1>মহাভারত=Post=1***कर्ण की पांच गलतियां***( 1 to 3 )
1>----------------------कर्ण की पांच गलतियां और वह मारा गया..
2>----------------------दानवीर कर्ण ( तीन पत्तों वाला चमत्कारी वटवृक्ष।)
3>----------------------जानिए महाभारत में कौन था कर्ण से भी बड़ा महादानी दानवीर
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4>----------------------दानवीर कर्ण एवं द्रोपदी दोनों करना चाहते थे एक दूसरे से विवाह
1>कर्ण की पांच गलतियां और वह मारा गया..
इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि महाभारत के प्रसिद्ध योद्धा और अंतिम दिनों में कौरवों की सेना के सेनापति कर्ण अपने प्रतिद्वंदी अर्जुन से श्रेष्ठ धनुर्धर थे जिसकी तारीफ भगवान श्रीकृष्ण ने भी की। लेकिन कहते हैं कि कुसंगत का असर बहुत घातक होता है। बहुत कम लोग ही होते हैं जो कमल के समान होते हैं। इस कुसंगत के चलते ही कर्ण कई बार गलतियां करते गए। उनकी इन्हीं गलतियों ने कौरवों और पांडवों के युद्ध में उनको कमजोर बना दिया था।
महाभारत युद्ध में कर्ण सबसे शक्तिशाली योद्धा माने जाते हैं। कर्ण को किस तरह से काबू में रखा जाए, यह कृष्ण के लिए भी चिंता का विषय हो चला था। लेकिन कर्ण दानवीर, नैतिक और संयमशील व्यक्ति थे। ये तीनों ही बातों उनके विपरीत पड़ गईं। कैसे?
कर्ण के बारे में सभी जानते हैं कि वे सूर्य-कुंती पुत्र थे। उनके पालक माता-पिता का नाम अधिरथ और राधा था। उनके गुरु परशुराम और मित्र दुर्योधन थे। हस्तिनापुर में ही कर्ण का लालन-पालन हुआ। उन्होंने अंगदेश के राजसिंहासन का भार संभाला था। जरासंध हो हराने के कारण उनको चंपा नगरी का राजा बना दिया गया था।
1.=अगले पन्ने पर पहली गलती...
ब्रह्मास्त्र : उस काल में द्रोणाचार्य, परशुराम और वेदव्यास को ही ब्रह्मास्त्र चलाना और किसी के द्वारा ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किए जाने पर उसे असफल कर देना याद था। उन्होंने यह विद्या अपने कुछ खास शिष्यों को ही प्रदान की थी। उसमें भी किस तरह ब्रह्मास्त्र को असफल करना, यह कम ही शिष्यों को याद था।
जब द्रोणाचार्य ने कर्ण के सूत पुत्र होने को जानकर ब्रह्मास्त्र विद्या सिखाने से इंकार कर दिया, तब वे परशुराम के पास पहुंच गए। परशुराम ने प्रण लिया था कि वे इस विद्या को किसी ब्राह्मण को ही सिखाएंगे, क्योंकि इस विद्या के दुरुपयोग का खतरा बढ़ गया था।
कर्ण यह सीखना चाहता था तो उसने परशुराम के पास पहुंचकर खुद को ब्राह्मण का पुत्र बताया और उनसे यह विद्या सीख ली। परशुराम ने ब्रह्मास्त्र के अलावा कर्ण को अन्य सभी अस्त्र-शस्त्रों की शिक्षा दी थी।
फिर एक दिन जंगल में कहीं जाते हुए परशुरामजी को थकान महसूस हुई, उन्होंने कर्ण से कहा कि वे थोड़ी देर सोना चाहते हैं। कर्ण ने उनका सिर अपनी गोद में रख लिया। परशुराम गहरी नींद में सो गए। तभी कहीं से एक कीड़ा आया और वह कर्ण की जांघ पर डंक मारने लगा। कर्ण की जांघ पर घाव हो गया। लेकिन परशुराम की नींद खुल जाने के भय से वह चुपचाप बैठा रहा, घाव से खून बहने लगा।
बहते खून ने जब परशुराम को छुआ तो उनकी नींद खुल गई। उन्होंने कर्ण से पूछा कि तुमने उस कीड़े को हटाया क्यों नहीं? कर्ण ने कहा कि आपकी नींद टूटने का डर था इसलिए। परशुराम ने कहा कि किसी ब्राह्मण में इतनी सहनशीलता नहीं हो सकती है। तुम जरूर कोई क्षत्रिय हो। सच-सच बताओ। तब कर्ण ने सच बता दिया।
क्रोधित परशुराम ने कर्ण को उसी समय शाप दिया कि तुमने मुझसे जो भी विद्या सीखी है वह झूठ बोलकर सीखी है इसलिए जब भी तुम्हें इस विद्या की सबसे ज्यादा आवश्यकता होगी, तभी तुम इसे भूल जाओगे। कोई भी दिव्यास्त्र का उपयोग नहीं कर पाओगे।
लेकिन अब सवाल यह उठता है कि यदि वह झूठ नहीं बोलता तो सच बताकर क्या परशुराम उसे विद्या सिखाते? नहीं सिखाते...। तब वे किससे सीखते? निश्चित ही यह भूल थी लेकिन भूल नहीं भी थी।
2.=अगले पन्ने पर, दूसरी गलती...
