगे चले तो सरस्वती नदी के उद्गम स्थल पर नदी को पार करना द्रौपदी के लिए बहुत कठिन हो गया था। एवं ऐसे समय में भीम ने एक बड़ा सा चट्टान उठाकर नदी के बीच में रख दिया।


द्रौपदी इस चट्टान पर चढ़कर सरस्वती नदी पार कर गई। और यह चट्टान आज भी माणा गांव में सरस्वती नदी के उद्गम पर दिखता है। जिसे भीम पुल कहा जाता है।


स्वर्ग की यात्रा के लिए जब पाण्डव बद्रीनाथ से आगे निकले तो हिमालय के बर्फीले क्षेत्र में एक एक कदम आगे बढ़ाना कठिन हो गया था। पांचों पाण्डव जैसे तैसे बढ़ रहे थे और अचानक नकुल, सहदेव फिसल कर खाई में गिर गए और सशरीर स्वर्ग में नहीं जा सके।

जब भीम, अर्जन, युधिष्ठिर और द्रौपदी बचे तब द्रौपदी भीम का सहारा लेकर चलने लगी पर द्रौपदी भी ज्यादा दूर नहीं चल सकी और वह भी गिरने लगी। ऐसे वक्त में भीम ने द्रौपदी को संभाला।

इसी समय द्रौपदी ने कहा था कि सभी पांचो भाइयो में भीम ने ही मुझे सबसे अधिक प्रेम किया है और मैं अगले जन्म में दुबारा भीम की धर्मपत्नी बनना चाहूंगी। इसके कुछ समय बाद द्रौपदी ने भी इन सभी का साथ हमेशा के लिए छोड़ कर चली गयी।
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4>==Draupadi from Mahabharat could have 14 husbands instead of 5

Draupadi, the wife of five Pandavas, had an eventful life. She was born when Draupad performed yagya to take revenge from Drona. She was born along with Dhrishtdyumna, who fought the war of Mahabharat with

Pandavas.

Draupadi’s 14 husbands wish granted by Lord Shiva
She became the wife of all Pandavas not by an accident, but by design. Lord Krishna explained to her that she prayed to Lord Shiva to grant her a husband with 14 desired qualities. Shiva, pleased with her devotion, told her that it would be very difficult to get a husband with 14 qualities that she desired. But she insisted. Lord Shiva finally accepted her wish and granted her 14 husbands in her next birth. Draupadi asked for these qualities in her previous birth. In her previous birth she was Nalayani – daughter of Nala and Dmayanti.

Was her wish a curse or boon for her?
She queried Lord Shiva was this a boon or curse? Shiva promised that she would regain her virginity each morning when she took bath as a boon to her.

The 14 qualities Draupadi desired

The 14 qualities that Draupadi wanted were available in 5 Pandavas. The just Yudhisthar for his wisdom of Dharma; the powerful Bheem for his strength that exceeded that of a thousand elephants combined; the valiant Arjun for his courage and knowledge of the battlefield; the exceedingly handsome Nakul and Sahdeva for their love.
Draupadi was presented a magical bowl
Draupadi had a wooden bowl, which would always be filled with food. This bowl was presented to her, while the Pandavas were on an exile. The bowl helped the Pandavas to survive in forest.

Karna could be Draupadi’s husband

Draupadi refused participation of Karna in swayamvar. She refused to be the wife of Suta-Putra (son of a charioteer). Karna too could have won the competition.
Draupadi responsible for Mahabharat war

The seeds of Mahabharat war were sown by Draupadi. It is said that Draupadi once said about Duryodhan that blind’s sons are also blind.

Draupadi’s 5 avatars

According to Narad Purana and Vayu Purana, Draupadi is the composite avatar of Goddess Shyamala (wife of Dharma), Bharati (wife of Vayu), Shachi (wife of Indra), Usha (wife of Ashwins) and Parvati (wife of Shiva).

In earlier avatars, she did assume important avatars. The first time was as Vedavati who cursed Raavan. She then came in place of Sita’s avatar, to be the cause of Raavan’s death, while agni hid the real Sita.

Her third incarnation was partial either Damayanti or her daughter Nalayani. She married sage mudgala. The fifth avatar was Draupadi herself.
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5>भीष्म ने युधिस्ठर को बताई थी चार महत्वपूर्ण बाते, जिनसे अकाल मृत्यु को भी टाला जा सकता है !

हर किसी के जन्म से पूर्व ही उसके मृत्यु का निर्धारण हो जाता है इसमें वह कुछ भी नहीं कर सकता क्योकि यही सृष्टि का नियम है. जो इस मृत्युलोक में जन्म लेगा एक न एक दिन उसकी मृत्यु होना तय है. परन्तु प्रसिद्ध हिन्दूधर्म ग्रन्थ महाभारत के अनुसार यह बताया गया है की मनुष्य में इतना सामर्थ्य होता है की वह अपने आचरण से अपने भाग्य को बदल सकता है.
जब कुरुक्षेत्र में महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ तब युधिस्ठर हस्तिनापुर का राजा बनने के बाद तीरो के शैय्या में लेटे भीष्म पितामह से ज्ञान लेने आये. तब भीष्म पितामह ने राजा युधिस्ठर को चार बहुत ही अनमोल एवं महत्वपूर्ण बात बताई जिन्हे यदि कोई मनुष्य अपने आचरण में अपना ले तो वह न केवल अपने भाग्य को बदल सकता बल्कि अपने अकाल मृत्यु को भी मात दे सकता है. आइये जानते है उन चार बातो को जिन्हे अपनाकर आप भी अपनी मृत्यु को टाल सकते हो.

हिंसा का त्याग कर :-

यदि कोई मनुष्य हिंसा का त्याग कर अहिंसा को अपने जीवन में अपना ले तो वह व्यक्ति अपने सम्पूर्ण जीवन में सदैव सुखी रहेगा. किसी को पीटना , किसी के साथ मारपीट करना या किसी के साथ हिंसा करना इस प्रकार के व्यक्ति ऐसा कर दूसरों को तो चोट पहुंचाते है साथ ही वे खुद भी इस के चपेट में आ जाते है और अपने आप को नुकसान पहुंचा बैठते है.

जो व्यक्ति सदैव दूसरे के साथ प्रेम पूर्वक व्यवहार करता है तथा दूसरों के मदद के लिए सदैव त्तपर रहता है ऐसे व्यक्ति हमेशा भगवान को प्रिय होते है तथा वे उनकी रक्षा करते है. इस प्रकार के गुण को अपनाने वाले व्यक्ति की आयु निश्चित ही लम्बी होती है. पुराणों और धर्म ग्रंथो में अहिंसा को मनुष्य का परम धर्म बताया गया है अतः हमे इन तीनो (मन, वचन, कर्म) प्रकार के हिंसा से सदैव बचकर रहना चाहिए. मन से हिंसा का अभिप्राय किसी के बारे में बुरे विचार सोचने से है, वचन से अभिप्राय दूसरे के बारे में बुरा बोलने व कर्म से अभिप्राय किसी को शारीरिक कष्ट पहुंचाने से है.
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6>क्यों थे भीष्म पितामह एक अजेय योद्धा?
भीष्म की शक्ति

इसी के आधार पर उन्होंने सारे नियम बनाए। उन्होंने दैनिक जीवन के सरल नियमों को भी अपनी चरम प्रकृति तक पहुंचने का सोपान बना लिया। भीष्म ने इतनी भीषण प्रतिज्ञा कर डाली, उनकी प्रतिज्ञा को हम भीषण इसलिए नहीं कहते क्योंकि वह ब्रह्मचारी बन गए या सारा राजपाट त्याग दिया, उनकी व्यक्तिगत असुविधा या क्षति के लिए भी हम उसे भीषण नहीं कहते बल्कि इसलिए कहते हैं क्योंकि वह जिस कुरुवंश और देश से इतना प्रेम करते थे, उन्होंने उसे दांव पर लगा दिया। जो चीज उनके लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण थी, उन्होंने उसे ही दांव पर लगा दिया और कहा कि यही उनका धर्म और मोक्ष प्राप्ति का रास्ता है।

जैसे-जैसे हम महाभारत की कहानी में आगे बढ़ते हैं, आपको तमाम ऐसी परिस्थितियां दिखाई देती हैं, जहां भीष्म लगभग अतिमानव या सुपरमैन नजर आते हैं। यदि कोई मनुष्य अपने भीतर मौजूद जीवन के बीज को रूपांतरित करने के लिए तैयार है, वह कोशिका जो एक और मनुष्य के निर्माण में समर्थ है, उसे वह जीवन शक्ति में रूपांतरित करने के लिए तैयार है, तो वह परमाणु बल की तरह शक्तिशाली हो जाता है। आपको पता ही है एक परमाणु कितनी ऊर्जा पैदा कर सकता है।

कई बार लोगों ने कहा कि वे भीष्म से नहीं लड़ सकते क्योंकि वह एक ब्रह्मचारी हैं। वे उन्हें नहीं मार सकते थे क्योंकि उन्होंने अपने शरीर के हर बीज को एक जीवनी शक्ति में रूपांतरित कर दिया था, जिसके कारण वह अपनी इच्छा से मृत्यु को प्राप्त कर सकते थे। इसीलिए कहा गया था कि भीष्म के पास अपनी मृत्यु का समय चुनने की शक्ति थी। वह अनश्वर या अमर नहीं थे, मगर वह अपनी मृत्यु का समय और स्थान चुन सकते थे, जो एक तरह से अमरता की तरह ही है। अमरता एक अभिशाप की तरह है। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि अगर आपको हमेशा के लिए जीना पडे, तो यह आपके लिए कितनी बड़ी यातना होगी? तो अमरता तो एक अभिशाप है, लेकिन अपनी इच्छा से मरने का विकल्प एक वरदान है।
महाभारत – अपने समय से काफी आगे

यह अपनी ऊर्जा और प्रकृति की ऊर्जा का लाभ उठाने की एक प्रक्रिया है। महाभारत में दूसरा उदाहरण अस्त्र हैं, जो शक्तिशाली हथियार होते थे। कहा जाता था कि अस्तित्व के सबसे छोटे कण को युद्धभूमि में सबसे बड़ी शक्ति बनाया जा सकता था। यह परमाणु बम की तरह लगता है, हालांकि वे उस समय भी तीर-धनुषों का प्रयोग करते थे। कुछ अस्त्रों के असर के बारे में बताते हुए ऐसी बातें कही गईं कि ‘चाहे आप इस अस्त्र से पूरी दुनिया को नष्ट न करें, गर्भ में मौजूद शिशु तब भी झुलस जाएंगे।’ यह भी परमाणु हथियारों के असर जैसा लगता है।

या तो उनके पास बहुत ही शानदार कल्पनाशक्ति थी, या उनके पास वाकई इस तरह का ज्ञान था। क्या उनके पास इस तरह के हथियार थे, क्या उन्होंने ऐसे हथियार कहीं देखे थे या किसी ने कहीं से आकर उन्हें ये बातें बताई थीं? यह हम नहीं जानते मगर आपको एक खास जागरूकता और सतर्कता के साथ इस कहानी को देखना चाहिए। यह कहानी कुछ लोगों की लड़ाई की या किसी व्यक्ति के राजपाट, पत्नी या बच्चे की इच्छा की नहीं है। इस कहानी के कई आयाम हैं।
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5>पांडवोंकेस्वर्गारोहण+भीष्मने युधिष्ठिर को बताई सेक्स+युधिष्ठिर का स्त्री जाति को श्राप+गंगापुत्र की हत्याअर्जुन को पुत्र के हाथो मौत

5>|| *पांडवों के स्वर्गारोहण***( 1 to 4 )

1>-------------------पांडवों के स्वर्गारोहण की कथा
2>-------------------भीष्म ने युधिष्ठिर को बताई सेक्स से जुड़ी एक अनूठी बात, जाने
3>-------------------युधिष्ठिर का स्त्री जाति को श्राप
4>-------------------गंगापुत्र की हत्या के बदले अर्जुन को मिली पुत्र के हाथो मौत
5>------------------एक बार अर्जुन को अहंकार हो गया 
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1>पांडवों के स्वर्गारोहण की कथा


