2>|| *महाभारत युद्ध के 10 चर्चित श्राप***( 1 to 2 )
1>-----------------महाभारत युद्ध के 10 चर्चित श्राप, जानकर रह जाएंगे हैरान
2>-----------------इस कारण असंख्य बाणों की शय्या पर लेटे रहे भीष्म
3>-----------------पाण्डेय एवं कौरवों 100 भाइ+एक वहीन के नाम
3>-----------------पाण्डेय एवं कौरवों 100 भाइ+एक वहीन के नाम
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1>महाभारत युद्ध के 10 चर्चित श्राप, जानकर रह जाएंगे हैरान
'शाप' शब्द संस्कृत भाषा के 'श्राप' का अपभ्रंश है। 'शाप' को उर्दू में 'बददुआ देना' कहते हैं तो अंग्रेजी में 'कर्स' (curse) कह सकते हैं। कई जगह शाप को शार्प यानी तीखे रूप में भी प्रयोग किया गया है, जैसे अंग्रेजी के नियर को हिन्दी के निकट और नियरे शब्द से लिया गया माना जाता है। आपने सुना होगा 'निन्दक नियरे राखिये'। खैर...
संपूर्ण महाभारत चमत्कार, रहस्य, वरदान और शाप का एक लेखा-जोखा है। महाभारत में वैसे तो सैकड़ों शाप और वरदान मिल जाएंगे लेकिन हम यहां कुछ प्रमुख शाप के बारे में ही बताएंगे, जो बहुत ही चर्चित रहे हैं।
अगले पन्ने पर पहला शाप...
1.=एक बार 'द्यु' नामक वसु ने वशिष्ठ ऋषि की कामधेनु का हरण कर लिया। इससे वशिष्ठ ऋषि ने द्यु से कहा कि ऐसा काम तो मनुष्य करते हैं इसलिए तुम आठों वसु मनुष्य हो जाओ। यह सुनकर वसुओं ने घबराकर वशिष्ठजी की प्रार्थना की तो उन्होंने कहा कि अन्य वसु तो वर्ष का अंत होने पर मेरे शाप से छुटकारा पा जाएंगे, लेकिन इस 'द्यु' को अपनी करनी का फल भोगने के लिए एक जन्म तक मनुष्य बनकर पीड़ा भोगना होगी।
यह सुनकर वसुओं ने गंगाजी के पास जाकर उन्हें वशिष्ठजी के शाप को विस्तार से बताया और यह प्रार्थना की कि 'आप मृत्युलोक में अवतार लेकर हमें गर्भ में धारण करें और ज्यों ही हम जन्म लें, हमें पानी में डुबो दें। इस तरह हम जल्दी से सभी मुक्त हो जाएंगे।' गंगा माता ने स्वीकार कर लिया और वे युक्तिपूर्वक शांतनु राजा की पत्नी बन गईं और शांतनु से वचन भी ले लिया। शांतनु से गंगा के गर्भ में पहले जो 7 पुत्र पैदा हुए थे उन्हें उत्पन्न होते ही गंगाजी ने पानी में डुबो दिया जिससे 7 वसु तो मुक्त हो गए लेकिन 8वें में शांतनु ने गंगा को रोककर इसका कारण जानना चाहा।
गंगाजी ने राजा की बात मानकर वसुओं को वशिष्ठ के शाप का सब हाल कह सुनाया। राजा ने उस 8वें पुत्र को डुबोने नहीं दिया और इस वचनभंगता के कारण गंगा 8वें पुत्र को सौंपकर अंतर्ध्यान हो गईं। यही बालक 'द्यु' नामक वसु था। यही बालक आगे चलकर भीष्म कहलाया।
1.=एक बार 'द्यु' नामक वसु ने वशिष्ठ ऋषि की कामधेनु का हरण कर लिया। इससे वशिष्ठ ऋषि ने द्यु से कहा कि ऐसा काम तो मनुष्य करते हैं इसलिए तुम आठों वसु मनुष्य हो जाओ। यह सुनकर वसुओं ने घबराकर वशिष्ठजी की प्रार्थना की तो उन्होंने कहा कि अन्य वसु तो वर्ष का अंत होने पर मेरे शाप से छुटकारा पा जाएंगे, लेकिन इस 'द्यु' को अपनी करनी का फल भोगने के लिए एक जन्म तक मनुष्य बनकर पीड़ा भोगना होगी।
यह सुनकर वसुओं ने गंगाजी के पास जाकर उन्हें वशिष्ठजी के शाप को विस्तार से बताया और यह प्रार्थना की कि 'आप मृत्युलोक में अवतार लेकर हमें गर्भ में धारण करें और ज्यों ही हम जन्म लें, हमें पानी में डुबो दें। इस तरह हम जल्दी से सभी मुक्त हो जाएंगे।' गंगा माता ने स्वीकार कर लिया और वे युक्तिपूर्वक शांतनु राजा की पत्नी बन गईं और शांतनु से वचन भी ले लिया। शांतनु से गंगा के गर्भ में पहले जो 7 पुत्र पैदा हुए थे उन्हें उत्पन्न होते ही गंगाजी ने पानी में डुबो दिया जिससे 7 वसु तो मुक्त हो गए लेकिन 8वें में शांतनु ने गंगा को रोककर इसका कारण जानना चाहा।
गंगाजी ने राजा की बात मानकर वसुओं को वशिष्ठ के शाप का सब हाल कह सुनाया। राजा ने उस 8वें पुत्र को डुबोने नहीं दिया और इस वचनभंगता के कारण गंगा 8वें पुत्र को सौंपकर अंतर्ध्यान हो गईं। यही बालक 'द्यु' नामक वसु था। यही बालक आगे चलकर भीष्म कहलाया।
अगले पन्ने पर दूसरा शाप...
2.=अम्बा का शाप : सत्यवती के गर्भ से महाराज शांतनु को चित्रांगद और विचित्रवीर्य नाम के 2 पुत्र हुए। शांतनु की मृत्यु के बाद चित्रांगद राजा बनाए गए, किंतु गंधर्वों के साथ युद्ध में उनकी मृत्यु हो गई, तब विचित्रवीर्य बालक ही थे। फिर भी भीष्म विचित्रवीर्य को सिंहासन पर बैठाकर खुद राजकार्य देखने लगे। विचित्रवीर्य के युवा होने पर भीष्म ने बलपूर्वक काशीराज की 3 पुत्रियों का हरण कर लिया और वे उसका विवाह विचित्रवीर्य से करना चाहते थे, क्योंकि भीष्म चाहते थे कि किसी भी तरह अपने पिता शांतनु का कुल बढ़े।
लेकिन बाद में बड़ी राजकुमारी अम्बा को छोड़ दिया गया, क्योंकि वह शाल्वराज को चाहती थी, लेकिन शाल्वराज के पास जाने के बाद अम्बा को शाल्वराज ने स्वीकार करने से मना कर दिया। अम्बा के लिए यह दुखदायी स्थिति हो चली थी। अम्बा ने अपनी इस दुर्दशा का कारण भीष्म को समझकर उनकी शिकायत परशुरामजी से की। परशुरामजी ने अन्याय के खिलाफ लड़ने की ठनी। परशुरामजी ने भीष्म से कहा कि 'तुमने अम्बा का बलपूर्वक अपहरण किया है, अत: अब तुम्हें इससे विवाह करना होगा अन्यथा मुझसे युद्ध के लिए तैयार हो जाओ।'
भीष्म और परशुरामजी का 21 दिनों तक भयंकर युद्ध हुआ। अंत में ऋषियों ने परशुराम को सारी व्यथा-कथा और ब्रह्मचर्य के प्रण की बात सुनाई और भीष्म की स्थिति से भी उनको अवगत कराया, तब कहीं परशुरामजी ने ही युद्धविराम किया।
भीष्म और परशुरामजी का 21 दिनों तक भयंकर युद्ध हुआ। अंत में ऋषियों ने परशुराम को सारी व्यथा-कथा और ब्रह्मचर्य के प्रण की बात सुनाई और भीष्म की स्थिति से भी उनको अवगत कराया, तब कहीं परशुरामजी ने ही युद्धविराम किया।
बाद में अम्बा ने बहुत ही द्रवित होकर भीष्म को कहा कि 'तुमने मेरा जीवन बर्बाद कर दिया और अब मुझसे विवाह करने से भी मना कर रहे हो। मैं निस्सहाय स्त्री हूं और तुम शक्तिशाली। तुमने अपनी शक्ति का दुरुपयोग किया। मैं तुम्हारा कुछ भी नहीं बिगाड़ सकती, लेकिन मैं पुरुष के रूप दोबारा जन्म लूंगी और तब तुम्हारे अंत का कारण बनूंगी।'
गौरतलब है कि यही अम्बा प्राण त्यागकर शिखंडी के रूप में जन्म लेती है और भीष्म की मृत्यु का कारण बन जाती है।
गौरतलब है कि यही अम्बा प्राण त्यागकर शिखंडी के रूप में जन्म लेती है और भीष्म की मृत्यु का कारण बन जाती है।
अगले पन्ने पर तीसरा शाप...