कवच और कुंडल : भगवान कृष्ण यह भली-भांति जानते थे कि जब तक कर्ण के पास उसका कवच और कुंडल है, तब तक उसे कोई नहीं मार सकता। ऐसे में अर्जुन की सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं। उधर देवराज इन्द्र भी चिंतित थे, क्योंकि अर्जुन उनका पुत्र था। भगवान कृष्ण और देवराज इन्द्र दोनों जानते थे कि जब तक कर्ण के पास पैदायशी कवच और कुंडल हैं, वह युद्ध में अजेय रहेगा।
तब कृष्ण ने देवराज इन्द्र को एक उपाय बताया और फिर देवराज इन्द्र एक ब्राह्मण के वेश में पहुंच गए कर्ण के द्वार। देवराज भी सभी के साथ लाइन में खड़े हो गए। कर्ण सभी को कुछ न कुछ दान देते जा रहे थे। बाद में जब देवराज का नंबर आया तो दानी कर्ण ने पूछा- विप्रवर, आज्ञा कीजिए! किस वस्तु की अभिलाषा लेकर आए हैं?
विप्र बने इन्द्र ने कहा, हे महाराज! मैं बहुत दूर से आपकी प्रसिद्धि सुनकर आया हूं। कहते हैं कि आप जैसा दानी तो इस धरा पर दूसरा कोई नहीं है। तो मुझे आशा ही नहीं विश्वास है कि मेरी इच्छित वस्तु तो मुझे अवश्य आप देंगे ही। फिर भी मन में कोई शंका न रहे इसलिए आप संकल्प कर लें तब ही मैं आपसे मांगूंगा अन्यथा आप कहें तो में खाली हाथ चला जाता हूं?
तब ब्राह्मण के भेष में इन्द्र ने और भी विनम्रतापूर्वक कहा- नहीं-नहीं राजन! आपके प्राण की कामना हम नहीं करते। बस हमें इच्छित वस्तु मिल जाए, तो हमें आत्मशांति मिले। पहले आप प्रण कर लें तो ही मैं आपसे दान मांगू।
कर्ण ने तैश में आकर जल हाथ में लेकर कहा- हम प्रण करते हैं विप्रवर! अब तुरंत मांगिए। तब क्षद्म इन्द्र ने कहा- राजन! आपके शरीर के कवच और कुंडल हमें दानस्वरूप चाहिए।
एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। कर्ण ने इन्द्र की आंखों में झांका और फिर दानवीर कर्ण ने बिना एक क्षण भी गंवाएं अपने कवच और कुंडल अपने शरीर से खंजर की सहायता से अलग किए और ब्राह्मण को सौंप दिए।
इन्द्र ने तुंरत वहां से दौड़ ही लगा दी और दूर खड़े रथ पर सवार होकर भाग गए। इसलिए कि कहीं उनका राज खुलने के बाद कर्ण बदल न जाए। कुछ मील जाकर इन्द्र का रथ नीचे उतरकर भूमि में धंस गया। तभी आकाशवाणी हुई, 'देवराज इन्द्र, तुमने बड़ा पाप किया है। अपने पुत्र अर्जुन की जान बचाने के लिए तूने छलपूर्वक कर्ण की जान खतरे में डाल दी है। अब यह रथ यहीं धंसा रहेगा और तू भी यहीं धंस जाएगा।'
तब इन्द्र ने आकाशवाणी से पूछा, इससे बचने का उपाय क्या है? तब आकाशवाणी ने कहा- अब तुम्हें दान दी गई वस्तु के बदले में बराबरी की कोई वस्तु देना होगी। इन्द्र क्या करते, उन्होंने यह मंजूर कर लिया। तब वे फिर से कर्ण के पास गए। लेकिन इस बार ब्राह्मण के वेश में नहीं। कर्ण ने उन्हें आता देखकर कहा- देवराज आदेश करिए और क्या चाहिए?