महाभारत से सम्बंधित पिछले लेख में हमने आपको बताया था की कैसे श्रीकृष्ण सहित पुरे यदुवंश का नाश हो जाता है तथा साथ ही द्वारका नगरी भी समुद्र में डूब जाती है। आज के लेख में हम आपको उसके आगे की कहानी बताएँगे जो की पांडवो के स्वर्गारोहण के बारे में। श्री कृष्ण सहित पुरे यदुवंशियों के मारे जाने से दुखी पांडव भी परलोक जाने का निश्चय करते है और इस क्रम में पांचो पांडव और द्रोपदी स्वर्ग पहुँचते है। जहाँ द्रोपदी, भीम, अर्जुन, सहदेव और नकुल शरीर को त्याग कर स्वर्ग पहुँचते है वही युधिष्ठर सशरीर स्वर्ग पहुँचते है। हालांकि उन्हें अपनी एक गलती के कारण कुछ समय नरक में भी बिताना पड़ता है। इस पुरे सफर में उनके साथ एक कुत्ता भी होता है। आइए अब विस्तार पूर्वक जानते है की वो कुत्ता कौन था तथा पांडवो को स्वर्ग पहुँचने में किन किन कठनाइयों का सामना करना पड़ा ?वज्र को इंद्रप्रस्थ का राजा बनाया था अर्जुन नेनगर के बाहर निकलते ही जब द्वारिका समुद्र में डूब गई तो यह दृश्य देखकर सभी को आश्चर्य हुआ। अर्जुन यदुवंश की स्त्रियों व द्वारकावासियों को लेकर तेजी से हस्तिनापुर की ओर चलने लगे। रास्ते में पंचनद देश में अर्जुन ने पड़ाव डाला। वहां रहने वाले लुटेरों ने जब देखा कि अर्जुन अकेले ही इतने बड़े जनसमुदाय को लेकर जा रहे हैं तो धन के लालच में आकर उन्होंने उन पर हमला कर दिया। अर्जुन ने लुटेरों को चेतावनी दी, लेकिन फिर वे नहीं माने और लूट-पाट करने लगे।तब अर्जुन ने अपने दिव्य अस्त्र-शस्त्रों का स्मरण किया, लेकिन उनकी स्मरण शक्ति लुप्त हो गई। अर्जुन ने देखा कि कुछ ही देर में उनकी तरकश के सभी बाण भी समाप्त हो गए। तब अर्जुन बिना शस्त्र से ही लुटेरों से युद्ध करने लगे, लेकिन देखते ही देखते लुटेरे बहुत सा धन और स्त्रियों को लेकर भाग गए। अस्त्रों का ज्ञान लुप्त हो गया, धनुष पर काबू नहीं चलता था, अक्षय बाण भी समाप्त हो गए। यह देखकर अर्जुन को बहुत दुख हुआ।जैसे-तैसे अर्जुन यदुवंश की बची हुई स्त्रियों व बच्चों को लेकर कुरुक्षेत्र पहुंचे। यहां आकर अर्जुन ने वज्र (श्रीकृष्ण का पोता) को इंद्रप्रस्थ का राजा बना दिया। रुक्मिणी, शैब्या, हेमवती तथा जांबवंती आदि रानियां अग्नि में प्रवेश कर गईं शेष वन में तपस्या के लिए चली गईं। बूढ़ों, बालकों व अन्य स्त्रियों को अर्जुन ने इंद्रप्रस्थ में रहने के लिए कहा।महर्षि वेदव्यास ने दिया था पांडवों को परलोक जाने का विचारवज्र को इंद्रप्रस्थ का राजा बनाने के बाद अर्जुन महर्षि वेदव्यास के आश्रम पहुंचे। यहां आकर अर्जुन ने महर्षि वेदव्यास को बताया कि श्रीकृष्ण, बलराम सहित सारे यदुवंशी समाप्त हो चुके हैं। तब महर्षि ने कहा कि यह सब इसी प्रकार होना था। इसलिए इसके लिए शोक नहीं करना चाहिए। तब अर्जुन ने ये भी बताया कि किस प्रकार साधारण लुटेरे उनके सामने यदुवंश की स्त्रियों को हर कर ले गए और वे कुछ भी न कर सके।अर्जुन की बात सुनकर महर्षि वेदव्यास ने कहा कि वे दिव्य अस्त्र जिस उद्देश्य से तुमने प्राप्त किए थे, वह पूरा हो गया। अत: वे पुन: अपने स्थानों पर चले गए हैं। महर्षि ने अर्जुन से यह भी कहा कि तुम लोगों ने अपना कर्तव्य पूर्ण कर लिया है। अत: अब तुम्हारे परलोक गमन का समय आ गया है और यही तुम्हारे लिए श्रेष्ठ भी है। महर्षि वेदव्यास की बात सुनकर अर्जुन उनकी आज्ञा से हस्तिनापुर आए और उन्होंने पूरी बात महाराज युधिष्ठिर को बता दी।युधिष्ठिर ने परीक्षित को बनाया हस्तिनापुर का राजायदुवंशियों के नाश की बात जानकर युधिष्ठिर को बहुत दुख हुआ। महर्षि वेदव्यास की बात मानकर द्रौपदी सहित पांडवों ने राज-पाठ त्याग कर परलोक जाने का निश्चय किया। युधिष्ठिर ने युयुत्सु को बुलाकर उसे संपूर्ण राज्य की देख-भाल का भार सौंप दिया और परीक्षित का राज्याभिषेक कर दिया। युधिष्ठिर ने सुभद्रा से कहा कि आज से परीक्षित हस्तिनापुर का तथा वज्र इंद्रप्रस्थ का राजा है। अत: तुम इन दोनों पर समान रूप से स्नेह रखना।इसके बाद पांडवों ने अपने मामा वसुदेव व श्रीकृष्ण तथा बलराम आदि का विधिवत तर्पण व श्राद्ध किया। इसके बाद पांडवों व द्रौपदी ने साधुओं के वस्त्र धारण किए और स्वर्ग जाने के लिए निकल पड़े। पांडवों के साथ-साथ एक कुत्ता भी चलने लगा। अनेक तीर्थों, नदियों व समुद्रों की यात्रा करते-करते पांडव आगे बढऩे लगे। पांडव चलते-चलते लालसागर तक आ गए।अर्जुन ने लोभ वश अपना गांडीव धनुष व अक्षय तरकशों का त्याग नहीं किया था। तभी वहां अग्निदेव उपस्थित हुए और उन्होंने अर्जुन से गांडीव धनुष और अक्षय तरकशों का त्याग करने के लिए कहा। अर्जुन ने ऐसा ही किया। पांडवों ने पृथ्वी की परिक्रमा पूरी करने की इच्छा से उत्तर दिशा की ओर यात्रा की।सबसे पहले द्रौपदी गिरी थी स्वर्ग जाने के रास्ते मेंयात्रा करते-करते पांडव हिमालय तक पहुंच गए। हिमालय लांघ कर पांडव आगे बढ़े तो उन्हें बालू का समुद्र दिखाई पड़ा। इसके बाद उन्होंने सुमेरु पर्वत के दर्शन किए। पांचों पांडव, द्रौपदी तथा वह कुत्ता तेजी से आगे चलने लगे। तभी द्रौपदी लडख़ड़ाकर गिर पड़ी।द्रौपदी को गिरा देख भीम ने युधिष्ठिर से कहा कि- द्रौपदी ने कभी कोई पाप नहीं किया। तो फिर क्या कारण है कि वह नीचे गिर पड़ी। युधिष्ठिर ने कहा कि- द्रौपदी हम सभी में अर्जुन को अधिक प्रेम करती थीं। इसलिए उसके साथ ऐसा हुआ है। ऐसा कहकर युधिष्ठिर द्रौपदी को देखे बिना ही आगे बढ़ गए। थोड़ी देर बाद सहदेव भी गिर पड़े।भीमसेन ने सहदेव के गिरने का कारण पूछा तो युधिष्ठिर ने बताया कि सहदेव किसी को अपने जैसा विद्वान नहीं समझता था, इसी दोष के कारण इसे आज गिरना पड़ा है। कुछ देर बाद नकुल भी गिर पड़े। भीम के पूछने पर युधिष्ठिर ने बताया कि नकुल को अपने रूप पर बहुत अभिमान था। इसलिए आज इसकी यह गति हुई है।थोड़ी देर बाद अर्जुन भी गिर पड़े। युधिष्ठिर ने भीमसेन को बताया कि अर्जुन को अपने पराक्रम पर अभिमान था। अर्जुन ने कहा था कि मैं एक ही दिन में शत्रुओं का नाश कर दूंगा, लेकिन ऐसा कर नहीं पाए। अपने अभिमान के कारण ही अर्जुन की आज यह हालत हुई है। ऐसा कहकर युधिष्ठिर आगे बढ़ गए।थोड़ी आगे चलने पर भीम भी गिर गए। जब भीम ने युधिष्ठिर से इसका कारण तो उन्होंने बताया कि तुम खाते बहुत थे और अपने बल का झूठा प्रदर्शन करते थे। इसलिए तुम्हें आज भूमि पर गिरना पड़ा है। यह कहकर युधिष्ठिर आगे चल दिए। केवल वह कुत्ता ही उनके साथ चलता रहा।कुत्ते को अपने साथ स्वर्ग ले जाना चाहते थे युधिष्ठिरयुधिष्ठिर कुछ ही दूर चले थे कि उन्हें स्वर्ग ले जाने के लिए स्वयं देवराज इंद्र अपना रथ लेकर आ गए। तब युधिष्ठिर ने इंद्र से कहा कि- मेरे भाई और द्रौपदी मार्ग में ही गिर पड़े हैं। वे भी हमारे हमारे साथ चलें, ऐसी व्यवस्था कीजिए। तब इंद्र ने कहा कि वे सभी पहले ही स्वर्ग पहुंच चुके हैं। वे शरीर त्याग कर स्वर्ग पहुंचे हैं और आप सशरीर स्वर्ग में जाएंगे।इंद्र की बात सुनकर युधिष्ठिर ने कहा कि यह कुत्ता मेरा परमभक्त है। इसलिए इसे भी मेरे साथ स्वर्ग जाने की आज्ञा दीजिए, लेकिन इंद्र ने ऐसा करने से मना कर दिया। काफी देर समझाने पर भी जब युधिष्ठिर बिना कुत्ते के स्वर्ग जाने के लिए नहीं माने तो कुत्ते के रूप में यमराज अपने वास्तविक स्वरूप में आ गए (वह कुत्ता वास्तव में यमराज ही थे)। युधिष्ठिर को अपने धर्म में स्थित देखकर यमराज बहुत प्रसन्न हुए। इसके बाद देवराज इंद्र युधिष्ठिर को अपने रथ में बैठाकर स्वर्ग ले गए।देवदूत नरक लेकर आया था युधिष्ठिर कोस्वर्ग जाकर युधिष्ठिर ने देखा कि वहां दुर्योधन एक दिव्य सिंहासन पर बैठा है, अन्य कोई वहां नहीं है। यह देखकर युधिष्ठिर ने देवताओं से कहा कि मेरे भाई तथा द्रौपदी जिस लोक में गए हैं, मैं भी उसी लोक में जाना चाहता हूं। मुझे उनसे अधिक उत्तम लोक की कामना नहीं है। तब देवताओं ने कहा कि यदि आपकी ऐसी ही इच्छा है तो आप इस देवदूत के साथ चले जाइए। यह आपको आपके भाइयों के पास पहुंचा देगा। युधिष्ठिर उस देवदूत के साथ चले गए। देवदूत युधिष्ठिर को ऐसे मार्ग पर ले गया, जो बहुत खराब था।उस मार्ग पर घोर अंधकार था। उसके चारों ओर से बदबू आ रही थी, इधर-उधर मुर्दे दिखाई दे रहे थे। लोहे की चोंच वाले कौए और गीध मंडरा रहे थे। वह असिपत्र नामक नरक था। वहां की दुर्गंध से तंग आकर युधिष्ठिर ने देवदूत से पूछा कि हमें इस मार्ग पर और कितनी दूर चलना है और मेरे भाई कहां हैं? युधिष्ठिर की बात सुनकर देवदूत बोला कि देवताओं ने कहा था कि जब आप थक जाएं तो आपको लौटा लाऊ। यदि आप थक गए हों तो हम पुन: लौट चलते हैं। युधिष्ठिर ने ऐसा ही करने का निश्चय किया।इसलिए युधिष्ठिर को देखना पड़ा था नरकजब युधिष्ठिर वापस लौटने लगे तो उन्हें दुखी लोगों की आवाज सुनाई दी, वे युधिष्ठिर से कुछ देर वहीं रुकने के लिए कह रहे थे। युधिष्ठिर ने जब उनसे उनका परिचय पूछा तो उन्होंने कर्ण, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव व द्रौपदी के रूप में अपना परिचय दिया। तब युधिष्ठिर ने उस देवदूत से कहा कि तुम पुन: देवताओं के पास लौट जाओ, मेरे यहां रहने से यदि मेरे भाइयों को सुख मिलता है तो मैं इस दुर्गम स्थान पर ही रहूंगा। देवदूत ने यह बात जाकर देवराज इंद्र को बता दी।युधिष्ठिर को उस स्थान पर अभी कुछ ही समय बीता था कि सभी देवता वहां आ गए। देवताओं के आते ही वहां सुगंधित हवा चलने लगी, मार्ग पर प्रकाश छा गया। तब देवराज इंद्र ने युधिष्ठिर को बताया कि तुमने अश्वत्थामा के मरने की बात कहकर छल से द्रोणाचार्य को उनके पुत्र की मृत्यु का विश्वास दिलाया था। इसी के परिणाम स्वरूप तुम्हें भी छल से ही कुछ देर नरक के दर्शन पड़े। अब तुम मेरे साथ स्वर्ग चलो। वहां तुम्हारे भाई व अन्य वीर पहले ही पहुंच गए हैं।गंगा नदी में स्नान कर मानव शरीर त्यागा था युधिष्ठिर नेदेवराज इंद्र के कहने पर युधिष्ठिर ने देवनदी गंगा में स्नान किया। स्नान करते ही उन्होंने मानव शरीर त्याग करके दिव्य शरीर धारण कर लिया। इसके बाद बहुत से महर्षि उनकी स्तुति करते हुए उन्हें उस स्थान पर ले गए जहां उनके चारों भाई, कर्ण, भीष्म, धृतराष्ट्र, द्रौपदी आदि आनंदपूर्वक विराजमान थे (वह भगवान का परमधाम था)। युधिष्ठिर ने वहां भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन किए। अर्जुन उनकी सेवा कर रहे थे। युधिष्ठिर को आया देख श्रीकृष्ण व अर्जुन ने उनका स्वागत किया।युधिष्ठिर ने देखा कि भीम पहले की तरह शरीर धारण किए वायु देवता के पास बैठे थे। कर्ण को सूर्य के समान स्वरूप धारण किए बैठे देखा। नकुल व सहदेव अश्विनी कुमारों के साथ बैठे थे। देवराज इंद्र ने युधिष्ठिर को बताया कि ये जो साक्षात भगवती लक्ष्मी दिखाई दे रही हैं। इनके अंश से ही द्रौपदी का जन्म हुआ था। इसके बाद इंद्र ने महाभारत युद्ध में मारे गए सभी वीरों के बारे में युधिष्ठिर को विस्तार पूर्वक बताया। इस प्रकार युधिष्ठिर अपने भाइयों व अन्य संबंधियों को वहां देखकर बहुत प्रसन्न हुए।
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2>भीष्म ने युधिष्ठिर को बताई सेक्स से जुड़ी एक अनूठी बात, जाने


यह एक काफी पुरानी डिबेट है की कौन है जो स्त्री-पुरुष के यूनियन में ज़्यादा आनंद कौन उठाता है। आपको शायद यह जानकर काफी हैरानी होगी की महाभारत और ग्रीक (यूनान) की देव गाथाएं दोनो में हीं इस रहस्य की कुंजी छुपी हुई है। आइये आपको बताते हैं दो ऐसी पोराणिक कहानियों के बारे में जिनमें यह गूढ़ रहस्य छिपा है और जिनको पढ़के आप भी दाँतो तले उंगलियाँ दबा लेंगे...

तीरेसीआस नाम का एक राजा अपने युवा दिनों में एक बार जंगल में शिकार करने गया। वहां उसने दो सापों को संयोग करते समय लिपटे हुए देखा। तीरेसीआस को ना जाने क्या सूझा उसने अपने सिपाहियों की मदद से उन विशाल सापों को अलग करवा दिया, ऐसा करवाते ही उसे श्राप मिला की उसका पोरुष चला जाएगा और वह एक महिला में तब्दील हो गया। उन सापों का क्या हुआ इस बारे में कुछ पता नहीं है।

कई साल बाद, तीरेसीआस अपने स्त्री रूप में दुबारा उसी जंगल से गुजरा। अपनी नफरत के चलते उसने अपने सिपाहियों की मदद से दुबारा एक साँप के जोड़े को अलग अलग कर दिया पर इस बार ऐसा करते ही वह पुरुष बन गया. अब वह अपनी तरह का एक ऐसा अकेला व्यक्ति था जिसने स्त्री और पुरुष दोनो का जीवन जिया था। उसी समय ग्रीक भगवान ज़ीउस और उनकी पत्नी हीरा में विवाद चल रहा था की सेक्स कौन ज़्यादा एंजाय करता है - स्त्री या पुरुष?