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3.=पांडु को दिया ऋषि ने शाप : भीष्म की प्रतिज्ञा के बाद कुरुवंश का इतिहास बदल गया। महाभारत के अनुसार पांडु अम्बालिका और ऋषि वेदव्यास के पुत्र थे। वे पांडवों के धर्मपिता और धृतराष्ट्र के छोटे भाई थे। धृतराष्ट्र के अंधे होने के कारण पांडु को हस्तिनापुर का शासक बनाया गया।
एक बार राजा पांडु अपनी दोनों रानियों कुंती और माद्री के साथ आखेट कर रहे थे कि तभी उन्होंने मृग होने के भ्रम में बाण चला दिया, जो एक ऋषि को जाकर लगा। उस समय वह ऋषि अपनी पत्नी के साथ सहवास कर रहे थे और उसी अवस्था में उन्हें बाण लग गया इसलिए उन्होंने पांडु को श्राप दे दिया कि जिस अवस्था में उनकी मृत्यु हो रही है उसी प्रकार जब भी पांडु अपनी पत्नियों के साथ सहवासरत होंगे तो उनकी भी मृत्यु हो जाएगी। उस समय पांडु की कोई संतान नहीं थी। अब उनके लिए यह संकट की बात हो गई थी। जब उन्होंने यह बात कुंती को बताई तो कुंती ने उन्हें ऋषि दुर्वासा द्वारा उनको मिले वरदान की बात कही। इस वरदान से कुंती किसी भी देवता का आवाहन कर उन्हें बुलाकर उनके साथ 'नियोग' कर सकती थी। विवाह पूर्व उन्होंने सूर्यदेव का आवाहन किया था जिसके चलते 'कर्ण' का जन्म हुआ था लेकिन कुंती ने लोक-लज्जा के कारण उसे नदी में बहा दिया था। खैर।
पांडु मान गए तब कुंती ने एक-एक कर कई देवताओं का आवाहन किया। इस प्रकार माद्री ने भी देवताओं का आवाहन किया। तब कुंती को तीन और माद्री को दो पुत्र प्राप्त हुए जिनमें युधिष्ठिर सबसे ज्येष्ठ थे। कुंती के अन्य पुत्र थे भीम और अर्जुन तथा माद्री के पुत्र थे नकुल व सहदेव। कुंती ने धर्मराज, वायु एवं इंद्र देवता का आवाहन किया था तो माद्री ने अश्विन कुमारों का।
एक दिन वर्षा ऋतु का समय था और पांडु और माद्री वन में विहार कर रहे थे। उस समय पांडु अपने काम-वेग पर नियंत्रण न रख सके और माद्री के साथ सहवास करने को उतावले हो गए और तब ऋषि का श्राप महाराज पांडु की मृत्यु के रूप में फलित हुआ। माद्री पांडु की मृत्यु बर्दाश्त नहीं कर सकी और उनके साथ सती हो गई। यह देखकर पुत्रों के पालन-पोषण का भार अब कुंती पर आ गया था। उसने अपने मायके जाने के बजाय हस्तिनापुर का रुख किया।
हस्तिनापुर में रहने वाले ऋषि-मुनि सभी पांडवों को राजा पांडु का पुत्र मानते थे तो वे सभी मिलकर पांडवों को राजमहल छोड़कर आ गए। कुंती के कहने पर सभी ने पांडवों को पांडु का पुत्र मान लिया और उनका स्वागत किया।
राजमहल में कुंती का सामना गांधारी से भी हुआ। कुंती वसुदेवजी की बहन और भगवान श्रीकृष्ण की बुआ थीं, तो गांधारी गंधार नरेश की पुत्री और राजा धृतराष्ट्र की पत्नी थीं।
अगले पन्ने पर चौथा शाप...
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3.=पांडु को दिया ऋषि ने शाप : भीष्म की प्रतिज्ञा के बाद कुरुवंश का इतिहास बदल गया। महाभारत के अनुसार पांडु अम्बालिका और ऋषि वेदव्यास के पुत्र थे। वे पांडवों के धर्मपिता और धृतराष्ट्र के छोटे भाई थे। धृतराष्ट्र के अंधे होने के कारण पांडु को हस्तिनापुर का शासक बनाया गया।
एक बार राजा पांडु अपनी दोनों रानियों कुंती और माद्री के साथ आखेट कर रहे थे कि तभी उन्होंने मृग होने के भ्रम में बाण चला दिया, जो एक ऋषि को जाकर लगा। उस समय वह ऋषि अपनी पत्नी के साथ सहवास कर रहे थे और उसी अवस्था में उन्हें बाण लग गया इसलिए उन्होंने पांडु को श्राप दे दिया कि जिस अवस्था में उनकी मृत्यु हो रही है उसी प्रकार जब भी पांडु अपनी पत्नियों के साथ सहवासरत होंगे तो उनकी भी मृत्यु हो जाएगी। उस समय पांडु की कोई संतान नहीं थी। अब उनके लिए यह संकट की बात हो गई थी। जब उन्होंने यह बात कुंती को बताई तो कुंती ने उन्हें ऋषि दुर्वासा द्वारा उनको मिले वरदान की बात कही। इस वरदान से कुंती किसी भी देवता का आवाहन कर उन्हें बुलाकर उनके साथ 'नियोग' कर सकती थी। विवाह पूर्व उन्होंने सूर्यदेव का आवाहन किया था जिसके चलते 'कर्ण' का जन्म हुआ था लेकिन कुंती ने लोक-लज्जा के कारण उसे नदी में बहा दिया था। खैर।
पांडु मान गए तब कुंती ने एक-एक कर कई देवताओं का आवाहन किया। इस प्रकार माद्री ने भी देवताओं का आवाहन किया। तब कुंती को तीन और माद्री को दो पुत्र प्राप्त हुए जिनमें युधिष्ठिर सबसे ज्येष्ठ थे। कुंती के अन्य पुत्र थे भीम और अर्जुन तथा माद्री के पुत्र थे नकुल व सहदेव। कुंती ने धर्मराज, वायु एवं इंद्र देवता का आवाहन किया था तो माद्री ने अश्विन कुमारों का।
एक दिन वर्षा ऋतु का समय था और पांडु और माद्री वन में विहार कर रहे थे। उस समय पांडु अपने काम-वेग पर नियंत्रण न रख सके और माद्री के साथ सहवास करने को उतावले हो गए और तब ऋषि का श्राप महाराज पांडु की मृत्यु के रूप में फलित हुआ। माद्री पांडु की मृत्यु बर्दाश्त नहीं कर सकी और उनके साथ सती हो गई। यह देखकर पुत्रों के पालन-पोषण का भार अब कुंती पर आ गया था। उसने अपने मायके जाने के बजाय हस्तिनापुर का रुख किया।
हस्तिनापुर में रहने वाले ऋषि-मुनि सभी पांडवों को राजा पांडु का पुत्र मानते थे तो वे सभी मिलकर पांडवों को राजमहल छोड़कर आ गए। कुंती के कहने पर सभी ने पांडवों को पांडु का पुत्र मान लिया और उनका स्वागत किया।
राजमहल में कुंती का सामना गांधारी से भी हुआ। कुंती वसुदेवजी की बहन और भगवान श्रीकृष्ण की बुआ थीं, तो गांधारी गंधार नरेश की पुत्री और राजा धृतराष्ट्र की पत्नी थीं।
अगले पन्ने पर चौथा शाप...