इन्द्र ने झेंपते हुए कहा, हे दानवीर कर्ण अब मैं याचक नहीं हूं बल्कि आपको कुछ देना चाहता हूं। कवच-कुंडल को छोड़कर मांग लीजिए, आपको जो कुछ भी मांगना हो।
कर्ण ने कहा- देवराज, मैंने आज तक कभी किसी से कुछ नही मांगा और न ही मुझे कुछ चाहिए। कर्ण सिर्फ दान देना जानता है, लेना नहीं।
तब इन्द्र ने विनम्रतापूर्वक कहा- महाराज कर्ण, आपको कुछ तो मांगना ही पड़ेगा अन्यथा मेरा रथ और मैं यहां से नहीं जा सकता हूं। आप कुछ मांगेंगे तो मुझ पर बड़ी कृपा होगी। आप जो भी मांगेंगे, मैं देने को तैयार हूं।
कर्ण ने कहा- देवराज, आप कितना ही प्रयत्न कीजिए लेकिन मैं सिर्फ दान देना जानता हूं, लेना नहीं। मैंने जीवन में कभी कोई दान नहीं लिया।
तब लाचार इन्द्र ने कहा- मैं यह वज्ररूपी शक्ति आपको बदले में देकर जा रहा हूं। तुम इसको जिसके ऊपर भी चला दोगे, वो बच नहीं पाएगा। भले ही साक्षात काल के ऊपर ही चला देना, लेकिन इसका प्रयोग सिर्फ एक बार ही कर पाओगे।
कर्ण कुछ कहते उसके पहले ही देवराज वह वज्र शक्ति वहां रखकर तुरंत भाग लिए। कर्ण के आवाज देने पर भी वे रुके नहीं। बाद में कर्ण को उस वज्र शक्ति को अपने पास मजबूरन रखना पड़ा। लेकिन जैसे ही दुर्योधन को मालूम पड़ा कि कर्ण ने अपने कवच-कुंडल दान में दे दिए हैं, तो दुर्योधन को तो चक्कर ही आ गए। उसको हस्तिनापुर का राज्य हाथ से जाता लगने लगा। लेकिन जब उसने सुना कि उसके बदले वज्र शक्ति मिल गई है तो फिर से उसकी जान में जान आई।
अब इसे भी कर्ण की गलती नहीं मान सकते। यह उसकी मजबूरी थी। लेकिन उसने यहां गलती यह की कि वह इन्द्र से कुछ मांग ही लेता। नहीं मांगने की गलती तो गलती ही है। अरे, वज्र शक्ति को तीन बार प्रयोग करने की इच्छा ही व्यक्त कर देता।
3.=अगले पन्ने पर, तीसरी गलती...
सर्प और कर्ण : अब यह कथा कितनी सच है, इस पर तो शोध होना चाहिए, क्योंकि यह लोककथा पर आधारित है। माना जाता है कि युद्ध के दौरान कर्ण के तूणीर में कहीं से एक बहुत ही जहरीला सर्प आकर बैठ गया। तूणीर अर्थात जहां तीर रखते हैं। यह पीछे पीठ पर बंधी होती है। कर्ण ने जब एक तीर निकालना चाहा तो तीर की जगह यह सर्प उनके हाथ में आ गया।
कर्ण ने पूछा, तुम कौन हो और यहां कहां से आ गए। तब सर्प ने कहा, हे दानवीर कर्ण, मैं अर्जुन से बदला लेने के लिए आपके तूणीर में जा बैठा था। कर्ण ने पूछा, क्यों? इस पर सर्प ने कहा, राजन! एक बार अर्जुन ने खांडव वन में आग लगा दी थी। उस आग में मेरी माता जलकर मर गई थी, तभी से मेरे मन में अर्जुन के प्रति विद्रोह है। मैं उससे प्रतिशोध लेने का अवसर देख रहा था। वह अवसर मुझे आज मिला है। कुछ रुककर सर्प फिर बोला, आप मुझे तीर के स्थान पर चला दें। मैं सीधा अर्जुन को जाकर डस लूंगा और कुछ ही क्षणों में उसके प्राण-पखेरू उड़ जाएंगे।
सर्प की बात सुनकर कर्ण सहजता से बोले, हे सर्पराज, आप गलत कार्य कर रहे हैं। जब अर्जुन ने खांडव वन में आग लगाई होगी तो उनका उद्देश्य तुम्हारी माता को जलाना कभी न रहा होगा। ऐसे में मैं अर्जुन को दोषी नहीं मानता। दूसरा अनैतिक तरह से विजय प्राप्त करना मेरे संस्कारों में नहीं है इसलिए आप वापस लौट जाएं और अर्जुन को कोई नुकसान न पहुंचाएं। सर्प वहां से उड़ गया और कर्ण को अपने प्राण गंवाने पड़े।
4.=अगले पन्ने पर, चौथी गलती...