उन्होने तीरेसीआस को बुलावा भेजा। तीरेसीआस ने ज़ीउस और हीरा के सवाल का एकदम सीधा और सटीक जवाब दिया - "महिलाएं पुरुषों से 9 गुना ज़्यादा सेक्स का आनंद उठती हैं" इस जवाब से हीरा बहुत नाराज़ हो गयीं और उन्होने तीरेसीआस पर ऐसा वॉर किया की वह अंधा हो गया। ज़ीउस अपने आपको तीरेसीआस के अंधेपन के लिए जिम्मेदार मानने लगे और उन्होने उसको भविष्य देखने का वरदान दिया।

लगभग दुनिया की हर संस्कृति में ऐसे देवी देवता हैं जो स्त्री-पुरुष का सम्बंध खूबसूरती से दर्शाते हैं। भारत में ऐसी प्रतिमा हे अर्धनारीश्वर की. अर्धनारीश्वर का अर्थ यह हुआ कि आपका ही आधा व्यक्तित्व आपकी पत्नी और आपका ही आधा व्यक्तित्व आपका पति हो जाता है। आपकी ही आधी ऊर्जा स्त्रैण और आधी पुरुष हो जाती है। और तब इन दोनों के बीच जो रस और लीनता पैदा होती है , उस शक्ति का कहीं कोई विसर्जन नहीं होता

एक बार युधिष्ठिर अपने पितामह भीष्म के पास गए और बोले "हे तात श्री! क्या आप मेरी एक दुविधा सुलझाएंगे? क्या आप मुझे सच सच बताएंगे की स्त्री या पुरुष दोनो में से वो कौन है जो सम्भोग के समय ज़्यादा आनंद को प्राप्त करता है?" भीष्म बोले, "इस सम्बंध में तुम्हें भंगस्वाना और सकरा की कथा का वर्णन करता हूँ।

बहुत समय पहले भंगस्वाना नाम का एक राजा रहता था। वह न्यायप्रिय और बहुत यशस्वी था लेकिन उसके कोई पुत्र नहीं था। एक बालक के छह में उस राजा ने एक अनुष्ठान किया जिसका नाम था 'अग्नीष्टुता'. क्यूंकि उस हवन में केवल अग्नि भगवान का आदर हुआ था इसलिए देवराज इन्द्र काफी क्रोधित हो गए।

इन्द्र अपने गुस्से को निकालने के लिए एक मौका ढूँडने लगे ताकि राजा भंगस्वाना से कोई गलती हो और वह उसे दंड दे सकें। पर भंगस्वाना इतना अच्छा राजा था की इन्द्र को कोई मौका नहीं मिल रहा था जिस कारण से इन्द्र का गुस्सा और बढ़ता जा रहा था था। एक दिन राजा शिकार पर निकला, इन्द्र ने सोचा ये सही समय है और अपने अपमान का बदला लेने का और इन्द्र ने राजा को सम्मोहित कर दिया।

राजा भंगस्वाना जंगल में इधर-उधर भटकने लगा. अपनी सम्मोहित हालत में वह सब सुध खो बैठा, ना उसे दिशाएं समझ आ रही थीं और ना ही अपने सैनिक नहीं दिख रहे थे. भूख-प्यास ने उसे और व्याकुल कर दिया था। अचानक उसे एक छोटी सी नदी दिखाई थी जो किसी जादू सी सुन्दर लग रही थी. राजा उस नदी की तरफ बढ़ा और पहले उसने अपने घोड़े को पानी पिलाया, फिर खुद पिया।


जैसे ही राजा नदी ने नदी के अंदर प्रवेश की, पानी पिया, उसने देखा की वह बदल रहा है। धीरे-धीरे वह एक स्त्री में बदल गया। शर्म से बोझल वह राजा ज़ोर ज़ोर से विलाप करने लगा. उसे समझ नहीं आरहा था की ऐसा उसके साथ क्यूं हुआ।

राजा भंगस्वाना सोचने लगा, "हे प्रभु! इस अनर्थ के बाद में कैसे अपने राज्य वापस जाउं? मेरे अग्नीष्टुता' अनुष्ठान से मेरे 100 पुत्र हुए हैं उन्हें मैं अब कैसे मिलूंगा, क्या कहूंगा? मेरी रानी, महारानी जो मेरी प्रतीक्षा कर रहीं हैं, उनसे कैसे मिलूंगा? मेरे पोरुष के साथ-साथ मेरा राज-पाट सब चला जाएगा, मेरी प्रजा का क्या होगा" इस तरह से विलाप करता राजा अपने राज्य वापस लौटा.

स्त्री के रुप में जब राजा वापस पँहुचा तो उसे देख कर सभी लोग अचंभित रह गए। राजा ने सभा बुलाई और अपनी रानियों, पुत्रों और मंत्रियों से कहा की अब मैं राज-पाट संभालने के लायक नहीं रहा हूँ, तुम सभी लोग सुख से यहाँ रहो और मैं जंगल में जाकर अपना बाकी का जीवन बीताउंगा.

ऐसा कह कर वह राजा जंगल की तरफ प्रस्थान कर गया। वहां जाकर वह स्त्री रूप में एक तपस्वी के आश्रम में रहने लगी जिनसे उसने कई पुत्रों को जनम दिया। अपने उन पुत्रों को वह अपने पुराने राज्य ले गयी और अपने पुराने बचों से बोली, "तुम मेरे पुत्र हो जब में एक पुरुष था, ये मेरे पुत्र हैं जब में एक स्त्री हूँ। मेरे राज्य को मिल कर, भाइयों की तरह संभालो।" सभी भाई मिलकर रहने लगे।

सब को सुख से जीवन व्यतीति करता देख, देवराज इन्द्र और ज़्यादा क्रोधित हो जाए और उनमें बदले की भावना फिर जागने लगी। इन्द्र सोचने लगा की ऐसा लगता है की राजा को स्त्री मैं बदल कर मैने उसके साथ बुरे की जगह अच्छा कर दिया है। ऐसा कह कर इन्द्र ने एक ब्राह्मण का रूप धारा और पहुँच गया राजा भंगस्वाना के राज्य में। वहां जाकर उसने सभी राजकुमारों के कान भरने शुरू कर दिए।

इन्द्र के भड़काने की वजह से सभी भाई आपस में लड़ पड़े और एक दूसरे को मार डाला। जैसे ही भंगस्वाना को इस बात का पता चला वह शोकाकुल हो गया। ब्राह्मण के रूप में इन्द्र राजा के पास पहुंचा और पूछा की वह क्यूँ रो रही है। भंगस्वाना ने रोते रोते पूरी घटना इन्द्र को बताई तो इन्द्र ने अपना असली रूप दिखा कर राजा को उसकी गलती के बारे में बताया।इन्द्र ने कहा "क्यूंकि तुमने सिर्फ अग्नि को पूजा और मेरा अनादर किया इसलिए मैने तुम्हारे साथ यह खेल रचा।" यह सुनते ही भंगस्वाना इन्द्र के पैरों में गिर गया और अपने अनजाने में किया अपराध के लिए क्षमा मांगी। राजा की ऐसी दयनीय दशा देख कर इन्द्र को दया आ गई. इन्द्र ने राजा को माफ करते हुए अपने पुत्रों को जीवित करवाने का वरदान दिया।

इन्द्र बोले, "हे स्त्री रूपी राजन, अपने बच्चों में से किन्ही एक को जीवित कर लो" भंगस्वाना ने इन्द्र से कहा अगर ऐसी ही बात है तो मेरे उन पुत्रों को जीवित कर दो जिन्हे मैने स्त्री की तरह पैदा किया है। हैरान होते हुए इन्द्र ने इसका कारण पूछा तो राजा ने जवाब दिया, "हे इन्द्र! एक स्त्री का प्रेम, एक पुरुष के प्रेम से बहुत अधिक होता है इसीलिए मैं अपनी कोख से जन्मे बालकों का जीवन-दान मांगती हूँ।"

भीष्म ने इस कथा को आगे बढाते हुए युधिष्ठिर को कहा की इन्द्र यह सब सुन कर प्रसन्न हो गए और उन्होने राजा के सभी पुत्रों को जीवित कर दिया. उसके बाद इन्द्र ने राजा को दुबारा पुरुष रूप देने की बात की. इन्द्र बोले, "तुमसे खुश होकर हे भंगस्वाना मैं तुम्हे वापस पुरुष बनाना चाहता हूँ" पर राजा ने साफ मना कर दिया।

स्त्री रूपी भंगस्वाना बोला, "हे देवराज इन्द्र, मैं स्त्री रूप में ही खुश हूँ और स्त्री ही रहना चाहता हूँ" यह सुनकर इन्द्र उत्सुक होगए और पूछ बैठे की ऐसा क्यूँ राजन, क्या तुम आपस पुरुष बनकर अपना राज-पाट नहीं संभालना चाहते?" भंगस्वाना बोला, "क्यूंकि संयोग के समय स्त्री को पुरुष से कई गुना ज़्यादा आनंद, तृप्ति और सुख मिलता है इसलिए मैं स्त्री ही रहना चाहूंगा।" इन्द्र ने "तथास्तु" कहा और वहां से प्रस्थान किया।

भीष्म बोले, "हे युधिष्ठिर, यह बात स्पष्ट है की स्त्री को सम्बंधों के समय पुरुष से ज़्यादा सुख मिलता है।" और जैसा की हम सभी जानते हैं मित्रों की स्त्री पुरुष से कई गुना संवेदनशील होती हैं. आप महाभारत के इस उद्धरण के बारे में क्या सोचते हैं, ज़रूर बताएं।

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3>. युधिष्ठिर का स्त्री जाति को श्राप

महाभारत के शांति पर्व के अनुसार युद्ध समाप्त होने के बाद जब कुंती ने युधिष्ठिर को बताया कि कर्ण तुम्हारा बड़ा भाई था तो पांडवों को बहुत दुख हुआ। तब युधिष्ठिर ने विधि-विधान पूर्वक कर्ण का भी अंतिम संस्कार किया। माता कुंती ने जब पांडवों को कर्ण के जन्म का रहस्य बताया तो शोक में आकर युधिष्ठिर ने संपूर्ण स्त्री जाति को श्राप दिया कि - आज से कोई भी स्त्री गुप्त बात छिपा कर नहीं रख सकेगी।

2. ऋषि किंदम का राजा पांडु को श्राप
महाभारत के अनुसार एक बार राजा पांडु शिकार खेलने वन में गए। उन्होंने वहां हिरण के जोड़े को मैथुन करते देखा और उन पर बाण चला दिया। वास्तव में वो हिरण व हिरणी ऋषि किंदम व उनकी पत्नी थी। तब ऋषि किंदम ने राजा पांडु को श्राप दिया कि जब भी आप किसी स्त्री से मिलन करेंगे। उसी समय आपकी मृत्यु हो जाएगी। इसी श्राप के चलते जब राजा पांडु अपनी पत्नी माद्री के साथ मिलन कर रहे थे, उसी समय उनकी मृत्यु हो गई।
3. माण्डव्य ऋषि का यमराज को श्राप
महाभारत के अनुसार माण्डव्य नाम के एक ऋषि थे। राजा ने भूलवश उन्हें चोरी का दोषी मानकर सूली पर चढ़ाने की सजा दी। सूली पर कुछ दिनों तक चढ़े रहने के बाद भी जब उनके प्राण नहीं निकले, तो राजा को अपनी गलती का अहसास हुआ और उन्होंने ऋषि माण्डव्य से क्षमा मांगकर उन्हें छोड़ दिया।
तब ऋषि यमराज के पास पहुंचे और उनसे पूछा कि मैंने अपने जीवन में ऐसा कौन सा अपराध किया था कि मुझे इस प्रकार झूठे आरोप की सजा मिली। तब यमराज ने बताया कि जब आप 12 वर्ष के थे, तब आपने एक फतींगे की पूंछ में सींक चुभाई थी, उसी के फलस्वरूप आपको यह कष्ट सहना पड़ा।

तब ऋषि माण्डव्य ने यमराज से कहा कि 12 वर्ष की उम्र में किसी को भी धर्म-अधर्म का ज्ञान नहीं होता। तुमने छोटे अपराध का बड़ा दण्ड दिया है। इसलिए मैं तुम्हें श्राप देता हूं कि तुम्हें शुद्र योनि में एक दासी पुत्र के रूप में जन्म लेना पड़ेगा। ऋषि माण्डव्य के इसी श्राप के कारण यमराज ने महात्मा विदुर के रूप में जन्म लिया।
4. नंदी का रावण को श्राप
वाल्मीकि रामायण के अनुसार एक बार रावण भगवान शंकर से मिलने कैलाश गया। वहां उसने नंदीजी को देखकर उनके स्वरूप की हंसी उड़ाई और उन्हें बंदर के समान मुख वाला कहा। तब नंदीजी ने रावण को श्राप दिया कि बंदरों के कारण ही तेरा सर्वनाश होगा।
5. कद्रू का अपने पुत्रों को श्राप
महाभारत के अनुसार ऋषि कश्यप की कद्रू व विनता नाम की दो पत्नियां थीं। कद्रू सर्पों की माता थी व विनता गरुड़ की। एक बार कद्रू व विनता ने एक सफेद रंग का घोड़ा देखा और शर्त लगाई। विनता ने कहा कि ये घोड़ा पूरी तरह सफेद है और कद्रू ने कहा कि घोड़ा तो सफेद हैं, लेकिन इसकी पूंछ काली है।
कद्रू ने अपनी बात को सही साबित करने के लिए अपने सर्प पुत्रों से कहा कि तुम सभी सूक्ष्म रूप में जाकर घोड़े की पूंछ से चिपक जाओ, जिससे उसकी पूंछ काली दिखाई दे और मैं शर्त जीत जाऊं। कुछ सर्पों ने कद्रू की बात नहीं मानी। तब कद्रू ने अपने उन पुत्रों को श्राप दिया कि तुम सभी जनमजेय के सर्प यज्ञ में भस्म हो जाओगे।

6. उर्वशी का अर्जुन को श्राप
​महाभारत के युद्ध से पहले जब अर्जुन दिव्यास्त्र प्राप्त करने स्वर्ग गए, तो वहां उर्वशी नाम की अप्सरा उन पर मोहित हो गई। यह देख अर्जुन ने उन्हें अपनी माता के समान बताया। यह सुनकर क्रोधित उर्वशी ने अर्जुन को श्राप दिया कि तुम नपुंसक की भांति बात कर रहे हो। इसलिए तुम नपुंसक हो जाओगे, तुम्हें स्त्रियों में नर्तक बनकर रहना पड़ेगा। यह बात जब अर्जुन ने देवराज इंद्र को बताई तो उन्होंने कहा कि अज्ञातवास के दौरान यह श्राप तुम्हारी मदद करेगा और तुम्हें कोई पहचान नहीं पाएगा।
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4>== गंगापुत्र की हत्या के बदले अर्जुन को मिली पुत्र के हाथो मौत

भीष्म पितामह की मृत्यु से युधिष्ठिर को बहुत दुख हुआ, शोक निवारण के लिए महर्षि वेदव्यास ने युधिष्ठिर से अश्वमेध यज्ञ करने के लिए भी कहा।

पांडवों ने शुभ मुहूर्त देखकर यज्ञ का शुभारंभ किया और अर्जुन को रक्षक बना कर घोड़ा छोड़ दिया। वह घोड़ा जहां भी जाता, अर्जुन उसके पीछे जाते। अनेक राजाओं ने पांडवों की दासता मान ली। वहीं, कुछ ने मित्र राष्ट्र के नाते पांडवों को कर देने की बात मान ली। किरात, मलेच्छ व यवन आदि देशों के राजाओं ने यज्ञ को घोड़े को रोक लिया। तब अर्जुन ने उनसे युद्ध कर उन्हें पराजित कर दिया। इस तरह विभिन्न देशों के राजाओं के साथ अर्जुन को कई बार युद्ध करना पड़ा।
यज्ञ का घोड़ा घूमते-घूमते मणिपुर पहुंच गया। यहां की राजकुमारी चित्रांगदा से अर्जुन को बभ्रुवाहन नामक पुत्र था। बभ्रुवाहन ही उस समय मणिपुर का राजा था। जब बभ्रुवाहन को अपने पिता अर्जुन के आने का समाचार मिला तो उनका स्वागत करने के लिए वह नगर के द्वार पर आया। अपने पुत्र बभ्रुवाहन को देखकर अर्जुन ने कहा कि मैं इस समय यज्ञ के घोड़े की रक्षा करता हुआ तुम्हारे राज्य में आया हूं। इसलिए तुम मुझसे युद्ध करो।