4.=कर्ण को मिला शाप : उस काल में द्रोणाचार्य, परशुराम और वेदव्यास को ही ब्रह्मास्त्र चलाना और किसी के द्वारा ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किए जाने पर उसे असफल कर देना याद था। उन्होंने यह विद्या अपने कुछ खास शिष्यों को ही प्रदान की थी। उसमें भी किस तरह ब्रह्मास्त्र को असफल करना, यह कम ही शिष्यों को याद था।
जब द्रोणाचार्य ने कर्ण के सूत पुत्र होने को जानकर ब्रह्मास्त्र विद्या सिखाने से इंकार कर दिया, तब वे परशुराम के पास पहुंच गए। परशुराम ने प्रण लिया था कि वे इस विद्या को किसी ब्राह्मण को ही सिखाएंगे, क्योंकि इस विद्या के दुरुपयोग का खतरा बढ़ गया था। उस काल में तापस, कुशाग्र, विनम्र, ब्रह्मज्ञाता और विद्यावान लोगों को ही ब्राह्मण कहा जाता था।
कर्ण यह सीखना चाहता था तो उसने परशुराम के पास पहुंचकर खुद को ब्राह्मण का पुत्र बताया और उनसे यह विद्या सीख ली। परशुराम ने ब्रह्मास्त्र के अलावा कर्ण को अन्य सभी अस्त्र-शस्त्रों की शिक्षा दी थी।
फिर एक दिन जंगल में कहीं जाते हुए परशुरामजी को थकान महसूस हुई, उन्होंने कर्ण से कहा कि वे थोड़ी देर सोना चाहते हैं। कर्ण ने उनका सिर अपनी गोद में रख लिया। परशुराम गहरी नींद में सो गए। तभी कहीं से एक कीड़ा आया और वह कर्ण की जांघ पर डंक मारने लगा। कर्ण की जांघ पर घाव हो गया। लेकिन परशुराम की नींद खुल जाने के भय से वह चुपचाप बैठा रहा, घाव से खून बहने लगा।
बहते खून ने जब परशुराम को छुआ तो उनकी नींद खुल गई। उन्होंने कर्ण से पूछा कि तुमने उस कीड़े को हटाया क्यों नहीं? कर्ण ने कहा कि आपकी नींद टूटने का डर था इसलिए। परशुराम ने कहा कि किसी ब्राह्मण में इतनी सहनशीलता नहीं हो सकती है। तुम जरूर कोई क्षत्रिय हो। सच-सच बताओ। तब कर्ण ने सच बता दिया।
क्रोधित परशुराम ने कर्ण को उसी समय शाप दिया कि तुमने मुझसे जो भी विद्या सीखी है वह झूठ बोलकर सीखी है इसलिए जब भी तुम्हें इस विद्या की सबसे ज्यादा आवश्यकता होगी, तभी तुम इसे भूल जाओगे। कोई भी दिव्यास्त्र का उपयोग नहीं कर पाओगे।
अगले पन्ने पर पांचवां शाप...
5.=अर्जुन को मिला शाप : अर्जुन सशरीर इन्द्र-सभा में गया तो उसके स्वागत में उर्वशी, रंभा आदि अप्सराओं ने नृत्य किए। अर्जुन के रूप सौंदर्य पर मोहित हो उर्वशी उसके निवास स्थान पर गई और प्रणय निवेदन किया, साथ ही 'इसमें कोई दोष नहीं लगता' इसके पक्ष में अनेक दलीलें भी दीं, किंतु अर्जुन ने अपने दृढ़ इन्द्रिय-संयम का परिचय देते हुए कहा-
यथा कुन्ती च माद्री च शची चैव ममानघै।
तथा च वंशजननी त्वं हि मेऽद्य गरीयसी।।
गच्छ मूर्ध्ना प्रपन्नोऽस्मि पादौ ते वरवर्णिनि।
त्वं हि मे मातृवत् पूज्या रक्ष्योऽहं पुत्रवत् त्वया।।
अर्थात : मेरी दृष्टि में कुंती, माद्री और शची का जो स्थान है, वही तुम्हारा भी है। तुम पुरु वंश की जननी होने के कारण आज मेरे लिए परम गुरुस्वरूप हो। हे वरवर्णिनी! मैं तुम्हारे चरणों में मस्तक रखकर तुम्हारी शरण में आया हूं। तुम लौट जाओ। मेरी दृष्टि में तुम माता के समान पूजनीया हो और पुत्र के समान मानकर तुम्हें मेरी रक्षा करनी चाहिए। -(महाभारत- वनपर्वणि इन्द्रलोकाभिगमन पर्व 46.46.47)
उर्वशी अपने कामुक प्रदर्शन और तर्क देकर अपनी काम-वासना तृप्त करने में असफल रही तो क्रोधित होकर उसने अर्जुन को 1 वर्ष तक नपुंसक होने का शाप दे दिया। अर्जुन ने उर्वशी से शापित होना स्वीकार किया, परंतु संयम नहीं तोड़ा।
जब यह बात उनके पिता इन्द्र को पता चली तो उन्होंने अर्जुन से कहा, 'हे पुत्र! तुमने तो अपने इन्द्रिय संयम द्वारा ऋषियों को भी पराजित कर दिया। तुम जैसे पुत्र को पाकर कुंती वास्तव में श्रेष्ठ पुत्र वाली है। उर्वशी का शाप तुम्हें वरदान रूप सिद्ध होगा। भूतल पर वनवास के 13वें वर्ष में तुम्हें अज्ञातवास करना पड़ेगा, उस समय यह सहायक होगा। उसके बाद तुम अपना पुरुषत्व फिर से प्राप्त कर लोगे।'
इस शाप के चलते अज्ञातवास के समय अर्जुन ने विराट के महल में नर्तक वेश में रहकर विराट की राजकुमारी को संगीत और नृत्य विद्या सिखाई थी, तत्पश्चात वे शापमुक्त हो गए थे।
अगले पन्ने पर छठा शाप...