ब्राह्मण का शाप : परशुरामजी के आश्रम से शिक्षा ग्रहण करने के बाद कर्ण वन में भटक रहे थे। इस दौरान वे शब्दभेदी विद्या सीख रहे थे। एक दिन जब वे इस विद्या का अभ्यास कर रहे थे तब उन्होंने एक गाय के बछड़े को अन्य वन्य पशु समझकर शब्दभेदी बाण चला दिया और उस बाण से बछडा़ मारा गया।
तब उस गाय-बछड़े के स्वामी ब्राह्मण ने कर्ण को शाप दे दिया कि जिस प्रकार उसने एक असहाय बछड़े को मारा है, वैसे ही एक दिन वह भी तब मारा जाएगा जबकि वह खुद को असहाय महसूस करेगा और जब उसका सारा ध्यान अपने शत्रु से कहीं अलग किसी और काम पर होगा।
हुआ भी यही था कि जब कर्ण का अर्जुन से घोर युद्ध चल रहा था तब उसके रथ का पहिया बार-बार भूमि में धंस जाता था और वह उसे निकालकर फिर से युद्ध करने लगता था। ऐसे समय में जब फिर से उसके रथ का पहिया भूमि में धंस गया तब वह फिर से उसे निकालने लगा और उसे उस समय घबराहट भी हो रही थी व उसका सारा ध्यान युद्ध के अलावा पहिए पर चला गया था। वह खुद को असहाय महसूस कर रहा था। ऐसे मौके का लाभ उठाकर अर्जुन ने कर्ण को मार दिया।
5.=अंत में पांचवीं गलती...
कुंती को दिया वचन : एक बार कुंती कर्ण के पास गई और उससे पांडवों की ओर से लड़ने का आग्रह करने लगी। कर्ण को मालूम था कि कुंती मेरी मां है। कुंती के लाख समझाने पर भी कर्ण नहीं माने और कहा कि जिनके साथ मैंने अब तक का अपना सारा जीवन बिताया उसके साथ मैं विश्वासघात नहीं कर सकता।
तब कुंती ने कहा कि क्या तुम अपने भाइयों को मारोगे? इस पर कर्ण ने बड़ी ही दुविधा की स्थिति में वचन दिया, 'माते, तुम जानती हो कि कर्ण के यहां याचक बनकर आया कोई भी खाली हाथ नहीं जाता अत: मैं तुम्हें वचन देता हूं कि अर्जुन को छोड़कर मैं अपने अन्य भाइयों पर शस्त्र नहीं उठाऊंगा।'
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ब्रह्मास्त्र : उस काल में द्रोणाचार्य, परशुराम और वेदव्यास को ही ब्रह्मास्त्र चलाना और किसी के द्वारा ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किए जाने पर उसे असफल कर देना याद था। उन्होंने यह विद्या अपने कुछ खास शिष्यों को ही प्रदान की थी। उसमें भी किस तरह ब्रह्मास्त्र को असफल करना, यह कम ही शिष्यों को याद था।
जब द्रोणाचार्य ने कर्ण के सूत पुत्र होने को जानकर ब्रह्मास्त्र विद्या सिखाने से इंकार कर दिया, तब वे परशुराम के पास पहुंच गए। परशुराम ने प्रण लिया था कि वे इस विद्या को किसी ब्राह्मण को ही सिखाएंगे, क्योंकि इस विद्या के दुरुपयोग का खतरा बढ़ गया था।