जिस समय अर्जुन बभ्रुवाहन से यह बात कह रह था, उसी समय नागकन्या उलूपी भी वहां आ गई। उलूपी भी अर्जुन की पत्नी थी। उलूपी ने भी बभ्रुवाहन को अर्जुन के साथ युद्ध करने के लिए उकसाया। अपने पिता अर्जुन व सौतेली माता उलूपी के कहने पर बभ्रुवाहन युद्ध के लिए तैयार हो गया। अर्जुन और बभ्रुवाहन में भयंकर युद्ध होने लगा। अपने पुत्र का पराक्रम देखकर अर्जुन बहुत प्रसन्न हुए।

बभ्रुवाहन उस समय युवक ही था। अपने बाल स्वभाव के कारण बिना परिणाम पर विचार कर उसने एक तीखा बाण अर्जुन पर छोड़ दिया। चोट से अर्जुन मूर्छित हो धरती पर गिर पड़े। उनका पूर्त भी उस समय घायल था, वह भी बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़ा। जब चित्रांगदा वंहा गई, अपने पति व पुत्र को घायल अवस्था में धरती पर पड़ा देख उसे बहुत दुख हुआ।

अत्यधिक खून बहाने से अर्जुन की मौत हो गई ये देख चित्रांगदा रोने लगी। जब बभ्रुवाहन को होश आया, जब उसने देखा कि उसने अपने पिता की हत्या कर दी है तो वह भी शोक करने लगा फिर दोनों ने अन्न जल त्याग दिया।

ये देख उलूपी (अर्जुन की नागकन्या पत्नी) हरकत में आई उसने संजीवनी मणि का ध्यान किया और उसके हाथ में आते ही बभ्रु से कहा कि यह मणि अर्जुन की छाती पर रख दो, रखते ही अर्जुन जीवित हो उठे। अर्जुन द्वारा पूछने पर उलूपी ने बताया कि यह मेरी ही मोहिनी माया थी। उलूपी ने बताया कि छल पूर्वक भीष्म का वध करने के कारण वसु (एक प्रकार के देवता) आपको श्राप देना चाहते थे।

जब यह बात मुझे पता चली तो मैंने यह बात अपने पिता को बताई। उन्होंने वसुओं के पास जाकर ऐसा न करने की प्रार्थना की। तब वसुओं ने प्रसन्न होकर कहा कि मणिपुर का राजा बभ्रुवाहन अर्जुन का पुत्र है यदि वह बाणों से अपने पिता का वध कर देगा तो अर्जुन को अपने पाप से छुटकारा मिल जाएगा। आपको वसुओं के श्राप से बचाने के लिए ही मैंने यह मोहिनी माया दिखलाई थी। इस प्रकार पूरी बात जान कर अर्जुन, बभ्रुवाहन और चित्रांगदा भी प्रसन्न हो गए। अर्जुन ने बभ्रुवाहन को अश्वमेध यज्ञ में आने का निमंत्रण दिया और पुन: अपनी यात्रा पर चल दिए।
इस प्रकार अर्जुन अन्य देशों के राजाओं को पराजित करते हुए पुन: हस्तिनापुर आए। अर्जुन के आने की खबर सुनकर युधिष्ठिर आदि पांडव व श्रीकृष्ण बहुत प्रसन्न हुए। तय समय पर उचित स्थान देखकर यज्ञ के लिए भूमि का चयन किया गया। शुभ मुहूर्त में यज्ञ प्रारंभ किया गया। यज्ञ को देखने के लिए दूर-दूर से राजा-महाराजा आए। पांडवों ने सभी का उचित आदर-सत्कार किया। बभ्रुवाहन, चित्रांगदा व उलूपी भी यज्ञ में शामिल होने आए।

यज्ञ संपूर्ण होने पर युधिष्ठिर ने पूरी धरती ब्राह्मणों को ही दान कर दी है। तब महर्षि वेदव्यास ने कहा कि ब्राह्मणों की ओर से यह धरती मैं पुन: तुम्हे वापस करता हूं। इसके बदले तुम सभी ब्राह्मणों को स्वर्ण दे दो। युधिष्ठिर ने ऐसा ही किया। युधिष्ठिर ने सभी ब्राह्मणों को तीन गुणा सोना दान में दिया। इतना दान पाकर ब्राह्मण भी तृप्त हो गए। ब्राह्मणों ने पांडवों को आशीर्वाद दिया। इस प्रकार अश्वमेध यज्ञ सकुशल संपन्न हो गया।
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5>एक बार अर्जुन को अहंकार हो गया

एक बार अर्जुन को अहंकार हो गया   कि वही भगवान के सबसे बड़े भक्त हैं।
उनको श्रीकृष्ण ने समझ लिया।
एक दिन वह अर्जुन को अपने साथ घुमाने ले गए। रास्ते में उनकी मुलाकात एक गरीब ब्राह्मण से हुई।
उसका व्यवहार थोड़ा विचित्र था। वह सूखी घास खा रहा था और उसकी कमर से तलवार लटक रही थी।
अर्जुन ने उससे पूछा, ‘आप तो अहिंसा के पुजारी हैं। जीव हिंसा के भय से सूखी घास खाकर अपना गुजारा करते हैं।
लेकिन फिर हिंसा का यह उपकरण तलवार क्यों आपके साथ है?’
ब्राह्मण ने जवाब दिया,‘मैं कुछ लोगों को दंडित करना चाहता हूं।’
‘ आपके शत्रु कौन हैं?’ अर्जुन ने जिज्ञासा जाहिर की।
ब्राह्मण ने कहा, ‘मैं चार लोगों को खोज रहा हूं, ताकि उनसे अपना हिसाब चुकता कर सकूं।
सबसे पहले तो मुझे नारद की तलाश है। नारद मेरे प्रभु को आराम नहीं करने देते,
सदा भजन-कीर्तन कर उन्हें जागृत रखते हैं।
फिर मैं द्रौपदी पर भी बहुत क्रोधित हूं। उसने मेरे प्रभु को ठीक उसी समय पुकारा,
जब वह भोजन करने बैठे थे।
उन्हें तत्काल खाना छोड़ पांडवों को दुर्वासा ऋषि के शाप से बचाने जाना पड़ा।
उसकी धृष्टता तो देखिए। उसने मेरे भगवान को जूठा खाना खिलाया।’
‘ आपका तीसरा शत्रु कौन है?’ अर्जुन ने पूछा। ‘ वह है हृदयहीन प्रह्लाद।
उस निर्दयी ने मेरे प्रभु को गरम तेल के कड़ाह में प्रविष्ट कराया, हाथी के पैरों तले
कुचलवाया और अंत में खंभे से प्रकट होने के लिए विवश किया।
और चौथा शत्रु है अर्जुन। उसकी दुष्टता देखिए। उसने मेरे भगवान को
अपना सारथी बना डाला। उसे भगवान की असुविधा का तनिक भी ध्यान नहीं रहा।
कितना कष्ट हुआ होगा मेरे प्रभु को।’
यह कहते ही ब्राह्मण की आंखों में आंसू आ गए। यह देख अर्जुन का घमंड चूर-चूर हो गया। उन्होने
श्रीकृष्ण से क्षमा मांगते हुए कहा, ‘मान गया प्रभु, इस संसार में न जाने आपके कितने
तरह के भक्त हैं। मैं तो कुछ भी नहीं हूं।’
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Tuesday, February 16, 2016

4> उर्वशी ने क्यों दिया अर्जुन को नपुंसक होने का श्राप ? -

4>|| *उर्वशी***( 1 to 1 )

1>------------------उर्वशी ने क्यों दिया अर्जुन को नपुंसक होने का श्राप ? -
2>------------------क्या द्रोपदी थी अभिमन्यु के वध का कारण ? 

3>-----------------दुर्योधन की मृत्यु के समय=


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1>उर्वशी ने क्यों दिया अर्जुन को नपुंसक होने का श्राप ? -

Hindi Mahabaharta Story- Why Urvashi cursed Arjuna? यह प्रसंग पांडवों के वनवास के समय का है। अपने वनवास के समय एक बार पांडव वेदव्यास जी के आश्रम में पहुंचे और उन्हें अपना दुःख बताया। युधिष्ठर ने वेदव्यास जी से प्रार्थना करी की वो उन्हें अपना राज्य पुनः प्राप्त करने का कोई उपाय बताए। तब वेदव्यास जी ने कहा की पुनः अपना राज्य प्राप्त करने के लिए तुम्हे दिव्य अस्त्रों की आवश्यकता पड़ेगी क्योंकि कौरवो के पास भीष्म, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, कर्ण जैसे महारथी है। अतः बिना दिव्य अस्त्र प्राप्त किये तुम उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकते। युधिष्ठर के यह पूँछने पर की वो देवताओं से यह दिव्य अस्त्र कैसे प्राप्त करे, वेदव्यास जी ने कहा की आप सब में केवल अर्जुन ही देवताओं को प्रसन्न करके दिव्यास्त्र प्राप्त कर सकते है। अतः अर्जुन को देवताओं को तपस्या करके प्रसन्न करना चाहिए।

अर्जुन गए तपस्या करने
वेदव्यास जी के ऐसे वचन सुनकर अर्जुन तपस्या करने के लिए आगे अकेले ही रवाना हो गए। अर्जुन उत्तराखंड के पर्वतों को पार करते हुये एक अपूर्व सुन्दर वन में जा पहुँचे। वहाँ के शान्त वातावरण में वे भगवान की शंकर की तपस्या करने लगे। उनकी तपस्या की परीक्षा लेने के लिये भगवान शंकर एक भील का वेष धारण कर उस वन में आये। वहाँ पर आने पर भील रूपी शिव जी ने देखा कि एक दैत्य शूकर का रूप धारण कर तपस्यारत अर्जुन की घात में है। शिव जी ने उस दैत्य पर अपना बाण छोड़ दिया। जिस समय शंकर भगवान ने दैत्य को देखकर बाण छोड़ा उसी समय अर्जुन की तपस्या टूटी और दैत्य पर उनकी दृष्टि पड़ी। उन्होंने भी अपना गाण्डीव धनुष उठा कर उस पर बाण छोड़ दिया। शूकर को दोनों बाण एक साथ लगे और उसके प्राण निकल गये।

शूकर के मर जाने पर भीलरूपी शिव जी और अर्जुन दोनों ही शूकर को अपने बाण से मरा होने का दावा करने लगे। दोनों के मध्य विवाद बढ़ता गया और विवाद ने युद्ध का रूप धारण कर लिया। अर्जुन निरन्तर भील पर गाण्डीव से बाणों की वर्षा करते रहे किन्तु उनके बाण भील के शरीर से टकरा-टकरा कर टूटते रहे और भील शान्त खड़े हुये मुस्कुराता रहा। अन्त में उनकी तरकश के सारे बाण समाप्त हो गये। इस पर अर्जुन ने भील पर अपनी तलवार से आक्रमण कर दिया। अर्जुन की तलवार भी भील के शरीर से टकरा कर दो टुकड़े हो गई। अब अर्जुन क्रोधित होकर भील से मल्ल युद्ध करने लगे। मल्ल युद्ध में भी अर्जुन भील के प्रहार से मूर्छित हो गये।
देवताओं ने दिए अर्जुन को दिव्यास्त्र
थोड़ी देर पश्चात् जब अर्जुन की मूर्छा टूटी तो उन्होंने देखा कि भील अब भी वहीं खड़े मुस्कुरा रहा है। भील की शक्ति देख कर अर्जुन को अत्यन्त आश्चर्य हुआ और उन्होंने भील को मारने की शक्ति प्राप्त करने के लिये शिव मूर्ति पर पुष्पमाला डाली, किन्तु अर्जुन ने देखा कि वह माला शिव मूर्ति पर पड़ने के स्थान पर भील के कण्ठ में चली गई। इससे अर्जुन समझ गये कि भगवान शंकर ही भील का रूप धारण करके वहाँ उपस्थित हुये हैं। अर्जुन शंकर जी के चरणों में गिर पड़े। भगवान शंकर ने अपना असली रूप धारण कर लिया और अर्जुन से कहा, “हे अर्जुन! मैं तुम्हारी तपस्या और पराक्रम से अति प्रसन्न हूँ और तुम्हें पशुपत्यास्त्र प्रदान करता हूँ।” भगवान शंकर अर्जुन को पशुपत्यास्त्र प्रदान कर अन्तर्ध्यान हो गये। उसके पश्चात् वहाँ पर वरुण, यम, कुबेर, गन्धर्व और इन्द्र अपने-अपने वाहनों पर सवार हो कर आ गये। अर्जुन ने सभी देवताओं की विधिवत पूजा की। यह देख कर यमराज ने कहा, “अर्जुन! तुम नर के अवतार हो तथा श्री कृष्ण नारायण के अवतार हैं। तुम दोनों मिल कर अब पृथ्वी का भार हल्का करो।” इस प्रकार सभी देवताओं ने अर्जुन को आशीर्वाद और विभिन्न प्रकार के दिव्य एवं अलौकिक अस्त्र-शस्त्र प्रदान कर अपने-अपने लोकों को चले गये।

अर्जुन पहुंचे स्वर्ग
अर्जुन के पास से अपने लोक को वापस जाते समय देवराज इन्द्र ने कहा, “हे अर्जुन! अभी तुम्हें देवताओं के अनेक कार्य सम्पन्न करने हैं, अतः तुमको लेने के लिये मेरा सारथि आयेगा।” इसलिये अर्जुन उसी वन में रह कर प्रतीक्षा करने लगे। कुछ काल पश्चात् उन्हें लेने के लिये इन्द्र के सारथि मातलि वहाँ पहुँचे और अर्जुन को विमान में बिठाकर देवराज की नगरी अमरावती ले गये। इन्द्र के पास पहुँच कर अर्जुन ने उन्हें प्रणाम किया। देवराज इन्द्र ने अर्जुन को आशीर्वाद देकर अपने निकट आसन प्रदान किया।
अमरावती में रहकर अर्जुन ने देवताओं से प्राप्त हुये दिव्य और अलौकिक अस्त्र-शस्त्रों की प्रयोग विधि सीखा और उन अस्त्र-शस्त्रों को चलाने का अभ्यास करके उन पर महारत प्राप्त कर लिया। फिर एक दिन इन्द्र अर्जुन से बोले, “वत्स! तुम चित्रसेन नामक गन्धर्व से संगीत और नृत्य की कला सीख लो।” चित्रसेन ने इन्द्र का आदेश पाकर अर्जुन को संगीत और नृत्य की कला में निपुण कर दिया।
उर्वशी का अर्जुन को श्राप
एक दिन जब चित्रसेन अर्जुन को संगीत और नृत्य की शिक्षा दे रहे थे, वहाँ पर इन्द्र की अप्सरा उर्वशी आई और अर्जुन पर मोहित हो गई। अवसर पाकर उर्वशी ने अर्जुन से कहा, “हे अर्जुन! आपको देखकर मेरी काम-वासना जागृत हो गई है, अतः आप कृपया मेरे साथ विहार करके मेरी काम-वासना को शांत करें।” उर्वशी के वचन सुनकर अर्जुन बोले, “हे देवि! हमारे पूर्वज ने आपसे विवाह करके हमारे वंश का गौरव बढ़ाया था अतः पुरु वंश की जननी होने के नाते आप हमारी माता के तुल्य हैं। देवि! मैं आपको प्रणाम करता हूँ।” अर्जुन की बातों से उर्वशी के मन में बड़ा क्षोभ उत्पन्न हुआ और उसने अर्जुन से कहा, “तुमने नपुंसकों जैसे वचन कहे हैं, अतः मैं तुम्हें शाप देती हूँ कि तुम एक वर्ष तक पुंसत्वहीन रहोगे।” इतना कहकर उर्वशी वहाँ से चली गई।

जब इन्द्र को इस घटना के विषय में ज्ञात हुआ तो वे अर्जुन से बोले, “वत्स! तुमने जो व्यवहार किया है, वह तुम्हारे योग्य ही था। उर्वशी का यह शाप भी भगवान की इच्छा थी, यह शाप तुम्हारे अज्ञातवास के समय काम आयेगा। अपने एक वर्ष के अज्ञातवास के समय ही तुम पुंसत्वहीन रहोगे और अज्ञातवास पूर्ण होने पर तुम्हें पुनः पुंसत्व की प्राप्ति हो जायेगी।”
अर्जुन बने बृहन्नला
इस शाप के कारण ही अर्जुन एक वर्ष के अज्ञात वास के दौरान बृहन्नला बने थे। इस बृहन्नला के रूप में अर्जुन ने उत्तरा को एक वर्ष नृत्य सिखाया था। उत्तरा विराट नगर के राजा विराट की पुत्री थी। अज्ञातवास के बाद उत्तरा का विवाह अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु से हुआ था।
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2>क्या द्रोपदी थी अभिमन्यु के वध का कारण ? जाने महाभारत की अनसुनी कहानी !