6.=श्रीकृष्ण वंश के नाश का शाप : धर्म के विरुद्ध आचरण करने के दुष्परिणामस्वरूप अंत में दुर्योधन आदि मारे गए और कौरव वंश का विनाश हो गया। महाभारत युद्ध के पश्चात सांत्वना देने के उद्देश्य से भगवान श्रीकृष्ण गांधारी के पास गए। गांधारी अपने 100 पुत्रों की मृत्यु के शोक में अत्यंत व्याकुल थीं। भगवान श्रीकृष्ण को देखते ही गांधारी ने क्रोधित होकर उन्हें शाप दिया कि तुम्हारे कारण जिस प्रकार से मेरे 100 पुत्रों का नाश हुआ है, उसी प्रकार तुम्हारे वंश का भी आपस में एक-दूसरे को मारने के कारण नाश हो जाएगा। भगवान श्रीकृष्ण ने गांधारी से कहा- देवी, मैं आपके दुख को समझ सकता हूं। यदि मेरे वंश के नाश से तुम्हे आत्मशांति मिलती है तो ऐसा ही होगा।
भगवान श्रीकृष्ण ने माता गांधारी के उस शाप को पूर्ण करने के लिए अपने कुल के यादवों की मति फेर दी। इसका यह मतलब नहीं कि गांधारी ने यदुओं के वंश के नाश का शाप दिया था, उन्होंने तो सिर्फ कृष्ण वंश को शाप था।
महाभारत का युद्ध समाप्त हो चुका था। कृष्ण द्वारिका में ही रहते थे। पांडव भी युधिष्ठिर को राज्य सौंपकर जंगल चले गए थे। एक दिन अहंकार के वश में आकर कुछ यदुवंशी बालकों ने दुर्वासा ऋषि का अपमान कर दिया। गांधारी के बाद इस पर दुर्वासा ऋषि ने भी शाप दे दिया कि तुम्हारे वंश का नाश हो जाए।
उनके शाप के प्रभाव से कृष्ण के सभी यदुवंशी भयभीत हो गए। इस भय के चलते ही एक दिन कृष्ण की आज्ञा से वे सभी एक यदु पर्व पर सोमनाथ के पास स्थित प्रभास क्षेत्र में आ गए। पर्व के हर्ष में उन्होंने अति नशीली मदिरा पी ली और मतवाले होकर एक-दूसरे को मारने लगे। इस तरह भगवान श्रीकृष्ण को छोड़कर कुछ ही जीवित बचे रह गए।
एक कथा के अनुसार संयाग से साम्ब के पेट से निकले मूसल को जब भगवान श्रीकृष्ण की आज्ञा से रगड़ा गया था तो उसके चूर्ण को इसी तीर्थ के तट पर फेंका गया था जिससे उत्पन्न हुई झाड़ियों को यादवों ने एक-दूसरे को मारना शुरू किया था। ऋषियों के श्राप से उत्पन्न हुई इन्हीं झाड़ियों ने तीक्ष्ण अस्त्र-शस्त्रों का काम किया ओर सारे प्रमुख यदुवंशियों का यहां विनाश हुआ। महाभारत के मौसल पर्व में इस युद्ध का रोमांचकारी विवरण है। सारे यादव प्रमुख इस गृहयुद्ध में मारे गए।
बचे लोगों ने कृष्ण के कहे अनुसार द्वारका छोड़ दी और हस्तिनापुर की शरण ली। यादवों और उनके भौज्य गणराज्यों का अंत होते ही कृष्ण की बसाई द्वारिका सागर में डूब गई।
जब द्रोणाचार्य ने कर्ण के सूत पुत्र होने को जानकर ब्रह्मास्त्र विद्या सिखाने से इंकार कर दिया, तब वे परशुराम के पास पहुंच गए। परशुराम ने प्रण लिया था कि वे इस विद्या को किसी ब्राह्मण को ही सिखाएंगे, क्योंकि इस विद्या के दुरुपयोग का खतरा बढ़ गया था। उस काल में तापस, कुशाग्र, विनम्र, ब्रह्मज्ञाता और विद्यावान लोगों को ही ब्राह्मण कहा जाता था।
कर्ण यह सीखना चाहता था तो उसने परशुराम के पास पहुंचकर खुद को ब्राह्मण का पुत्र बताया और उनसे यह विद्या सीख ली। परशुराम ने ब्रह्मास्त्र के अलावा कर्ण को अन्य सभी अस्त्र-शस्त्रों की शिक्षा दी थी।
फिर एक दिन जंगल में कहीं जाते हुए परशुरामजी को थकान महसूस हुई, उन्होंने कर्ण से कहा कि वे थोड़ी देर सोना चाहते हैं। कर्ण ने उनका सिर अपनी गोद में रख लिया। परशुराम गहरी नींद में सो गए। तभी कहीं से एक कीड़ा आया और वह कर्ण की जांघ पर डंक मारने लगा। कर्ण की जांघ पर घाव हो गया। लेकिन परशुराम की नींद खुल जाने के भय से वह चुपचाप बैठा रहा, घाव से खून बहने लगा।
बहते खून ने जब परशुराम को छुआ तो उनकी नींद खुल गई। उन्होंने कर्ण से पूछा कि तुमने उस कीड़े को हटाया क्यों नहीं? कर्ण ने कहा कि आपकी नींद टूटने का डर था इसलिए। परशुराम ने कहा कि किसी ब्राह्मण में इतनी सहनशीलता नहीं हो सकती है। तुम जरूर कोई क्षत्रिय हो। सच-सच बताओ। तब कर्ण ने सच बता दिया।
क्रोधित परशुराम ने कर्ण को उसी समय शाप दिया कि तुमने मुझसे जो भी विद्या सीखी है वह झूठ बोलकर सीखी है इसलिए जब भी तुम्हें इस विद्या की सबसे ज्यादा आवश्यकता होगी, तभी तुम इसे भूल जाओगे। कोई भी दिव्यास्त्र का उपयोग नहीं कर पाओगे।
अगले पन्ने पर पांचवां शाप...
5.=अर्जुन को मिला शाप : अर्जुन सशरीर इन्द्र-सभा में गया तो उसके स्वागत में उर्वशी, रंभा आदि अप्सराओं ने नृत्य किए। अर्जुन के रूप सौंदर्य पर मोहित हो उर्वशी उसके निवास स्थान पर गई और प्रणय निवेदन किया, साथ ही 'इसमें कोई दोष नहीं लगता' इसके पक्ष में अनेक दलीलें भी दीं, किंतु अर्जुन ने अपने दृढ़ इन्द्रिय-संयम का परिचय देते हुए कहा-
यथा कुन्ती च माद्री च शची चैव ममानघै।
तथा च वंशजननी त्वं हि मेऽद्य गरीयसी।।
गच्छ मूर्ध्ना प्रपन्नोऽस्मि पादौ ते वरवर्णिनि।
त्वं हि मे मातृवत् पूज्या रक्ष्योऽहं पुत्रवत् त्वया।।
अर्थात : मेरी दृष्टि में कुंती, माद्री और शची का जो स्थान है, वही तुम्हारा भी है। तुम पुरु वंश की जननी होने के कारण आज मेरे लिए परम गुरुस्वरूप हो। हे वरवर्णिनी! मैं तुम्हारे चरणों में मस्तक रखकर तुम्हारी शरण में आया हूं। तुम लौट जाओ। मेरी दृष्टि में तुम माता के समान पूजनीया हो और पुत्र के समान मानकर तुम्हें मेरी रक्षा करनी चाहिए। -(महाभारत- वनपर्वणि इन्द्रलोकाभिगमन पर्व 46.46.47)
उर्वशी अपने कामुक प्रदर्शन और तर्क देकर अपनी काम-वासना तृप्त करने में असफल रही तो क्रोधित होकर उसने अर्जुन को 1 वर्ष तक नपुंसक होने का शाप दे दिया। अर्जुन ने उर्वशी से शापित होना स्वीकार किया, परंतु संयम नहीं तोड़ा।
जब यह बात उनके पिता इन्द्र को पता चली तो उन्होंने अर्जुन से कहा, 'हे पुत्र! तुमने तो अपने इन्द्रिय संयम द्वारा ऋषियों को भी पराजित कर दिया। तुम जैसे पुत्र को पाकर कुंती वास्तव में श्रेष्ठ पुत्र वाली है। उर्वशी का शाप तुम्हें वरदान रूप सिद्ध होगा। भूतल पर वनवास के 13वें वर्ष में तुम्हें अज्ञातवास करना पड़ेगा, उस समय यह सहायक होगा। उसके बाद तुम अपना पुरुषत्व फिर से प्राप्त कर लोगे।'
इस शाप के चलते अज्ञातवास के समय अर्जुन ने विराट के महल में नर्तक वेश में रहकर विराट की राजकुमारी को संगीत और नृत्य विद्या सिखाई थी, तत्पश्चात वे शापमुक्त हो गए थे।
अगले पन्ने पर छठा शाप...