कर्ण यह सीखना चाहता था तो उसने परशुराम के पास पहुंचकर खुद को ब्राह्मण का पुत्र बताया और उनसे यह विद्या सीख ली। परशुराम ने ब्रह्मास्त्र के अलावा कर्ण को अन्य सभी अस्त्र-शस्त्रों की शिक्षा दी थी।
फिर एक दिन जंगल में कहीं जाते हुए परशुरामजी को थकान महसूस हुई, उन्होंने कर्ण से कहा कि वे थोड़ी देर सोना चाहते हैं। कर्ण ने उनका सिर अपनी गोद में रख लिया। परशुराम गहरी नींद में सो गए। तभी कहीं से एक कीड़ा आया और वह कर्ण की जांघ पर डंक मारने लगा। कर्ण की जांघ पर घाव हो गया। लेकिन परशुराम की नींद खुल जाने के भय से वह चुपचाप बैठा रहा, घाव से खून बहने लगा।
बहते खून ने जब परशुराम को छुआ तो उनकी नींद खुल गई। उन्होंने कर्ण से पूछा कि तुमने उस कीड़े को हटाया क्यों नहीं? कर्ण ने कहा कि आपकी नींद टूटने का डर था इसलिए। परशुराम ने कहा कि किसी ब्राह्मण में इतनी सहनशीलता नहीं हो सकती है। तुम जरूर कोई क्षत्रिय हो। सच-सच बताओ। तब कर्ण ने सच बता दिया।
क्रोधित परशुराम ने कर्ण को उसी समय शाप दिया कि तुमने मुझसे जो भी विद्या सीखी है वह झूठ बोलकर सीखी है इसलिए जब भी तुम्हें इस विद्या की सबसे ज्यादा आवश्यकता होगी, तभी तुम इसे भूल जाओगे। कोई भी दिव्यास्त्र का उपयोग नहीं कर पाओगे।
लेकिन अब सवाल यह उठता है कि यदि वह झूठ नहीं बोलता तो सच बताकर क्या परशुराम उसे विद्या सिखाते? नहीं सिखाते...। तब वे किससे सीखते? निश्चित ही यह भूल थी लेकिन भूल नहीं भी थी।
2.=अगले पन्ने पर, दूसरी गलती...
कवच और कुंडल : भगवान कृष्ण यह भली-भांति जानते थे कि जब तक कर्ण के पास उसका कवच और कुंडल है, तब तक उसे कोई नहीं मार सकता। ऐसे में अर्जुन की सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं। उधर देवराज इन्द्र भी चिंतित थे, क्योंकि अर्जुन उनका पुत्र था। भगवान कृष्ण और देवराज इन्द्र दोनों जानते थे कि जब तक कर्ण के पास पैदायशी कवच और कुंडल हैं, वह युद्ध में अजेय रहेगा।
तब कृष्ण ने देवराज इन्द्र को एक उपाय बताया और फिर देवराज इन्द्र एक ब्राह्मण के वेश में पहुंच गए कर्ण के द्वार। देवराज भी सभी के साथ लाइन में खड़े हो गए। कर्ण सभी को कुछ न कुछ दान देते जा रहे थे। बाद में जब देवराज का नंबर आया तो दानी कर्ण ने पूछा- विप्रवर, आज्ञा कीजिए! किस वस्तु की अभिलाषा लेकर आए हैं?
विप्र बने इन्द्र ने कहा, हे महाराज! मैं बहुत दूर से आपकी प्रसिद्धि सुनकर आया हूं। कहते हैं कि आप जैसा दानी तो इस धरा पर दूसरा कोई नहीं है। तो मुझे आशा ही नहीं विश्वास है कि मेरी इच्छित वस्तु तो मुझे अवश्य आप देंगे ही। फिर भी मन में कोई शंका न रहे इसलिए आप संकल्प कर लें तब ही मैं आपसे मांगूंगा अन्यथा आप कहें तो में खाली हाथ चला जाता हूं?