Draupadi :-

कुरुक्षेत्र के भूमि में लड़ी गयी महाभारत के युद्ध से तो हम सभी परिचित है ( draupadi ). अपने बचपन के दिनों से ही हम पांडवो और कौरवों के मध्य हुए भीषण युद्ध के बारे में सुनते और पढ़ते आये है. महाभारत का युद्ध पांडवो और कौरवों के बीच हस्तिनापुर के सम्राज्य को लेकर उनके बीच बिगड़ते रिश्तों पर आधारित था. कौरवों के अंदर अपने चचेरे भाइयो पांडवो के लिए पनप रही ईर्ष्या ही महाभारत जैसे भयंकर युद्ध का कारण बनी.

वैसे तो लालच, ईर्ष्या, जलन आदि ने पांडवो और कौरवों को एक-दूसरे से अलग रख रखा था, परतु जब से पांडवो का विवाह पांचाल नरेश की राजकुमारी द्रोपदी ( draupadi ) से हुआ तब से पांडवो और कौरवों के मध्य कुछ ऐसे घटनाक्रम घटित हुए जिसने महाभारत जैसे भीषण युद्ध की नींव रख दी.

महाभारत ग्रन्थ में बताई गई कई घटनाएं इस बात की ओर सपष्ट संकेत करती है की कहीं न कहीं द्रोपदी( draupadi ) के कारण ही अंतत: कौरवों को उनके पापो की सजा मिला पायी और समस्त कौरवों का पांडवो द्वार महाभारत के युद्ध में अंत कर दिया गया.
हम यह तो जानते है की द्रोपदी ( draupadi ) द्वारा दुर्योधन का एक बार भरी सभा में अपमान किया था जिसके प्रतिशोध में दुर्योधन ने भी द्रोपदी ( draupadi ) का भरी सभा में चीरहरण किया था जो महाभारत के युद्ध के कारणों में से एक था.

परन्तु बहुत सी अनेक घटनाएं भी ऐसी घटित हुई है की जो यह सिद्ध करती है की द्रोपदी ( draupadi ) ने भी महाभारत के युद्ध की बुन्याद रखी थी. अर्थात जहाँ पांडव और कौरव इस युद्ध के लिए जिम्मेदार थे उतना ही द्रोपदी भी इस युद्ध के लिए कहीं न कहीं बराबर की उत्तरदायी थी. आइये जानते कौन सी वे ऐसी घटनाएं थी जो द्रोपदी ( draupadi ) को भी महाभारत के युद्ध का बराबर का जिम्मेदार बनाती है.

1= .द्रोपदी ( draupadi ) से जुडी पहली घटना जिसने महाभारत युद्ध को अंजाम दिया था, जब इंद्रप्रस्थ राज्य में युवराज युधिस्ठर का राज्याभिषेक हो रहा था तब दुर्योधन भी उस अवसर पर इंद्रप्रस्थ पहुंचा था. इंद्रप्रस्थ के महल की रचना मयदानव ने की थी.


उसने अपनी माया से उस महल की रचना इस प्रकार से की थी की कोई भी व्यक्ति वहां की हर चीजों से धोखा खा सकता था. दुर्योधन भी इसी चाल में आ गया और फर्श समझकर तालाब में गिर गया. तब दुर्योधन की उस दशा को देखकर द्रोपदी ( draupadi ) बहुत जोर से हसी और दुर्योधन पर व्यंग्य कस्ते हुए कहा की ”अंधे का पुत्र तो अंधा ही होता है” . उस समय दुर्योधन ने अपनी भरी सभा में हुए अपमान का बदला लेने का दृढ़निश्चय किया था.

2 =.इंद्रप्रस्थ में हुए अपने अपमान का बदला लेने के लिए दुर्योधन ने पांडवो को जुए के खेल के लिए आमंत्रित किया. तथा इस खेल में दुर्योधन ने अपने मामा शकुनि के मदद से पांडवो के साथ छल किया और पांडवो का सारा राज्य जीत लिया. यहाँ तक की इस खेल में पांडव द्रोपदी ( draupadi ) का सम्मान भी हार गए.

दुर्योधन अपने अपमान का बदला भुला नहीं था उसने भरी सभा में अपने भाई दुःशासन के हाथो द्रोपदी का चिर हरण करने का प्रयास किया. पांडवो सहित भीष्म, दोणाचार्य सभी मूक बने रहे कोई भी द्रोपदी( draupadi ) का सम्मान बचा नहीं पाया. उस समय द्रोपदी ( draupadi ) ने यह प्रतिज्ञा ली थी की वह तब तक अपने खुले बालों को में जुड़ा नहीं करेगी जब तक वह दुःशासन के रक्त से अपने बाल धो ना ले. द्रोपदी( draupadi ) की यही प्रतिज्ञा ने पांडवो को भी क्रोधित किया और यह भी महाभारत के युद्ध की ओर बढ़ा एक कदम साबित हुआ.

3 =.पांडव के एक चोपड़ का दाँव हारने के कारण उन्हें वनवास भी मिला था. इस वनवास के लिए जब पांडव वन की ओर जा रहे थे तब द्रोपदी ( draupadi ) भी उनके साथ गई. पांडव द्रोपदी को महल में ही रखना चाहते थे परन्तु द्रोपदी ( draupadi ) का पांडवो के साथ वनवास की लिए चलने का मुख्य कारण यह था की पांडव चाहे जिस हाल में भी रहे परन्तु उन्हें अपनी पत्नी का अपमान सदैव याद रखना होगा. अतः पांडवो को अपने अपमान का प्रतिशोध याद दिलाने के लिए द्रोपदी ( draupadi ) ने भी पांडवो के साथ वनवास को चुना.

4 .= जुए में जब अपना सब कुछ गवां कर पांडव वनवास काट रहे थे तभी एक दिन वन में शिकार को आये दुर्योधन के जीजा जयद्रथ की नजर द्रोपदी ( draupadi ) पर पड़ी. उसने द्रोपदी को अपने साथ रथ में महल ले जाने का दुशाहस किया. परन्तु पांचो पांडवो ने जयद्रथ को ऐसा करते देख लिया तथा उन्होंने उसे पकड़कर बंधी बना लिया.
जब अर्जुन जयद्रध का वध करने के लिए आगे बढ़ा तो द्रोपदी ( draupadi ) ने अर्जुन को ऐसा करने से किसी तरह रोक लिया तथा जयद्रध का सर मुड़वाकर उसे पांच चोटी रखने की सजा दे दी. अब जयद्रध किसी को मुंह दिखाने के लायक नहीं रह गया था तथा अपने इसी अपमान का प्रतिशोध लेने के लिए जयद्रध ने महभारत युद्ध में चक्रव्यूह में फसे अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु का वध किया था.

5 .=द्रोपदी ( draupadi ) के पिता ने दोणाचार्य के वध की प्रतिज्ञा ले रखी थी और वह यह जानते थे की अर्जुन के अल्वा कोई अन्य द्रोण का वध नहीं कर सकता अतः उन्होंने अपनी पुत्री द्रोपदी ( draupadi ) का विवाह पांडवो से करवाया था.

6= . द्रोपदी कर्ण से विवाह करना चाहती परन्तु कर्ण के सूतपुत्र होने के कारण ऐसा सम्भव नहीं हो पाया. तथा द्रोपदी के स्वयम्बर में कर्ण का अपमान हो गया जिसके प्रतिशोध के लिए कर्ण ने भी द्रोपदी ( draupadi ) के चीर हरण के दौरान द्रोपदी ( draupadi ) की रक्षा करने की जगह यह कह दिया की ” जिस स्त्री के पांच पति हो सकते है उसका किया सम्मान”. इस बात से द्रोपदी को बहुत ठेस पहुंची और उसने पांडवो को महाभारत जैसे युद्ध के लिए उकसाया.
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3>दुर्योधन की मृत्यु के समय=


दुर्योधन की मृत्यु के समय श्रीकृष्ण ने किया था इस रहस्य का खुलासा, पांडव एवं उनकी सम्पूर्ण सेना सिर्फ एक दिन में ही हो सकती थी पराजित !
महाभारत के युद्ध समाप्ति के बाद जब कुरुक्षेत्र के मैदान में दुर्योधन मरणासन अवस्था में अपनी अंतिम सासे ले रहा था तब भगवान श्री कृष्ण उससे मिलने गए. हालाँकि भगवान श्री कृष्ण को देख दुर्योधन क्रोधित नहीं हुआ परन्तु उसने श्री कृष्ण को ताने जरूर मारे.

श्री कृष्ण ने दुर्योधन से उस समय कुछ न कहा परन्तु जब वह शांत हुआ तब श्री कृष्ण ने दुर्योधन को उसकी युद्ध में की गई उन गलतियों के बारे में बताया जो वह न करता तो आज महाभारत का युद्ध वह जीत चुका होता.

 कुरुक्षेत्र में लड़े गए युद्ध में कौरवों के सेनापति पहले दिन से दसवें दिन तक भीष्म पितामह थे, वहीं ग्याहरवें से पंद्रहवे तक गुरु दोणाचार्य ने ये जिम्मेदारी संभाली. लेकिन द्रोणाचार्य के मृत्यु के बाद दुर्योधन ने कर्ण को सेनापति बनाया.

यही दुर्योधन के महाभारत के युद्ध में सबसे बड़ी गलती थी इस एक गलती के कारण उसे युद्ध में पराजय का मुख देखना पड़ा. क्योकि कौरवों सेना में स्वयं भगवान शिव के अवतार मौजूद थे जो समस्त सृष्टि के संहारक है.
अश्वथामा ( ashwathama ) स्वयं महादेव शिव के रूद्र अवतार है और युद्ध के सोलहवें दिन यदि दुर्योधन कर्ण के बजाय अश्वथामा ( ashwathama ) को सेनापति बना चुका होता तो शायद आज महाभारत के युद्ध का परिणाम कुछ और ही होता.

अगला पेज

इसके साथ ही दुर्योधन ने अश्वथामा ( ashwathama ) को पांडवो के खिलाफ भड़काना चाहिए था जिससे वह अत्यधिक क्रोधित हो जाए. परन्तु कहा जाता है की ”विनाश काले विपरीत बुद्धि ” दुर्योधन अपने मित्र प्रेम के कारण इतना अंधा हो गया था की अश्वथामा ( ashwathama ) अमर है यह जानते हुए भी उसने कर्ण को सेनापति चुना.

 कृपाचार्य अकेले ही एक समय में 60000 योद्धाओं का मुकाबला कर सकते थे लेकिन उनका भांजा ( कृपाचर्य की बहन कृपी अश्वथामा की बहन थी ) अश्वथामा ( ashwathama ) में इतना समार्थ्य था की वह एक समय में 72000 योद्धाओं के छक्के छुड़ा सकता था.

अश्वथामा ( ashwathama ) ने युद्ध कौशल की शिक्षा केवल अपने पिता से ही गृहण नहीं करी थी बल्कि उन्हें युद्ध कौशल की शिक्षा इन महापुरषो परशुराम, दुर्वासा, व्यास, भीष्म, कृपाचार्य आदि ने भी दी थी.

ऐसे में दुर्योधन ने अश्वथामा ( ashwathama ) की जगह कर्ण को सेनापति का पद देकर महाभारत के युद्ध में सबसे बड़ी भूल करी थी.
भगवान श्री कृष्ण के समान ही अश्वथामा भी 64 कलाओं और 18 विद्याओं में पारंगत था.

युद्ध के अठारहवे दिन भी दुर्योधन ने रात्रि में उल्लू और कौवे की सलाह पर अश्वथामा ( ashwathama ) को सेनापति बनाया था. उस एक रात्रि में ही अश्वथामा ( ashwathama ) ने पांडवो की बची लाखो सेनाओं और पुत्रों को मोत के घाट उतार दिया था.

अतः अगर दुर्योधन ऐसा पहले कर चुका होता था तो वह खुद भी न मरता और पांडवो पर जीत भी दर्ज कर चुका होता, हालाँकि यह काम अश्वथामा( ashwathama ) ने युद्ध की समाप्ति पर किया था. जब अश्व्थामा( ashwathama ) का यह कार्य दुर्योधन को पता चला था तो उसे शकुन की मृत्यु प्राप्त हुई थी.
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3> नकुल और सहदेव की शक्ति का रहस्य जानिए

3>|| नकुल और सहदेव***( 1 to 1 ) 

1>------------------नकुल और सहदेव की शक्ति का रहस्य जानिए
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1>नकुल और सहदेव की शक्ति का रहस्य जानिए


महाभारत में कई घटना, संबंध और ज्ञान-विज्ञान के रहस्य छिपे हुए हैं। महाभारत का हर पात्र जीवंत है, चाहे वह कौरव, पांडव, कर्ण और कृष्ण हो या धृष्टद्युम्न, शल्य, शिखंडी और कृपाचार्य हो। महाभारत सिर्फ योद्धाओं की गाथाओं तक सीमित नहीं है। महाभारत से जुड़े शाप, वचन और आशीर्वाद में भी रहस्य छिपे हैं, क्योंकि महाभारत का हर व्यक्ति रहस्यमय था।

महाभारत संबंधी अब तक जितनी भी खुदाई हुई है या उस काल के तथ्‍य मिले हैं, वे सभी मानव इतिहास के रहस्यों से परदा उठाते हैं। किसी भी देश के इतिहास को धर्म के चश्मे से नहीं देखा जा सकता है। आओ हम जानते हैं महाभारत काल के ऐसे दो लोगों के बारे में जिनके बारे में कम ही लोग जानते हैं। उन दोनों ही यौद्धाओं में अद्भुत क्षमता थी। वे आम मनुष्यों की तरह मनुष्य नहीं थे। वे कुछ और ही तरह की क्षमता से संपन्न थे। उन दोनों का नाम है नकुल और सहदेव।

आओ इनकी चमत्कारिक शक्ति के पहले जान ले इनके जन्म और जीवन का रहस्य.. अगले पन्ने पर...