6.=श्रीकृष्ण वंश के नाश का शाप : धर्म के विरुद्ध आचरण करने के दुष्परिणामस्वरूप अंत में दुर्योधन आदि मारे गए और कौरव वंश का विनाश हो गया। महाभारत युद्ध के पश्चात सांत्वना देने के उद्देश्य से भगवान श्रीकृष्ण गांधारी के पास गए। गांधारी अपने 100 पुत्रों की मृत्यु के शोक में अत्यंत व्याकुल थीं। भगवान श्रीकृष्ण को देखते ही गांधारी ने क्रोधित होकर उन्हें शाप दिया कि तुम्हारे कारण जिस प्रकार से मेरे 100 पुत्रों का नाश हुआ है, उसी प्रकार तुम्हारे वंश का भी आपस में एक-दूसरे को मारने के कारण नाश हो जाएगा। भगवान श्रीकृष्ण ने गांधारी से कहा- देवी, मैं आपके दुख को समझ सकता हूं। यदि मेरे वंश के नाश से तुम्हे आत्मशांति मिलती है तो ऐसा ही होगा।
भगवान श्रीकृष्ण ने माता गांधारी के उस शाप को पूर्ण करने के लिए अपने कुल के यादवों की मति फेर दी। इसका यह मतलब नहीं कि गांधारी ने यदुओं के वंश के नाश का शाप दिया था, उन्होंने तो सिर्फ कृष्ण वंश को शाप था।
महाभारत का युद्ध समाप्त हो चुका था। कृष्ण द्वारिका में ही रहते थे। पांडव भी युधिष्ठिर को राज्य सौंपकर जंगल चले गए थे। एक दिन अहंकार के वश में आकर कुछ यदुवंशी बालकों ने दुर्वासा ऋषि का अपमान कर दिया। गांधारी के बाद इस पर दुर्वासा ऋषि ने भी शाप दे दिया कि तुम्हारे वंश का नाश हो जाए।
उनके शाप के प्रभाव से कृष्ण के सभी यदुवंशी भयभीत हो गए। इस भय के चलते ही एक दिन कृष्ण की आज्ञा से वे सभी एक यदु पर्व पर सोमनाथ के पास स्थित प्रभास क्षेत्र में आ गए। पर्व के हर्ष में उन्होंने अति नशीली मदिरा पी ली और मतवाले होकर एक-दूसरे को मारने लगे। इस तरह भगवान श्रीकृष्ण को छोड़कर कुछ ही जीवित बचे रह गए।
एक कथा के अनुसार संयाग से साम्ब के पेट से निकले मूसल को जब भगवान श्रीकृष्ण की आज्ञा से रगड़ा गया था तो उसके चूर्ण को इसी तीर्थ के तट पर फेंका गया था जिससे उत्पन्न हुई झाड़ियों को यादवों ने एक-दूसरे को मारना शुरू किया था। ऋषियों के श्राप से उत्पन्न हुई इन्हीं झाड़ियों ने तीक्ष्ण अस्त्र-शस्त्रों का काम किया ओर सारे प्रमुख यदुवंशियों का यहां विनाश हुआ। महाभारत के मौसल पर्व में इस युद्ध का रोमांचकारी विवरण है। सारे यादव प्रमुख इस गृहयुद्ध में मारे गए।
बचे लोगों ने कृष्ण के कहे अनुसार द्वारका छोड़ दी और हस्तिनापुर की शरण ली। यादवों और उनके भौज्य गणराज्यों का अंत होते ही कृष्ण की बसाई द्वारिका सागर में डूब गई।
भगवान कृष्ण इसी प्रभास क्षेत्र में अपने कुल का नाश देखकर बहुत व्यथित हुए। वे वहीं रहने लगे। उनसे मिलने कभी-कभार युधिष्ठिर आते थे। एक दिन वे इसी प्रभास क्षेत्र के वन में एक पीपल के वृक्ष के नीचे योगनिद्रा में लेटे थे, तभी 'जरा' नामक एक बहेलिए ने भूलवश उन्हें हिरण समझकर विषयुक्त बाण चला दिया, जो उनके पैर के तलुवे में जाकर लगा और भगवान श्रीकृष्ण ने इसी को बहाना बनाकर देह त्याग दी। महाभारत युद्ध के ठीक 36 वर्ष बाद उन्होंने अपनी देह इसी क्षेत्र में त्याग दी थी। महाभारत का युद्ध हुआ था, तब वे लगभग 56 वर्ष के थे। उनका जन्म 3112 ईसा पूर्व हुआ था। इस मान से 3020 ईसा पूर्व उन्होंने 92 वर्ष की उम्र में देह त्याग दी थी।
अंत में कृष्ण के प्रपौत्र वज्र अथवा वज्रनाभ द्वारिका के यदुवंश के अंतिम शासक थे, जो यदुओं की आपसी लड़ाई में जीवित बच गए थे। द्वारिका के समुद्र में डूबने पर अर्जुन द्वारिका गए और वज्र तथा शेष बची यादव महिलाओं को हस्तिनापुर ले गए। कृष्ण के प्रपौत्र वज्र को हस्तिनापुर में मथुरा का राजा घोषित किया। वज्रनाभ के नाम से ही मथुरा क्षेत्र को ब्रजमंडल कहा जाता है।
अंत में कृष्ण के प्रपौत्र वज्र अथवा वज्रनाभ द्वारिका के यदुवंश के अंतिम शासक थे, जो यदुओं की आपसी लड़ाई में जीवित बच गए थे। द्वारिका के समुद्र में डूबने पर अर्जुन द्वारिका गए और वज्र तथा शेष बची यादव महिलाओं को हस्तिनापुर ले गए। कृष्ण के प्रपौत्र वज्र को हस्तिनापुर में मथुरा का राजा घोषित किया। वज्रनाभ के नाम से ही मथुरा क्षेत्र को ब्रजमंडल कहा जाता है।
7.=अगले पन्ने पर सातवां शाप...
अश्वत्थामा को श्रीकृष्ण ने दिया शाप : महाभारत के युद्ध में अश्वत्थामा ने ब्रह्मास्त्र छोड़ दिया था जिसके चलते लाखों लोग मारे गए थे। अश्वत्थामा के इस कृत्य से कृष्ण क्रोधित हो गए थे और उन्होंने अश्वत्थामा को शाप दिया था कि 'तू इतने वधों का पाप ढोता हुआ 3,000 वर्ष तक निर्जन स्थानों में भटकेगा। तेरे शरीर से सदैव रक्त की दुर्गंध नि:सृत होती रहेगी। तू अनेक रोगों से पीड़ित रहेगा।' व्यास ने श्रीकृष्ण के वचनों का अनुमोदन किया।
कहते हैं कि अश्वत्थामा इस शाप के बाद रेगिस्तानी इलाके में चला गया था और वहां रहने लगा था। कुछ लोग मानते हैं कि वह अरब चला गया था। उत्तरप्रदेश में प्रचलित मान्यता अनुसार अरब में उसने कृष्ण और पांडवों के धर्म को नष्ट करने की प्रतिज्ञा ली थी। हालांकि भारत में लोग दावा करते हैं कि अमुक जगहों पर अश्वत्थामा आता रहता है, लेकिन अब तक इसकी सचाई की पुष्टि नहीं हुई है। यदि हम यह मानें कि उनको मात्र 3,000 वर्षों तक जिंदा रहने का ही शाप था, तो फिर वे अब तक मर चुके होंगे, क्योंकि महाभारत युद्ध को हुए 3,000 वर्ष कभी के हो चुके हैं। लेकिन यदि उनको कलिकाल के अंत तक भटकने का शाप दिया गया था तो...
अगले पन्ने पर आठवां शाप...
कहते हैं कि अश्वत्थामा इस शाप के बाद रेगिस्तानी इलाके में चला गया था और वहां रहने लगा था। कुछ लोग मानते हैं कि वह अरब चला गया था। उत्तरप्रदेश में प्रचलित मान्यता अनुसार अरब में उसने कृष्ण और पांडवों के धर्म को नष्ट करने की प्रतिज्ञा ली थी। हालांकि भारत में लोग दावा करते हैं कि अमुक जगहों पर अश्वत्थामा आता रहता है, लेकिन अब तक इसकी सचाई की पुष्टि नहीं हुई है। यदि हम यह मानें कि उनको मात्र 3,000 वर्षों तक जिंदा रहने का ही शाप था, तो फिर वे अब तक मर चुके होंगे, क्योंकि महाभारत युद्ध को हुए 3,000 वर्ष कभी के हो चुके हैं। लेकिन यदि उनको कलिकाल के अंत तक भटकने का शाप दिया गया था तो...
अगले पन्ने पर आठवां शाप...