नकुल और सहदेव की शक्ति का रहस्य जानिए

नकुल और सहदेव : पांच पांडवों से से दो नकुल और सहदेव दोनों ही माद्री-अश्‍विन कुमार के पुत्र थे। लेकिन उनको पाण्डु पुत्र माना जाता है क्योंकि माद्री पाण्डु की पत्नी थीं। धृतराष्ट्र के बड़े भाई पाण्डु थे। पाण्डु को शाप था कि वह जब भी अपनी पत्नी कुंति या माद्री के साथ सहवास करेंगे तुरंत ही मृत्यु को प्राप्त हो जाएंगे। इसीलिए कुंति को प्राप्त मंत्र शक्ति के बल पर 4 पुत्र उत्पन्न हुए और वही मंत्र विद्या उन्होंने माद्री को बताई जिसने उनको दो पुत्र हुए। इस तरह दोनों को 6 पुत्र मिले जिसमें एक कर्ण भी थे।

कौन थे अश्‍विनीकुमार : ये 33 देवताओं में से 2 थे, जिनकों अश्विनी का जुड़वा पुत्र माना जाता था। पहले का नाम नासत्य और दूसरे का नाम दस्त्र था। उल्लेखनीय है कि हिन्दुओं के प्रमुख रूप से 33 ही देवता हैं 33 करोड़ नहीं।

जब नकुल और सहदेव का जन्म हुआ तब आकाशवाणी हुई की, 'शक्ति और रूप में ये जुड़वा बंधु स्वयं जुड़वा अश्विनों से भी बढ़कर होंगे।'

अगले पन्ने पर जानिए नकुल की शक्ति का राज...
नकुल का परिचय : पाण्डु पत्नी माद्री के जुड़वा पुत्र में से एक नकुल हैं। नकुल सहदेव से बड़े थे। दोनों को ही अश्विनीकुमारों के औरस और पाण्डु के क्षेत्रज पुत्र कहते थे। मद्रदेश के राजा शल्य नकुल-सहदेव के सगे मामा थे। शल्य श्रीराम के कुल से थे। शल्यु कौरवों की ओर से लड़े थे।

नकुल के नाम का अर्थ है परम विद्वान। उनके पिता अश्विनकुमार की तरह की नकुल ने धर्म, नीति और चिकित्साशास्त्र में दक्षता हासिल की थी। मूल रूप से वे पशु चिकित्सक थे। नकुल ने यह शिक्षा गुरु द्रोणाचार्य से ली थी। उन्होंने इसके अलावा अश्‍व विद्या और चिकित्सा में भी निपुणता हासिल की थी।

अज्ञातवास के दौरना नकुल ने भेष बदलकर 'ग्रंथिक' नाम से महाराज विराट की राजधानी उपपलव्य की घुड़शाला में शाही घोड़ों की देखभाल करने का काम किया था। नकुल तलवारबाजी और घुड़सवारी की कला में पारंगत थे। माना जाता है कि वह वर्षा में बिना जल को छुए घुड़सवारी कर सकते थे।

माना जाता है कि वे चंद्रवंशी होकर यदुकुल के थे। उनका द्रौपदी से विवाह हुआ था। द्रौपदी से उनके शतानीक नाम के एक पुत्र भी हुए। इसके अलावा उनकी एक और पत्नी थी जिसका नाम करेणुमती था जिससे उनको निरमित्र नाम के पुत्र की प्राप्ति हुई। करेणुमती चेदिराज की राजकुमारी थीं।

नकुल अत्यंत ही सुंदर थे इसीलिए उनको उनके रूप पर घमंड था। उनकी सुंदरता के कारण उनकी तुलना 'कामदेव' से की जाती थी। इस घमंड के कारण ही स्वर्ग जाते समय मार्ग में ही उनकी मृत्यु हो गई।

अगले पन्ने पर जानिए सहदेव की चमत्कारिक शक्ति...
सहदेव : पाण्डु पत्नी माद्री के जुड़वा पुत्र में से एक सहदेव हैं। इनके भाई का नाम नकुल है। यह भी अपने पिता और भाई की तरह पशुपालन शास्त्र और चिकित्सा में दक्ष थे और अज्ञातवास के समय विराट के यहां इन्होंने भी पशुओं की देखरेख का काम किया था। ये गाय चराने का कार्य भी करते थे।

महाभारत युद्ध में सहदेव के अश्‍व के रथ के अश्व तितर के रंग के थे और उनके रथ पर हंस का ध्वज लहराता था। माना जाता है कि मृत्यु के समय उनकी उम्र 105 वर्ष की थी। सहदेव अच्छे रथ यौद्धा माने जाते हैं।

त्रिकालदर्शी थे सहदेव : सहदेव ने द्रोणाचार्य से ही धर्म, शास्त्र, चिक्तिसा के अलावा ज्योतिष विद्या सीखी थी। सहदेव भविष्य में होने वाली हर घटना को पहले से ही जान लेते थे। वे जानते थे कि महाभारत होने वाली है और कौन किसको मारेगा और कौन विजयी होगा। लेकिन भगवान कृष्ण ने उसे शाप दिया था कि अगर वह इस बारे में लोगों को बताएगा तो उसकी मृत्य हो जाएगी।

सहदेव की कुल चार पत्नियां थीं:- द्रौपदी, विजया, भानुमति और जरासंध की कन्या। द्रौपदी से श्रुतकर्मा, विजया से सुहोत्र पुत्र की प्राप्ति हुई। इसके अलावा इके दो पुत्र और थे जिसमें से एक का नाम सोमक था। सहदेव के नाम नाम से तीन ग्रंथ प्राप्त होते हैं- व्याधिसंधविमर्दन, अग्निस्त्रोत, शकुन परीक्षा।

सहदेव कैसे बन गए त्रिकालदर्शी जानिए एक रहस्य...
कैसे मिली शक्ति : सहदेव के धर्मपिता पाण्डु बहुत ही ज्ञानी थे। उनकी अंतिम इच्छा थी कि उनके पांचों बेटे उनके मृत शरीर को खाएं ताकि उन्होंने जो ज्ञान अर्जित किया है वह उनके पुत्रों में चला जाए! सिर्फ सहदेव ने ही हिम्मत दिखाकर पिता की इच्छा का पालन किया। उन्होंने पिता के मस्तिष्क के तीन हिस्से खाए। पहले टुकड़े को खाते ही सहदेव को इतिहास का ज्ञान हुआ, दूसरे टुकड़े को खाने से वर्तमान का और तीसरे टुकड़े को खाते ही वे भविष्य को देखने लगे। इस तरह वे त्रिकालज्ञ बन गए।

पांडवों ने अलग-अलग दिशाओं में जाकर अपने अपने राज्य का विस्तार किया था। सहदेव ने त्रैपुर एवं पौरवेश्‍वर राजाओं को परास्त कर दक्षिण भारत के समुद्र तटवर्ती राजाओं को परास्त्र किया था। उन्होंने शूर्पाक, तालाकट, दण्डक, समुद्रद्वीपवासी, म्लेच्छ, निषाद, पुरुषाद, कर्णप्रावरण, नरराक्षसयोनि, कालमुख, कोलगिरि, सुरभिपट्टण, ताम्रद्वीप, रामकपर्वत और तिमिंगल आदि राजाओं के राज्य को अपने अधीन कर लिया था।
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2> महाभारत युद्ध के 10 चर्चित श्राप, जानकर रह जाएंगे हैरान+असंख्य बाणों की शय्या परभीष्म

2>|| *महाभारत युद्ध के 10 चर्चित श्राप***( 1 to 2 )

1>-----------------महाभारत युद्ध के 10 चर्चित श्राप, जानकर रह जाएंगे हैरान
2>-----------------इस कारण असंख्य बाणों की शय्या पर लेटे रहे भीष्म
3>-----------------पाण्डेय एवं कौरवों 100 भाइ+एक वहीन के नाम

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1>महाभारत युद्ध के 10 चर्चित श्राप, जानकर रह जाएंगे हैरान


'शाप' शब्द संस्कृत भाषा के 'श्राप' का अपभ्रंश है। 'शाप' को उर्दू में 'बददुआ देना' कहते हैं तो अंग्रेजी में 'कर्स' (curse) कह सकते हैं। कई जगह शाप को शार्प यानी तीखे रूप में भी प्रयोग किया गया है, जैसे अंग्रेजी के नियर को हिन्दी के निकट और नियरे शब्द से लिया गया माना जाता है। आपने सुना होगा 'निन्दक नियरे राखिये'। खैर...
संपूर्ण महाभारत चमत्कार, रहस्य, वरदान और शाप का एक लेखा-जोखा है। महाभारत में वैसे तो सैकड़ों शाप और वरदान मिल जाएंगे लेकिन हम यहां कुछ प्रमुख शाप के बारे में ही बताएंगे, जो बहुत ही ‍चर्चित रहे हैं।


अगले पन्ने पर पहला शाप...

1.=एक बार 'द्यु' नामक वसु ने वशिष्ठ ऋषि की कामधेनु का हरण कर लिया। इससे वशिष्ठ ऋषि ने द्यु से कहा कि ऐसा काम तो मनुष्य करते हैं इसलिए तुम आठों वसु मनुष्य हो जाओ। यह सुनकर वसुओं ने घबराकर वशिष्ठजी की प्रार्थना की तो उन्होंने कहा कि अन्य वसु तो वर्ष का अंत होने पर मेरे शाप से छुटकारा पा जाएंगे, लेकिन इस 'द्यु' को अपनी करनी का फल भोगने के लिए एक जन्म तक मनुष्य बनकर पीड़ा भोगना होगी।
यह सुनकर वसुओं ने गंगाजी के पास जाकर उन्हें वशिष्ठजी के शाप को विस्तार से बताया और यह प्रार्थना की कि 'आप मृत्युलोक में अवतार लेकर हमें गर्भ में धारण करें और ज्यों ही हम जन्म लें, हमें पानी में डुबो दें। इस तरह हम जल्दी से सभी मुक्त हो जाएंगे।' गंगा माता ने स्वीकार कर लिया और वे युक्तिपूर्वक शांतनु राजा की पत्नी बन गईं और शांतनु से वचन भी ले लिया। शांतनु से गंगा के गर्भ में पहले जो 7 पुत्र पैदा हुए थे उन्हें उत्पन्न होते ही गंगाजी ने पानी में डुबो दिया जिससे 7 वसु तो मुक्त हो गए लेकिन 8वें में शांतनु ने गंगा को रोककर इसका कारण जानना चाहा।
गंगाजी ने राजा की बात मानकर वसुओं को वशिष्ठ के शाप का सब हाल कह सुनाया। राजा ने उस 8वें पुत्र को डुबोने नहीं दिया और इस वचनभंगता के कारण गंगा 8वें पुत्र को सौंपकर अंतर्ध्यान हो गईं। यही बालक 'द्यु' नामक वसु था। यही बालक आगे चलकर भीष्म कहलाया।

अगले पन्ने पर दूसरा शाप...
2.=अम्बा का शाप : सत्यवती के गर्भ से महाराज शांतनु को चित्रांगद और विचित्रवीर्य नाम के 2 पुत्र हुए। शांतनु की मृत्यु के बाद चित्रांगद राजा बनाए गए, किंतु गंधर्वों के साथ युद्ध में उनकी मृत्यु हो गई, तब विचित्रवीर्य बालक ही थे। फिर भी भीष्म विचित्रवीर्य को सिंहासन पर बैठाकर खुद राजकार्य देखने लगे। विचित्रवीर्य के युवा होने पर भीष्म ने बलपूर्वक काशीराज की 3 पुत्रियों का हरण कर लिया और वे उसका विवाह विचित्रवीर्य से करना चाहते थे, क्योंकि भीष्म चाहते थे कि किसी भी तरह अपने पिता शांतनु का कुल बढ़े।

लेकिन बाद में बड़ी राजकुमारी अम्बा को छोड़ दिया गया, क्योंकि वह शाल्वराज को चाहती थी, लेकिन शाल्वराज के पास जाने के बाद अम्बा को शाल्वराज ने स्वीकार करने से मना कर दिया। अम्बा के लिए यह दुखदायी स्थिति हो चली थी। अम्बा ने अपनी इस दुर्दशा का कारण भीष्म को समझकर उनकी शिकायत परशुरामजी से की। परशुरामजी ने अन्याय के खिलाफ लड़ने की ठनी। परशुरामजी ने भीष्म से कहा कि 'तुमने अम्बा का बलपूर्वक अपहरण किया है, अत: अब तुम्हें इससे विवाह करना होगा अन्यथा मुझसे युद्ध के लिए तैयार हो जाओ।'

भीष्म और परशुरामजी का 21 दिनों तक भयंकर युद्ध हुआ। अंत में ऋषियों ने परशुराम को सारी व्यथा-कथा और ब्रह्मचर्य के प्रण की बात सुनाई और भीष्म की स्थिति से भी उनको अवगत कराया, तब कहीं परशुरामजी ने ही युद्धविराम किया।

बाद में अम्बा ने बहुत ही द्रवित होकर भीष्म को कहा कि 'तुमने मेरा जीवन बर्बाद कर दिया और अब मुझसे विवाह करने से भी मना कर रहे हो। मैं निस्सहाय स्त्री हूं और तुम शक्तिशाली। तुमने अपनी शक्ति का दुरुपयोग किया। मैं तुम्हारा कुछ भी नहीं बिगाड़ सकती, लेकिन मैं पुरुष के रूप दोबारा जन्म लूंगी और तब तुम्हारे अंत का कारण बनूंगी।'

गौरतलब है कि यही अम्बा प्राण त्यागकर शिखंडी के रूप में जन्म लेती है और ‍भीष्म की मृत्यु का कारण बन जाती है।

अगले पन्ने पर तीसरा शाप...
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3.=पांडु को दिया ऋषि ने शाप : भीष्म की प्रतिज्ञा के बाद कुरुवंश का इतिहास बदल गया। महाभारत के अनुसार पांडु अम्बालिका और ऋषि वेदव्यास के पुत्र थे। वे पांडवों के धर्मपिता और धृतराष्ट्र के छोटे भाई थे। धृतराष्ट्र के अंधे होने के कारण पांडु को हस्तिनापुर का शासक बनाया गया।
एक बार राजा पांडु अपनी दोनों रानियों कुंती और माद्री के साथ आखेट कर रहे थे कि तभी उन्होंने मृग होने के भ्रम में बाण चला दिया, जो एक ऋषि को जाकर लगा। उस समय वह ऋषि अपनी पत्नी के साथ सहवास कर रहे थे और उसी अवस्था में उन्हें बाण लग गया इसलिए उन्होंने पांडु को श्राप दे दिया कि जिस अवस्था में उनकी मृत्यु हो रही है उसी प्रकार जब भी पांडु अपनी पत्नियों के साथ सहवासरत होंगे तो उनकी भी मृत्यु हो जाएगी। उस समय पांडु की कोई संतान नहीं थी। अब उनके लिए यह संकट की बात हो गई थी। जब उन्होंने यह बात कुंती को बताई तो कुंती ने उन्हें ऋषि दुर्वासा द्वारा उनको मिले वरदान की बात कही। इस वरदान से कुंती किसी भी देवता का आवाहन कर उन्हें बुलाकर उनके साथ 'नियोग' कर सकती थी। विवाह पूर्व उन्होंने सूर्यदेव का आवाहन किया था जिसके चलते 'कर्ण' का जन्म हुआ था लेकिन कुंती ने लोक-लज्जा के कारण उसे नदी में बहा दिया था। खैर।

पांडु मान गए तब कुंती ने एक-एक कर कई देवताओं का आवाहन किया। इस प्रकार माद्री ने भी देवताओं का आवाहन किया। तब कुंती को तीन और माद्री को दो पुत्र प्राप्त हुए जिनमें युधिष्ठिर सबसे ज्येष्ठ थे। कुंती के अन्य पुत्र थे भीम और अर्जुन तथा माद्री के पुत्र थे नकुल व सहदेव। कुंती ने धर्मराज, वायु एवं इंद्र देवता का आवाहन किया था तो माद्री ने अश्विन कुमारों का।

एक दिन वर्षा ऋतु का समय था और पांडु और माद्री वन में विहार कर रहे थे। उस समय पांडु अपने काम-वेग पर नियंत्रण न रख सके और माद्री के साथ सहवास करने को उतावले हो गए और तब ऋषि का श्राप महाराज पांडु की मृत्यु के रूप में फलित हुआ। माद्री पांडु की मृत्यु बर्दाश्त नहीं कर सकी और उनके साथ सती हो गई। यह देखकर पुत्रों के पालन-पोषण का भार अब कुंती पर आ गया था। उसने अपने मायके जाने के बजाय हस्तिनापुर का रुख किया।

हस्तिनापुर में रहने वाले ऋषि-मुनि सभी पांडवों को राजा पांडु का पुत्र मानते थे तो वे सभी मिलकर पांडवों को राजमहल छोड़कर आ गए। कुंती के कहने पर सभी ने पांडवों को पांडु का पुत्र मान लिया और उनका स्वागत किया।
राजमहल में कुंती का सामना गांधारी से भी हुआ। कुंती वसुदेवजी की बहन और भगवान श्रीकृष्ण की बुआ थीं, तो गांधारी गंधार नरेश की पुत्री और राजा धृतराष्ट्र की पत्नी थीं।

अगले पन्ने पर चौथा शाप...

4.=कर्ण को मिला शाप : उस काल में द्रोणाचार्य, परशुराम और वेदव्यास को ही ब्रह्मास्त्र चलाना और किसी के द्वारा ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किए जाने पर उसे असफल कर देना याद था। उन्होंने यह विद्या अपने कुछ खास शिष्यों को ही प्रदान की थी। उसमें भी किस तरह ब्रह्मास्त्र को असफल करना, यह कम ही शिष्यों को याद था।
जब द्रोणाचार्य ने कर्ण के सूत पुत्र होने को जानकर ब्रह्मास्त्र विद्या सिखाने से इंकार कर दिया, तब वे परशुराम के पास पहुंच गए। परशुराम ने प्रण लिया था कि वे इस विद्या को किसी ब्राह्मण को ही सिखाएंगे, क्योंकि इस विद्या के दुरुपयोग का खतरा बढ़ गया था। उस काल में तापस, कुशाग्र, विनम्र, ब्रह्मज्ञाता और विद्यावान लोगों को ही ब्राह्मण कहा जाता था।

कर्ण यह सीखना चाहता था तो उसने परशुराम के पास पहुंचकर खुद को ब्राह्मण का पुत्र बताया और उनसे यह विद्या सीख ली। परशुराम ने ब्रह्मास्त्र के अलावा कर्ण को अन्य सभी अस्त्र-शस्त्रों की शिक्षा दी थी।
फिर एक दिन जंगल में कहीं जाते हुए परशुरामजी को थकान महसूस हुई, उन्होंने कर्ण से कहा कि वे थोड़ी देर सोना चाहते हैं। कर्ण ने उनका सिर अपनी गोद में रख लिया। परशुराम गहरी नींद में सो गए। तभी कहीं से एक कीड़ा आया और वह कर्ण की जांघ पर डंक मारने लगा। कर्ण की जांघ पर घाव हो गया। लेकिन परशुराम की नींद खुल जाने के भय से वह चुपचाप बैठा रहा, घाव से खून बहने लगा।

बहते खून ने जब परशुराम को छुआ तो उनकी नींद खुल गई। उन्होंने कर्ण से पूछा कि तुमने उस कीड़े को हटाया क्यों नहीं? कर्ण ने कहा कि आपकी नींद टूटने का डर था इसलिए। परशुराम ने कहा कि किसी ब्राह्मण में इतनी सहनशीलता नहीं हो सकती है। तुम जरूर कोई क्षत्रिय हो। सच-सच बताओ। तब कर्ण ने सच बता दिया।

क्रोधित परशुराम ने कर्ण को उसी समय शाप दिया कि तुमने मुझसे जो भी विद्या सीखी है वह झूठ बोलकर सीखी है इसलिए जब भी तुम्हें इस विद्या की सबसे ज्यादा आवश्यकता होगी, तभी तुम इसे भूल जाओगे। कोई भी दिव्यास्त्र का उपयोग नहीं कर पाओगे।

अगले पन्ने पर पांचवां शाप...

5.=अर्जुन को मिला शाप : अर्जुन सशरीर इन्द्र-सभा में गया तो उसके स्वागत में उर्वशी, रंभा आदि अप्सराओं ने नृत्य किए। अर्जुन के रूप सौंदर्य पर मोहित हो उर्वशी उसके निवास स्थान पर गई और प्रणय निवेदन किया, साथ ही 'इसमें कोई दोष नहीं लगता' इसके पक्ष में अनेक दलीलें भी दीं, किंतु अर्जुन ने अपने दृढ़ इन्द्रिय-संयम का परिचय देते हुए कहा-

यथा कुन्ती च माद्री च शची चैव ममानघै।
तथा च वंशजननी त्वं हि मेऽद्य गरीयसी।।
गच्छ मूर्ध्ना प्रपन्नोऽस्मि पादौ ते वरवर्णिनि।
त्वं हि मे मातृवत् पूज्या रक्ष्योऽहं पुत्रवत् त्वया।।

अर्थात : मेरी दृष्टि में कुंती, माद्री और शची का जो स्थान है, वही तुम्हारा भी है। तुम पुरु वंश की जननी होने के कारण आज मेरे लिए परम गुरुस्वरूप हो। हे वरवर्णिनी! मैं तुम्हारे चरणों में मस्तक रखकर तुम्हारी शरण में आया हूं। तुम लौट जाओ। मेरी दृष्टि में तुम माता के समान पूजनीया हो और पुत्र के समान मानकर तुम्हें मेरी रक्षा करनी चाहिए। -(महाभारत- वनपर्वणि इन्द्रलोकाभिगमन पर्व 46.46.47)

उर्वशी अपने कामुक प्रदर्शन और तर्क देकर अपनी काम-वासना तृप्त करने में असफल रही तो क्रोधित होकर उसने अर्जुन को 1 वर्ष तक नपुंसक होने का शाप दे दिया। अर्जुन ने उर्वशी से शापित होना स्वीकार किया, परंतु संयम नहीं तोड़ा।

जब यह बात उनके पिता इन्द्र को पता चली तो उन्होंने अर्जुन से कहा, 'हे पुत्र! तुमने तो अपने इन्द्रिय संयम द्वारा ऋषियों को भी पराजित कर दिया। तुम जैसे पुत्र को पाकर कुंती वास्तव में श्रेष्ठ पुत्र वाली है। उर्वशी का शाप तुम्हें वरदान रूप सिद्ध होगा। भूतल पर वनवास के 13वें वर्ष में तुम्हें अज्ञातवास करना पड़ेगा, उस समय यह सहायक होगा। उसके बाद तुम अपना पुरुषत्व फिर से प्राप्त कर लोगे।'

इस शाप के चलते अज्ञातवास के समय अर्जुन ने विराट के महल में नर्तक वेश में रहकर विराट की राजकुमारी को संगीत और नृत्य विद्या सिखाई थी, तत्पश्चात वे शापमुक्त हो गए थे।

अगले पन्ने पर छठा शाप...

6.=श्रीकृष्ण वंश के नाश का शाप : धर्म के विरुद्ध आचरण करने के दुष्परिणामस्वरूप अंत में दुर्योधन आदि मारे गए और कौरव वंश का विनाश हो गया। महाभारत युद्ध के पश्चात सांत्वना देने के उद्देश्य से भगवान श्रीकृष्ण गांधारी के पास गए। गांधारी अपने 100 पुत्रों की मृत्यु के शोक में अत्यंत व्याकुल थीं। भगवान श्रीकृष्ण को देखते ही गांधारी ने क्रोधित होकर उन्हें शाप दिया कि तुम्हारे कारण जिस प्रकार से मेरे 100 पुत्रों का नाश हुआ है, उसी प्रकार तुम्हारे वंश का भी आपस में एक-दूसरे को मारने के कारण नाश हो जाएगा। भगवान श्रीकृष्ण ने गांधारी से कहा- देवी, मैं आपके दुख को समझ सकता हूं। यदि मेरे वंश के नाश से तुम्हे आत्मशांति मिलती है तो ऐसा ही होगा।

भगवान श्रीकृष्ण ने माता गांधारी के उस शाप को पूर्ण करने के लिए अपने कुल के यादवों की मति फेर दी। इसका यह मतलब नहीं कि गांधारी ने यदुओं के वंश के नाश का शाप दिया था, उन्होंने तो सिर्फ कृष्ण वंश को शाप था।

महाभारत का युद्ध समाप्त हो चुका था। कृष्ण द्वारिका में ही रहते थे। पांडव भी युधिष्ठिर को राज्य सौंपकर जंगल चले गए थे। एक दिन अहंकार के वश में आकर कुछ यदुवंशी बालकों ने दुर्वासा ऋषि का अपमान कर दिया। गांधारी के बाद इस पर दुर्वासा ऋषि ने भी शाप दे दिया कि तुम्हारे वंश का नाश हो जाए।
उनके शाप के प्रभाव से कृष्ण के सभी यदुवंशी भयभीत हो गए। इस भय के चलते ही एक दिन कृष्ण की आज्ञा से वे सभी एक यदु पर्व पर सोमनाथ के पास स्थित प्रभास क्षेत्र में आ गए। पर्व के हर्ष में उन्होंने अति नशीली मदिरा पी ली और मतवाले होकर एक-दूसरे को मारने लगे। इस तरह भगवान श्रीकृष्ण को छोड़कर कुछ ही जीवित बचे रह गए।
एक कथा के अनुसार संयाग से साम्ब के पेट से निकले मूसल को जब भगवान श्रीकृष्ण की आज्ञा से रगड़ा गया था तो उसके चूर्ण को इसी तीर्थ के तट पर फेंका गया था जिससे उत्पन्न हुई झाड़ियों को यादवों ने एक-दूसरे को मारना शुरू किया था। ऋषियों के श्राप से उत्पन्न हुई इन्हीं झाड़ियों ने तीक्ष्ण अस्त्र-शस्त्रों का काम किया ओर सारे प्रमुख यदुवंशियों का यहां विनाश हुआ। महाभारत के मौसल पर्व में इस युद्ध का रोमांचकारी विवरण है। सारे यादव प्रमुख इस गृहयुद्ध में मारे गए।

बचे लोगों ने कृष्ण के कहे अनुसार द्वारका छोड़ दी और हस्तिनापुर की शरण ली। यादवों और उनके भौज्य गणराज्यों का अंत होते ही कृष्ण की बसाई द्वारिका सागर में डूब गई।

भगवान कृष्ण इसी प्रभास क्षेत्र में अपने कुल का नाश देखकर बहुत व्यथित हुए। वे वहीं रहने लगे। उनसे मिलने कभी-कभार युधिष्ठिर आते थे। एक दिन वे इसी प्रभास क्षेत्र के वन में एक पीपल के वृक्ष के नीचे योगनिद्रा में लेटे थे, तभी 'जरा' नामक एक बहेलिए ने भूलवश उन्हें हिरण समझकर विषयुक्त बाण चला दिया, जो उनके पैर के तलुवे में जाकर लगा और भगवान श्रीकृष्ण ने इसी को बहाना बनाकर देह त्याग दी। महाभारत युद्ध के ठीक 36 वर्ष बाद उन्होंने अपनी देह इसी क्षेत्र में त्याग दी थी। महाभारत का युद्ध हुआ था, तब वे लगभग 56 वर्ष के थे। उनका जन्म 3112 ईसा पूर्व हुआ था। इस मान से 3020 ईसा पूर्व उन्होंने 92 वर्ष की उम्र में देह त्याग दी थी।

अंत में कृष्ण के प्रपौत्र वज्र अथवा वज्रनाभ द्वारिका के यदुवंश के अंतिम शासक थे, जो यदुओं की आपसी लड़ाई में जीवित बच गए थे। द्वारिका के समुद्र में डूबने पर अर्जुन द्वारिका गए और वज्र तथा शेष बची यादव महिलाओं को हस्तिनापुर ले गए। कृष्ण के प्रपौत्र वज्र को हस्तिनापुर में मथुरा का राजा घोषित किया। वज्रनाभ के नाम से ही मथुरा क्षेत्र को ब्रजमंडल कहा जाता है।

7.=अगले पन्ने पर सातवां शाप...

अश्वत्थामा को श्रीकृष्ण ने दिया शाप : महाभारत के युद्ध में अश्वत्‍थामा ने ब्रह्मास्त्र छोड़ दिया था जिसके चलते लाखों लोग मारे गए थे। अश्वत्थामा के इस कृत्य से कृष्ण क्रोधित हो गए थे और उन्होंने अश्वत्थामा को शाप दिया था कि 'तू इतने वधों का पाप ढोता हुआ 3,000 वर्ष तक निर्जन स्थानों में भटकेगा। तेरे शरीर से सदैव रक्त की दुर्गंध नि:सृत होती रहेगी। तू अनेक रोगों से पीड़ित रहेगा।' व्यास ने श्रीकृष्ण के वचनों का अनुमोदन किया।
कहते हैं कि अश्वत्‍थामा इस शाप के बाद रेगिस्तानी इलाके में चला गया था और वहां रहने लगा था। कुछ लोग मानते हैं कि वह अरब चला गया था। उत्तरप्रदेश में प्रचलित मान्यता अनुसार अरब में उसने कृष्ण और पांडवों के धर्म को नष्ट करने की प्रतिज्ञा ली थी। हालांकि भारत में लोग दावा करते हैं कि अमुक जगहों पर अश्वत्थामा आता रहता है, लेकिन अब तक इसकी सचाई की पुष्टि नहीं हुई है। यदि हम यह मानें कि उनको मात्र 3,000 वर्षों तक जिंदा रहने का ही शाप था, तो फिर वे अब तक मर चुके होंगे, क्योंकि महाभारत युद्ध को हुए 3,000 वर्ष कभी के हो चुके हैं। लेकिन यदि उनको कलिकाल के अंत तक भटकने का शाप दिया गया था तो...

अगले पन्ने पर आठवां शाप...