8.='दुर्योधन को मिला शाप : एक बार वेदव्यास ने धृतराष्ट्र से मिलकर कहा कि महर्षि मैत्रेय यहां आ रहे हैं। वे पाण्डवों से मिलकर अब आप लोगों से मिलना चाहते हैं। वे ही तुम्हारे पुत्र को पांडवों से मेल-मिलाप का उपदेश देंगे। इस बात की सूचना मैं दे देता हूं कि वे जो कुछ भी कहे, बिना तर्क-वितर्क के मान लेना। मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं कि मैत्रेय की आज्ञा का उल्लंघन हुआ तो वे क्रोध में आकर शाप भी दे सकते हैं इसलिए शांतिपूर्वक उनकी बातें सुन लेना। अमल करना या नहीं करना, यह तुम्हारे ऊपर निर्भर है। इतना कहकर वेदव्यास जी चले गए।
धृतराष्ट्र महर्षि मैत्रेय के आते ही अपने पुत्रों सहित उनकी सेवा व सत्कार करने लगे। विश्राम के बाद धृतराष्ट्र ने बड़ी विनय के साथ पूछा- भगवन् आपकी यहां तक की यात्रा कैसी रही? पांचों पांडव कुशलपूर्वक तो हैं न। तब मैत्रेयजी ने कहा कि राजन, तीर्थयात्रा करते हुए वहां संयोगवश काम्यक वन में युधिष्ठिर से मेरी भेंट हो गई। वे आजकल तपोवन में रहते हैं। उनके दर्शन के लिए वहां बहुत से ऋषि-मुनि आते हैं। मैंने वहीं यह सुना कि तुम्हारे पुत्रों ने पाण्डवों को जुए में धोखे से हराकर वन भेज दिया। वहां से मैं तुम्हारे पास आया हूं।
उन्होंने धृतराष्ट्र से इतना कहकर पीछे मुड़ते हुए दुर्योधन से कहा, तुम जानते हो पाण्डव कितने वीर और शक्तिशाली हैं। तुम्हें उनकी शक्ति का अंदाजा नहीं है शायद इसलिए तुम ऐसी बात कर रहे हो इसलिए तुम्हें उनके साथ मेल कर लेना चाहिए मेरी बात मान लो। गुस्से में ऐसा अनर्थ मत करो।
महर्षि मैत्रेय की बात सुनकर दुर्योधन को क्रोध आ गया और वह व्यंग्यपूर्ण मुस्कुराते हए पैर से जमीन कुरेदने लगा और हद तो तब हो गई, जब उसने अपनी जांघ पर हाथ से ताल ठोंक दी। दुर्योधन की यह उद्दण्डता देखकर महर्षि को क्रोध आया। तब उन्होंने दुर्योधन को शाप दिया। तू मेरा तिरस्कार करता है, मेरी बात शांतिपूर्वक सुन नहीं सकता। जा उद्दण्डी जिस जंघा पर तू ताल ठोंक रहा है, उस जंघा को भीम अपनी गदा से तोड़ देगा। बाद में कौरव और पांडवों का घोर युद्ध हुआ और भीम ने दुर्योधन की जंघा पर वार कर अंत में उसकी जंघा उखाड़ फेंकी।
अगले पन्ने पर नौवां शाप...
9.=द्रौपदी ने घटोत्कच को शाप दिया : जब घटोत्कच पहली बार अपने पिता भीम के राज्य में आया तो अपनी मां (हिडिम्बा) की आज्ञा के अनुसार उसने द्रौपदी को कोई सम्मान नहीं दिया।
द्रौपदी को अपमान महसूस हुआ और उसे बहुत गुस्सा आया। वह उस पर चिल्लाई कि वह एक विशिष्ट स्त्री है, वह युधिष्ठिर की रानी है, वह ब्राह्मण राजा की पुत्री है तथा उसकी प्रतिष्ठा पांडवों से कहीं अधिक है। और उसने अपनी दुष्ट राक्षसी मां के कहने पर बड़ों, ऋषियों और राजाओं से भरी सभा में उसका अपमान किया है। जा दुष्ट तेरा जीवन बहुत छोटा होगा तथा तू बिना किसी लड़ाई के मारा जाएगा।
द्रौपदी को अपमान महसूस हुआ और उसे बहुत गुस्सा आया। वह उस पर चिल्लाई कि वह एक विशिष्ट स्त्री है, वह युधिष्ठिर की रानी है, वह ब्राह्मण राजा की पुत्री है तथा उसकी प्रतिष्ठा पांडवों से कहीं अधिक है। और उसने अपनी दुष्ट राक्षसी मां के कहने पर बड़ों, ऋषियों और राजाओं से भरी सभा में उसका अपमान किया है। जा दुष्ट तेरा जीवन बहुत छोटा होगा तथा तू बिना किसी लड़ाई के मारा जाएगा।
अगले पन्ने पर दसवां शाप...
10.=राजा परीक्षित को शाप : एक बार राजा परीक्षित आखेट हेतु वन में गए। वन्य पशुओं के पीछे दौड़ने के कारण वे प्यास से व्याकुल हो गए तथा जलाशय की खोज में इधर-उधर घूमते-घूमते वे शमीक ऋषि के आश्रम में पहुंच गए। वहां पर शमीक ऋषि नेत्र बंद किए हुए ब्रह्म ध्यान में लीन बैठे थे। राजा परीक्षित ने उनसे जल मांगा किंतु ध्यानमग्न होने के कारण शमीक ऋषि ने कुछ भी उत्तर नहीं दिया।
सिर पर स्वर्ण मुकुट पर निवास करते हुए कलियुग के प्रभाव से राजा परीक्षित को प्रतीत हुआ कि यह ऋषि ध्यानस्थ होने का ढोंग कर मेरा अपमान कर रहा है। उन्हें ऋषि पर बहुत क्रोध आया। उन्होंने अपने अपमान का बदला लेने के उद्देश्य से पास ही पड़े हुए एक मृत सर्प को अपने धनुष की नोंक से उठाकर ऋषि के गले में डाल दिया और अपने नगर वापस आ गए।
शमीक ऋषि जब ध्यान साधना से जाग्रत हुए तो उन्होंने अपने गले में पड़े मृत सर्प को देखा। उन्हें ज्ञात ही नहीं हो पाया था कि उनके साथ राजा ने क्या किया है। उस दौरान शमीक ऋषि के पुत्र ऋंगी ऋषि आ पहुंचे और जब उन्होंने जाना कि उनके पिता का राजा ने अपमान किया है तो वे बहुत क्रोधित हुए। उन्होंने सोचा कि यदि यह राजा जीवित रहेगा तो इसी प्रकार ऋषियों का अपमान करता रहेगा। इस प्रकार विचार करके उस ऋषिकुमार ने तुरंत ही कमंडल से अपनी अंजुली में जल लेकर तथा उसे मंत्रों से अभिमंत्रित करके राजा परीक्षित को यह शाप दे दिया कि जा तुझे आज से 7वें दिन तक्षक सर्प डसेगा।
शमीक ऋषि कुछ समझ पाते इससे पहले तो ऋंगी ऋषि ने शाप दे डाला। शमीक ऋषि ने अपने पुत्र से कहा कि तूने यह अच्छा नहीं किया। वह राजा तो प्रजा का रक्षक है। उसने इतना बड़ा अपराध भी नहीं किया था कि उसे इतना बड़ा शाप दिया जाए। शमीक को बहुत पश्चाताप हुआ।
उल्लेखनीय है कि द्रोण पुत्र अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र प्रहार से उत्तरा ने मृत शिशु को जन्म दिया था किंतु भगवान श्रीकृष्ण ने अभिमन्यु-उत्तरा पुत्र को ब्रह्मास्त्र के प्रयोग के बाद भी फिर से जीवित कर दिया था यही बालक आगे चलकर राजा परीक्षित नाम से प्रसिद्ध हुआ। परीक्षित के प्रतापी पुत्र हुए जन्मेजय।
जन्मेजय को जब यह पता चला कि मेरे पिता की मृत्यु सर्पदंश से हुई तो उन्होंने विश्व के सभी सर्पों को मारने के लिए नागदाह यज्ञ करवाए थे। उन यज्ञों में नागों को पटक दिया जाता था। एक विशिष्ट मंत्र द्वारा नाग स्वयं यज्ञ के पास पहुंच जाते थे। देशभर में नागदाह नामक स्थान मिल जाएंगे। सर्पदाह के एक घनघोर यज्ञ की अग्नि से एक कर्कोटक नामक सर्प ने अपनी जान बचाने के लिए उज्जैन में महाकाल राजा की शरण ले ली थी जिसके चलते वह बच गया था।
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2> इस कारण असंख्य बाणों की शय्या पर लेटे रहे भीष्म