8.='दुर्योधन को मिला शाप : एक बार वेदव्यास ने धृतराष्ट्र से मिलकर कहा कि महर्षि मैत्रेय यहां आ रहे हैं। वे पाण्डवों से मिलकर अब आप लोगों से मिलना चाहते हैं। वे ही तुम्हारे पुत्र को पांडवों से मेल-मिलाप का उपदेश देंगे। इस बात की सूचना मैं दे देता हूं कि वे जो कुछ भी कहे, बिना तर्क-वितर्क के मान लेना। मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं कि मैत्रेय की आज्ञा का उल्लंघन हुआ तो वे क्रोध में आकर शाप भी दे सकते हैं इसलिए शांतिपूर्वक उनकी बातें सुन लेना। अमल करना या नहीं करना, यह तुम्हारे ऊपर निर्भर है। इतना कहकर वेदव्यास जी चले गए।

धृतराष्ट्र महर्षि मैत्रेय के आते ही अपने पुत्रों सहित उनकी सेवा व सत्कार करने लगे। विश्राम के बाद धृतराष्ट्र ने बड़ी विनय के साथ पूछा- भगवन् आपकी यहां तक की यात्रा कैसी रही? पांचों पांडव कुशलपूर्वक तो हैं न। तब मैत्रेयजी ने कहा कि राजन, तीर्थयात्रा करते हुए वहां संयोगवश काम्यक वन में युधिष्ठिर से मेरी भेंट हो गई। वे आजकल तपोवन में रहते हैं। उनके दर्शन के लिए वहां बहुत से ऋषि-मुनि आते हैं। मैंने वहीं यह सुना कि तुम्हारे पुत्रों ने पाण्डवों को जुए में धोखे से हराकर वन भेज दिया। वहां से मैं तुम्हारे पास आया हूं।

उन्होंने धृतराष्ट्र से इतना कहकर पीछे मुड़ते हुए दुर्योधन से कहा, तुम जानते हो पाण्डव कितने वीर और शक्तिशाली हैं। तुम्हें उनकी शक्ति का अंदाजा नहीं है शायद इसलिए तुम ऐसी बात कर रहे हो इसलिए तुम्हें उनके साथ मेल कर लेना चाहिए मेरी बात मान लो। गुस्से में ऐसा अनर्थ मत करो।

महर्षि मैत्रेय की बात सुनकर दुर्योधन को क्रोध आ गया और वह व्यंग्यपूर्ण मुस्कुराते हए पैर से जमीन कुरेदने लगा और हद तो तब हो गई, जब उसने अपनी जांघ पर हाथ से ताल ठोंक दी। दुर्योधन की यह उद्दण्डता देखकर महर्षि को क्रोध आया। तब उन्होंने दुर्योधन को शाप दिया। तू मेरा तिरस्कार करता है, मेरी बात शांतिपूर्वक सुन नहीं सकता। जा उद्दण्डी जिस जंघा पर तू ताल ठोंक रहा है, उस जंघा को भीम अपनी गदा से तोड़ देगा। बाद में कौरव और पांडवों का घोर युद्ध हुआ और भीम ने दुर्योधन की जंघा पर वार कर अंत में उसकी जंघा उखाड़ फेंकी।

अगले पन्ने पर नौवां शाप...

9.=द्रौपदी ने घटोत्कच को शाप दिया : जब घटोत्कच पहली बार अपने पिता भीम के राज्य में आया तो अपनी मां (हिडिम्बा) की आज्ञा के अनुसार उसने द्रौपदी को कोई सम्मान नहीं दिया।

द्रौपदी को अपमान महसूस हुआ और उसे बहुत गुस्सा आया। वह उस पर चिल्लाई कि वह एक विशिष्ट स्त्री है, वह युधिष्ठिर की रानी है, वह ब्राह्मण राजा की पुत्री है तथा उसकी प्रतिष्ठा पांडवों से कहीं अधिक है। और उसने अपनी दुष्ट राक्षसी मां के कहने पर बड़ों, ऋषियों और राजाओं से भरी सभा में उसका अपमान किया है। जा दुष्‍ट तेरा जीवन बहुत छोटा होगा तथा तू बिना किसी लड़ाई के मारा जाएगा।

अगले पन्ने पर दसवां शाप...

10.=राजा परीक्षित को शाप : एक बार राजा परीक्षित आखेट हेतु वन में गए। वन्य पशुओं के पीछे दौड़ने के कारण वे प्यास से व्याकुल हो गए तथा जलाशय की खोज में इधर-उधर घूमते-घूमते वे शमीक ऋषि के आश्रम में पहुंच गए। वहां पर शमीक ऋषि नेत्र बंद किए हुए ब्रह्म ध्यान में लीन बैठे थे। राजा परीक्षित ने उनसे जल मांगा किंतु ध्यानमग्न होने के कारण शमीक ऋषि ने कुछ भी उत्तर नहीं दिया।

सिर पर स्वर्ण मुकुट पर निवास करते हुए कलियुग के प्रभाव से राजा परीक्षित को प्रतीत हुआ कि यह ऋषि ध्यानस्थ होने का ढोंग कर मेरा अपमान कर रहा है। उन्हें ऋषि पर बहुत क्रोध आया। उन्होंने अपने अपमान का बदला लेने के उद्देश्य से पास ही पड़े हुए एक मृत सर्प को अपने धनुष की नोंक से उठाकर ऋषि के गले में डाल दिया और अपने नगर वापस आ गए।

शमीक ऋषि जब ध्यान साधना से जाग्रत हुए तो उन्होंने अपने गले में पड़े मृत सर्प को देखा। उन्हें ज्ञात ही नहीं हो पाया था कि उनके साथ राजा ने क्या किया है। उस दौरान शमीक ऋषि के पुत्र ऋंगी ऋषि आ पहुंचे और जब उन्होंने जाना कि उनके पिता का राजा ने अपमान किया है तो वे बहुत क्रोधित हुए। उन्होंने सोचा कि यदि यह राजा जीवित रहेगा तो इसी प्रकार ऋषियों का अपमान करता रहेगा। इस प्रकार विचार करके उस ऋषिकुमार ने तुरंत ही कमंडल से अपनी अंजुली में जल लेकर तथा उसे मंत्रों से अभिमंत्रित करके राजा परीक्षित को यह शाप दे दिया कि जा तुझे आज से 7वें दिन तक्षक सर्प डसेगा।

शमीक ऋषि कुछ समझ पाते इससे पहले तो ऋंगी ऋषि ने शाप दे डाला। शमीक ऋषि ने अपने पुत्र से कहा कि तूने यह अच्छा नहीं किया। वह राजा तो प्रजा का रक्षक है। उसने इतना बड़ा अपराध भी नहीं किया था कि उसे इतना बड़ा शाप दिया जाए। शमीक को बहुत पश्चाताप हुआ।
उल्लेखनीय है कि द्रोण पुत्र अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र प्रहार से उत्तरा ने मृत शिशु को जन्म दिया था किंतु भगवान श्रीकृष्ण ने अभिमन्यु-उत्तरा पुत्र को ब्रह्मास्त्र के प्रयोग के बाद भी फिर से जीवित कर दिया था यही बालक आगे चलकर राजा परीक्षित नाम से प्रसिद्ध हुआ। परीक्षित के प्रतापी पुत्र हुए जन्मेजय।

जन्मेजय को जब यह पता चला कि मेरे‍ पिता की मृत्यु सर्पदंश से हुई तो उन्होंने विश्‍व के सभी सर्पों को मारने के लिए नागदाह यज्ञ करवाए थे। उन यज्ञों में नागों को पटक दिया जाता था। एक विशिष्ट मंत्र द्वारा नाग स्वयं यज्ञ के पास पहुंच जाते थे। देशभर में नागदाह नामक स्थान मिल जाएंगे। सर्पदाह के एक घनघोर यज्ञ की अग्नि से एक कर्कोटक नामक सर्प ने अपनी जान बचाने के लिए उज्जैन में महाकाल राजा की शरण ले ली थी जिसके चलते वह बच गया था।
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2> इस कारण असंख्य बाणों की शय्या पर लेटे रहे भीष्म

 महाभारत के युद्ध से कौन नहीं परिचित है। इसी में एक महानायक थे। भीष्म पितामह जो कि कौरवों और पांडवों दोने के पितामह थे। साथ ही गंगा के पुत्र। साथ ही आपने ये भी सुना होगा कि वह एक ही मात्र ऐसे शख्स थे जो कि कि बाण की शय्या में पूरे 10 दिनों के लिए लेटे रहे थे। लेकिन आप यह बात नहीं जानते है कि वह अपनी जिंदगी के अंतिम क्षणों में शय़्या में ही क्यों लेते रहे थे।

जबकि उसके शरीर से तीर निकाला जा सकता था। साथ ही वह चाहते तो तुरंत ही अपने प्राण त्याग सकते है थे। आखिर इसके पीछे क्या कारण था। जानिए इसके पीछे किया है कहानी।

जब कौरवों और पांडवों के बीच छिड़े भीषण संग्राम में पांडवों के प्रलयंकारी योद्धा वीर अर्जुन ने शिखंडी का सहारा लेते हुए भीष्म पितामह को अपने शस्त्र रखने पर मजबूर कर दिया और इसी बीच श्रीकृष्ण के कहने पर अर्जुन ने कई सौ बाण इकट्ठे भीष्म पर छोड़ दिए थे। ये बाण भीष्म के शरीर में अंदर तक गड़ गए। इन बाणों ने गंगापुत्र भीष्म के हर अंग को छेदकर रख दिया। लेकिन इतने बाणों से छिद जाने के बाद भी भीष्म की मृत्यु नहीं हुई, क्योंकि उनका भाग्य कुछ अलग था।


इस खबर को फैलने पर कौरवों की सेना में हाहाकार मच जाता है। दोनों दलों के सैनिक और सेनापति युद्ध करना छोड़कर भीष्म के पास एकत्र हो जाते हैं। दोनों दलों के राजाओं से भीष्म कहते हैं, राजन्यगण। मेरा सिर नीचे लटक रहा है। मुझे उपयुक्त तकिया चाहिए। इतना कहते हुए तमाम राजा और योद्धा मूल्यवान और तरह-तरह के तकिए ले आते हैं।

लेकिन भीष्म उनमें से एक को भी न लिया और मुस्कुरा कर कहा कि ये तकिए इस वीर शय्या के काम में आने योग्य नहीं हैं राजन। फिर वे अर्जुन की ओर देखकर कहते हैं, पुत्र, तुम तो क्षत्रिय धर्म के विद्वान हो। क्या तुम मुझे उपयुक्त तकिया दे सकते हो?' इतना सुनते हुए अर्जुन ने आंखों में आंसू लिए उनको अभिवादन कर भीष्म को बड़ी तेजी से ऐसे 3 बाण मारे, जो उनके ललाट को छेदते हुए पृथ्वी में जा लगे। इसीलिए इससे इनको आराम मिला।
भीष्म ये बात अच्छी तरह से जानते थे कि सूर्य के उत्तरायण होने पर प्राण त्यागने पर आत्मा को सद्गति मिलती है और वे पुन: अपने लोक जाकर मुक्त हो जाएंगे इसीलिए वे सूर्य के उत्तरायण होने का इंतजार करते हैं। और 10 दिनों के लिए सूर्य डूब चुका था। जिसके कारण उन्होने अपने शरीर का त्याग नहीं किया था। साथ ही भीष्म को अपने पिता शांतनु से यब वरदान मिला था कि वह अपनी इच्छा से मृत्यु पा सकते है।

भीष्म को ठीक करने के लिए शल्य चिकित्सक लाए जाते हैं, लेकिन वे उनको लौटा देते हैं और कहते हैं कि अब तो मेरा अंतिम समय आ गया है। यह सब व्यर्थ है। ये शय्या ही मेरी चिता है। अब मैं तो बस सूर्य के उत्तरायण होने का इंतजार कर रहा हूं।

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3>पाण्डेय एवं कौरवों 100 भाइ+एक वहीन के नाम

पाण्डव पाँच भाई थे जिनके नाम हैं -
1. युधिष्ठिर 2. भीम 3. अर्जुन 4. नकुल। 5. सहदेव

( इन पांचों के अलावा , महाबली कर्ण भी कुंती के ही पुत्र थे , परन्तु उनकी गिनती पांडवों में नहीं की जाती है )

यहाँ ध्यान रखें कि… पाण्डु के उपरोक्त पाँचों पुत्रों में से युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन
की माता कुन्ती थीं ……तथा , नकुल और सहदेव की माता माद्री थी ।

वहीँ …. धृतराष्ट्र और गांधारी के सौ पुत्र…..
कौरव कहलाए जिनके नाम हैं -
1. दुर्योधन-----------2. दुःशासन ------3. दुःसह-------------4. दुःशल -------5. जलसंघ 
6. सम---------------7. सह ------------8. विंद ---------------9. अनुविंद-----10. दुर्धर्ष 
11. सुबाहु। ---------12. दुषप्रधर्षण ---13. दुर्मर्षण। ---------14. दुर्मुख -----15. दुष्कर्ण
16. विकर्ण ----------17. शल ---------18. सत्वान------------19. सुलोचन---20. चित्र 
21. उपचित्र ---------22. चित्राक्ष ------23. चारुचित्र ---------24. शरासन ---25. दुर्मद। 
26. दुर्विगाह --------27. विवित्सु ------28. विकटानन्द ------29. ऊर्णनाभ --30. सुनाभ
31. नन्द। -----------32. उपनन्द ------33. चित्रबाण ---------34. चित्रवर्मा ---35. सुवर्मा 
36. दुर्विमोचन ------37. अयोबाहु -----38. महाबाहु ---------39. चित्रांग -----40. चित्रकुण्डल
41. भीमवेग --------42. भीमबल ------43. बालाकि ---------44. बलवर्धन ----45. उग्रायुध
46. सुषेण -----------47. कुण्डधर -----48. महोदर ----------49. चित्रायुध ----50. निषंगी 
51. पाशी ------------52. वृन्दारक -----53. दृढ़वर्मा ----------54. दृढ़क्षत्र -----55. सोमकीर्ति 
56. अनूदर-----------57. दढ़संघ -------58. जरासंघ ---------59. सत्यसंघ ---60. सद्सुवाक
61. उग्रश्रवा ---------62. उग्रसेन -------63. सेनानी-----------64. दुष्पराजय--65. अपराजित
66. कुण्डशायी ------67. विशालाक्ष ----68. दुराधर ----------69. दृढ़हस्त ----70. सुहस्त
71. वातवेग---------  72. सुवर्च ---------73. आदित्यकेतु -----74. बह्वाशी ----75. नागदत्त 
76. उग्रशायी-------- 77. कवचि --------78. क्रथन। ----------79. कुण्डी ------80. भीमविक्र
81. धनुर्धर----------  82. वीरबाहु -------83. अलोलुप --------84.अभय-------------85. दृढ़कर्मा
86. दृढ़रथाश्रय ------87. अनाधृष्य------ 88. कुण्डभेदी।------89. विरवि -------90. चित्रकुण्डल 
 91. प्रधम----------- 92. अमाप्रमाथि ---93. दीर्घरोमा-------- 94. सुवीर्यवान ---95. दीर्घबाहु
96. सुजात।--- ------97. कनकध्वज----98. कुण्डाशी --------99. विरज-------- 100. युयुत्सु

( इन 100 भाइयों के अलावा कौरवों की एक बहनभी थी… जिसका नाम""दुशाला""था,
जिसका विवाह"जयद्रथ"सेहुआ था )
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