महाभारत के युद्ध से कौन नहीं परिचित है। इसी में एक महानायक थे। भीष्म पितामह जो कि कौरवों और पांडवों दोने के पितामह थे। साथ ही गंगा के पुत्र। साथ ही आपने ये भी सुना होगा कि वह एक ही मात्र ऐसे शख्स थे जो कि कि बाण की शय्या में पूरे 10 दिनों के लिए लेटे रहे थे। लेकिन आप यह बात नहीं जानते है कि वह अपनी जिंदगी के अंतिम क्षणों में शय़्या में ही क्यों लेते रहे थे।
जबकि उसके शरीर से तीर निकाला जा सकता था। साथ ही वह चाहते तो तुरंत ही अपने प्राण त्याग सकते है थे। आखिर इसके पीछे क्या कारण था। जानिए इसके पीछे किया है कहानी।
जब कौरवों और पांडवों के बीच छिड़े भीषण संग्राम में पांडवों के प्रलयंकारी योद्धा वीर अर्जुन ने शिखंडी का सहारा लेते हुए भीष्म पितामह को अपने शस्त्र रखने पर मजबूर कर दिया और इसी बीच श्रीकृष्ण के कहने पर अर्जुन ने कई सौ बाण इकट्ठे भीष्म पर छोड़ दिए थे। ये बाण भीष्म के शरीर में अंदर तक गड़ गए। इन बाणों ने गंगापुत्र भीष्म के हर अंग को छेदकर रख दिया। लेकिन इतने बाणों से छिद जाने के बाद भी भीष्म की मृत्यु नहीं हुई, क्योंकि उनका भाग्य कुछ अलग था।
इस खबर को फैलने पर कौरवों की सेना में हाहाकार मच जाता है। दोनों दलों के सैनिक और सेनापति युद्ध करना छोड़कर भीष्म के पास एकत्र हो जाते हैं। दोनों दलों के राजाओं से भीष्म कहते हैं, राजन्यगण। मेरा सिर नीचे लटक रहा है। मुझे उपयुक्त तकिया चाहिए। इतना कहते हुए तमाम राजा और योद्धा मूल्यवान और तरह-तरह के तकिए ले आते हैं।
लेकिन भीष्म उनमें से एक को भी न लिया और मुस्कुरा कर कहा कि ये तकिए इस वीर शय्या के काम में आने योग्य नहीं हैं राजन। फिर वे अर्जुन की ओर देखकर कहते हैं, पुत्र, तुम तो क्षत्रिय धर्म के विद्वान हो। क्या तुम मुझे उपयुक्त तकिया दे सकते हो?' इतना सुनते हुए अर्जुन ने आंखों में आंसू लिए उनको अभिवादन कर भीष्म को बड़ी तेजी से ऐसे 3 बाण मारे, जो उनके ललाट को छेदते हुए पृथ्वी में जा लगे। इसीलिए इससे इनको आराम मिला।
भीष्म ये बात अच्छी तरह से जानते थे कि सूर्य के उत्तरायण होने पर प्राण त्यागने पर आत्मा को सद्गति मिलती है और वे पुन: अपने लोक जाकर मुक्त हो जाएंगे इसीलिए वे सूर्य के उत्तरायण होने का इंतजार करते हैं। और 10 दिनों के लिए सूर्य डूब चुका था। जिसके कारण उन्होने अपने शरीर का त्याग नहीं किया था। साथ ही भीष्म को अपने पिता शांतनु से यब वरदान मिला था कि वह अपनी इच्छा से मृत्यु पा सकते है।
भीष्म को ठीक करने के लिए शल्य चिकित्सक लाए जाते हैं, लेकिन वे उनको लौटा देते हैं और कहते हैं कि अब तो मेरा अंतिम समय आ गया है। यह सब व्यर्थ है। ये शय्या ही मेरी चिता है। अब मैं तो बस सूर्य के उत्तरायण होने का इंतजार कर रहा हूं।
सिर पर स्वर्ण मुकुट पर निवास करते हुए कलियुग के प्रभाव से राजा परीक्षित को प्रतीत हुआ कि यह ऋषि ध्यानस्थ होने का ढोंग कर मेरा अपमान कर रहा है। उन्हें ऋषि पर बहुत क्रोध आया। उन्होंने अपने अपमान का बदला लेने के उद्देश्य से पास ही पड़े हुए एक मृत सर्प को अपने धनुष की नोंक से उठाकर ऋषि के गले में डाल दिया और अपने नगर वापस आ गए।
शमीक ऋषि जब ध्यान साधना से जाग्रत हुए तो उन्होंने अपने गले में पड़े मृत सर्प को देखा। उन्हें ज्ञात ही नहीं हो पाया था कि उनके साथ राजा ने क्या किया है। उस दौरान शमीक ऋषि के पुत्र ऋंगी ऋषि आ पहुंचे और जब उन्होंने जाना कि उनके पिता का राजा ने अपमान किया है तो वे बहुत क्रोधित हुए। उन्होंने सोचा कि यदि यह राजा जीवित रहेगा तो इसी प्रकार ऋषियों का अपमान करता रहेगा। इस प्रकार विचार करके उस ऋषिकुमार ने तुरंत ही कमंडल से अपनी अंजुली में जल लेकर तथा उसे मंत्रों से अभिमंत्रित करके राजा परीक्षित को यह शाप दे दिया कि जा तुझे आज से 7वें दिन तक्षक सर्प डसेगा।
शमीक ऋषि कुछ समझ पाते इससे पहले तो ऋंगी ऋषि ने शाप दे डाला। शमीक ऋषि ने अपने पुत्र से कहा कि तूने यह अच्छा नहीं किया। वह राजा तो प्रजा का रक्षक है। उसने इतना बड़ा अपराध भी नहीं किया था कि उसे इतना बड़ा शाप दिया जाए। शमीक को बहुत पश्चाताप हुआ।
उल्लेखनीय है कि द्रोण पुत्र अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र प्रहार से उत्तरा ने मृत शिशु को जन्म दिया था किंतु भगवान श्रीकृष्ण ने अभिमन्यु-उत्तरा पुत्र को ब्रह्मास्त्र के प्रयोग के बाद भी फिर से जीवित कर दिया था यही बालक आगे चलकर राजा परीक्षित नाम से प्रसिद्ध हुआ। परीक्षित के प्रतापी पुत्र हुए जन्मेजय।
जन्मेजय को जब यह पता चला कि मेरे पिता की मृत्यु सर्पदंश से हुई तो उन्होंने विश्व के सभी सर्पों को मारने के लिए नागदाह यज्ञ करवाए थे। उन यज्ञों में नागों को पटक दिया जाता था। एक विशिष्ट मंत्र द्वारा नाग स्वयं यज्ञ के पास पहुंच जाते थे। देशभर में नागदाह नामक स्थान मिल जाएंगे। सर्पदाह के एक घनघोर यज्ञ की अग्नि से एक कर्कोटक नामक सर्प ने अपनी जान बचाने के लिए उज्जैन में महाकाल राजा की शरण ले ली थी जिसके चलते वह बच गया था।
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2> इस कारण असंख्य बाणों की शय्या पर लेटे रहे भीष्म
महाभारत के युद्ध से कौन नहीं परिचित है। इसी में एक महानायक थे। भीष्म पितामह जो कि कौरवों और पांडवों दोने के पितामह थे। साथ ही गंगा के पुत्र। साथ ही आपने ये भी सुना होगा कि वह एक ही मात्र ऐसे शख्स थे जो कि कि बाण की शय्या में पूरे 10 दिनों के लिए लेटे रहे थे। लेकिन आप यह बात नहीं जानते है कि वह अपनी जिंदगी के अंतिम क्षणों में शय़्या में ही क्यों लेते रहे थे।
जबकि उसके शरीर से तीर निकाला जा सकता था। साथ ही वह चाहते तो तुरंत ही अपने प्राण त्याग सकते है थे। आखिर इसके पीछे क्या कारण था। जानिए इसके पीछे किया है कहानी।
जब कौरवों और पांडवों के बीच छिड़े भीषण संग्राम में पांडवों के प्रलयंकारी योद्धा वीर अर्जुन ने शिखंडी का सहारा लेते हुए भीष्म पितामह को अपने शस्त्र रखने पर मजबूर कर दिया और इसी बीच श्रीकृष्ण के कहने पर अर्जुन ने कई सौ बाण इकट्ठे भीष्म पर छोड़ दिए थे। ये बाण भीष्म के शरीर में अंदर तक गड़ गए। इन बाणों ने गंगापुत्र भीष्म के हर अंग को छेदकर रख दिया। लेकिन इतने बाणों से छिद जाने के बाद भी भीष्म की मृत्यु नहीं हुई, क्योंकि उनका भाग्य कुछ अलग था।
इस खबर को फैलने पर कौरवों की सेना में हाहाकार मच जाता है। दोनों दलों के सैनिक और सेनापति युद्ध करना छोड़कर भीष्म के पास एकत्र हो जाते हैं। दोनों दलों के राजाओं से भीष्म कहते हैं, राजन्यगण। मेरा सिर नीचे लटक रहा है। मुझे उपयुक्त तकिया चाहिए। इतना कहते हुए तमाम राजा और योद्धा मूल्यवान और तरह-तरह के तकिए ले आते हैं।
लेकिन भीष्म उनमें से एक को भी न लिया और मुस्कुरा कर कहा कि ये तकिए इस वीर शय्या के काम में आने योग्य नहीं हैं राजन। फिर वे अर्जुन की ओर देखकर कहते हैं, पुत्र, तुम तो क्षत्रिय धर्म के विद्वान हो। क्या तुम मुझे उपयुक्त तकिया दे सकते हो?' इतना सुनते हुए अर्जुन ने आंखों में आंसू लिए उनको अभिवादन कर भीष्म को बड़ी तेजी से ऐसे 3 बाण मारे, जो उनके ललाट को छेदते हुए पृथ्वी में जा लगे। इसीलिए इससे इनको आराम मिला।
भीष्म ये बात अच्छी तरह से जानते थे कि सूर्य के उत्तरायण होने पर प्राण त्यागने पर आत्मा को सद्गति मिलती है और वे पुन: अपने लोक जाकर मुक्त हो जाएंगे इसीलिए वे सूर्य के उत्तरायण होने का इंतजार करते हैं। और 10 दिनों के लिए सूर्य डूब चुका था। जिसके कारण उन्होने अपने शरीर का त्याग नहीं किया था। साथ ही भीष्म को अपने पिता शांतनु से यब वरदान मिला था कि वह अपनी इच्छा से मृत्यु पा सकते है।
भीष्म को ठीक करने के लिए शल्य चिकित्सक लाए जाते हैं, लेकिन वे उनको लौटा देते हैं और कहते हैं कि अब तो मेरा अंतिम समय आ गया है। यह सब व्यर्थ है। ये शय्या ही मेरी चिता है। अब मैं तो बस सूर्य के उत्तरायण होने का इंतजार कर रहा हूं।
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3>पाण्डेय एवं कौरवों 100 भाइ+एक वहीन के नाम
पाण्डव पाँच भाई थे जिनके नाम हैं -
3>पाण्डेय एवं कौरवों 100 भाइ+एक वहीन के नाम
पाण्डव पाँच भाई थे जिनके नाम हैं -
1. युधिष्ठिर 2. भीम 3. अर्जुन 4. नकुल। 5. सहदेव
( इन पांचों के अलावा , महाबली कर्ण भी कुंती के ही पुत्र थे , परन्तु उनकी गिनती पांडवों में नहीं की जाती है )
यहाँ ध्यान रखें कि… पाण्डु के उपरोक्त पाँचों पुत्रों में से युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन
की माता कुन्ती थीं ……तथा , नकुल और सहदेव की माता माद्री थी ।
वहीँ …. धृतराष्ट्र और गांधारी के सौ पुत्र…..
कौरव कहलाए जिनके नाम हैं -
1. दुर्योधन-----------2. दुःशासन ------3. दुःसह-------------4. दुःशल -------5. जलसंघ
( इन पांचों के अलावा , महाबली कर्ण भी कुंती के ही पुत्र थे , परन्तु उनकी गिनती पांडवों में नहीं की जाती है )
यहाँ ध्यान रखें कि… पाण्डु के उपरोक्त पाँचों पुत्रों में से युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन
की माता कुन्ती थीं ……तथा , नकुल और सहदेव की माता माद्री थी ।
वहीँ …. धृतराष्ट्र और गांधारी के सौ पुत्र…..
कौरव कहलाए जिनके नाम हैं -
1. दुर्योधन-----------2. दुःशासन ------3. दुःसह-------------4. दुःशल -------5. जलसंघ
6. सम---------------7. सह ------------8. विंद ---------------9. अनुविंद-----10. दुर्धर्ष
11. सुबाहु। ---------12. दुषप्रधर्षण ---13. दुर्मर्षण। ---------14. दुर्मुख -----15. दुष्कर्ण
16. विकर्ण ----------17. शल ---------18. सत्वान------------19. सुलोचन---20. चित्र
16. विकर्ण ----------17. शल ---------18. सत्वान------------19. सुलोचन---20. चित्र
21. उपचित्र ---------22. चित्राक्ष ------23. चारुचित्र ---------24. शरासन ---25. दुर्मद।
26. दुर्विगाह --------27. विवित्सु ------28. विकटानन्द ------29. ऊर्णनाभ --30. सुनाभ
31. नन्द। -----------32. उपनन्द ------33. चित्रबाण ---------34. चित्रवर्मा ---35. सुवर्मा
31. नन्द। -----------32. उपनन्द ------33. चित्रबाण ---------34. चित्रवर्मा ---35. सुवर्मा
36. दुर्विमोचन ------37. अयोबाहु -----38. महाबाहु ---------39. चित्रांग -----40. चित्रकुण्डल
41. भीमवेग --------42. भीमबल ------43. बालाकि ---------44. बलवर्धन ----45. उग्रायुध
46. सुषेण -----------47. कुण्डधर -----48. महोदर ----------49. चित्रायुध ----50. निषंगी
46. सुषेण -----------47. कुण्डधर -----48. महोदर ----------49. चित्रायुध ----50. निषंगी
51. पाशी ------------52. वृन्दारक -----53. दृढ़वर्मा ----------54. दृढ़क्षत्र -----55. सोमकीर्ति
56. अनूदर-----------57. दढ़संघ -------58. जरासंघ ---------59. सत्यसंघ ---60. सद्सुवाक
61. उग्रश्रवा ---------62. उग्रसेन -------63. सेनानी-----------64. दुष्पराजय--65. अपराजित
66. कुण्डशायी ------67. विशालाक्ष ----68. दुराधर ----------69. दृढ़हस्त ----70. सुहस्त
71. वातवेग--------- 72. सुवर्च ---------73. आदित्यकेतु -----74. बह्वाशी ----75. नागदत्त
61. उग्रश्रवा ---------62. उग्रसेन -------63. सेनानी-----------64. दुष्पराजय--65. अपराजित
66. कुण्डशायी ------67. विशालाक्ष ----68. दुराधर ----------69. दृढ़हस्त ----70. सुहस्त
71. वातवेग--------- 72. सुवर्च ---------73. आदित्यकेतु -----74. बह्वाशी ----75. नागदत्त
76. उग्रशायी-------- 77. कवचि --------78. क्रथन। ----------79. कुण्डी ------80. भीमविक्र
81. धनुर्धर---------- 82. वीरबाहु -------83. अलोलुप --------84.अभय-------------85. दृढ़कर्मा
81. धनुर्धर---------- 82. वीरबाहु -------83. अलोलुप --------84.अभय-------------85. दृढ़कर्मा
86. दृढ़रथाश्रय ------87. अनाधृष्य------ 88. कुण्डभेदी।------89. विरवि -------90. चित्रकुण्डल
91. प्रधम----------- 92. अमाप्रमाथि ---93. दीर्घरोमा-------- 94. सुवीर्यवान ---95. दीर्घबाहु
96. सुजात।--- ------97. कनकध्वज----98. कुण्डाशी --------99. विरज-------- 100. युयुत्सु
( इन 100 भाइयों के अलावा कौरवों की एक बहनभी थी… जिसका नाम""दुशाला""था,
जिसका विवाह"जयद्रथ"सेहुआ था )
96. सुजात।--- ------97. कनकध्वज----98. कुण्डाशी --------99. विरज-------- 100. युयुत्सु
( इन 100 भाइयों के अलावा कौरवों की एक बहनभी थी… जिसका नाम""दुशाला""था,
जिसका विवाह"जयद्रथ"सेहुआ था )
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