तब ब्राह्मण के भेष में इन्द्र ने और भी विनम्रतापूर्वक कहा- नहीं-नहीं राजन! आपके प्राण की कामना हम नहीं करते। बस हमें इच्छित वस्तु मिल जाए, तो हमें आत्मशांति मिले। पहले आप प्रण कर लें तो ही मैं आपसे दान मांगू।
कर्ण ने तैश में आकर जल हाथ में लेकर कहा- हम प्रण करते हैं विप्रवर! अब तुरंत मांगिए। तब क्षद्म इन्द्र ने कहा- राजन! आपके शरीर के कवच और कुंडल हमें दानस्वरूप चाहिए।
एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। कर्ण ने इन्द्र की आंखों में झांका और फिर दानवीर कर्ण ने बिना एक क्षण भी गंवाएं अपने कवच और कुंडल अपने शरीर से खंजर की सहायता से अलग किए और ब्राह्मण को सौंप दिए।
इन्द्र ने तुंरत वहां से दौड़ ही लगा दी और दूर खड़े रथ पर सवार होकर भाग गए। इसलिए कि कहीं उनका राज खुलने के बाद कर्ण बदल न जाए। कुछ मील जाकर इन्द्र का रथ नीचे उतरकर भूमि में धंस गया। तभी आकाशवाणी हुई, 'देवराज इन्द्र, तुमने बड़ा पाप किया है। अपने पुत्र अर्जुन की जान बचाने के लिए तूने छलपूर्वक कर्ण की जान खतरे में डाल दी है। अब यह रथ यहीं धंसा रहेगा और तू भी यहीं धंस जाएगा।'
तब इन्द्र ने आकाशवाणी से पूछा, इससे बचने का उपाय क्या है? तब आकाशवाणी ने कहा- अब तुम्हें दान दी गई वस्तु के बदले में बराबरी की कोई वस्तु देना होगी। इन्द्र क्या करते, उन्होंने यह मंजूर कर लिया। तब वे फिर से कर्ण के पास गए। लेकिन इस बार ब्राह्मण के वेश में नहीं। कर्ण ने उन्हें आता देखकर कहा- देवराज आदेश करिए और क्या चाहिए?
इन्द्र ने झेंपते हुए कहा, हे दानवीर कर्ण अब मैं याचक नहीं हूं बल्कि आपको कुछ देना चाहता हूं। कवच-कुंडल को छोड़कर मांग लीजिए, आपको जो कुछ भी मांगना हो।
कर्ण ने कहा- देवराज, मैंने आज तक कभी किसी से कुछ नही मांगा और न ही मुझे कुछ चाहिए। कर्ण सिर्फ दान देना जानता है, लेना नहीं।
तब इन्द्र ने विनम्रतापूर्वक कहा- महाराज कर्ण, आपको कुछ तो मांगना ही पड़ेगा अन्यथा मेरा रथ और मैं यहां से नहीं जा सकता हूं। आप कुछ मांगेंगे तो मुझ पर बड़ी कृपा होगी। आप जो भी मांगेंगे, मैं देने को तैयार हूं।
कर्ण ने कहा- देवराज, आप कितना ही प्रयत्न कीजिए लेकिन मैं सिर्फ दान देना जानता हूं, लेना नहीं। मैंने जीवन में कभी कोई दान नहीं लिया।
तब लाचार इन्द्र ने कहा- मैं यह वज्ररूपी शक्ति आपको बदले में देकर जा रहा हूं। तुम इसको जिसके ऊपर भी चला दोगे, वो बच नहीं पाएगा। भले ही साक्षात काल के ऊपर ही चला देना, लेकिन इसका प्रयोग सिर्फ एक बार ही कर पाओगे।
कर्ण कुछ कहते उसके पहले ही देवराज वह वज्र शक्ति वहां रखकर तुरंत भाग लिए। कर्ण के आवाज देने पर भी वे रुके नहीं। बाद में कर्ण को उस वज्र शक्ति को अपने पास मजबूरन रखना पड़ा। लेकिन जैसे ही दुर्योधन को मालूम पड़ा कि कर्ण ने अपने कवच-कुंडल दान में दे दिए हैं, तो दुर्योधन को तो चक्कर ही आ गए। उसको हस्तिनापुर का राज्य हाथ से जाता लगने लगा। लेकिन जब उसने सुना कि उसके बदले वज्र शक्ति मिल गई है तो फिर से उसकी जान में जान आई।
अब इसे भी कर्ण की गलती नहीं मान सकते। यह उसकी मजबूरी थी। लेकिन उसने यहां गलती यह की कि वह इन्द्र से कुछ मांग ही लेता। नहीं मांगने की गलती तो गलती ही है। अरे, वज्र शक्ति को तीन बार प्रयोग करने की इच्छा ही व्यक्त कर देता।
3.=अगले पन्ने पर, तीसरी गलती...
सर्प और कर्ण : अब यह कथा कितनी सच है, इस पर तो शोध होना चाहिए, क्योंकि यह लोककथा पर आधारित है। माना जाता है कि युद्ध के दौरान कर्ण के तूणीर में कहीं से एक बहुत ही जहरीला सर्प आकर बैठ गया। तूणीर अर्थात जहां तीर रखते हैं। यह पीछे पीठ पर बंधी होती है। कर्ण ने जब एक तीर निकालना चाहा तो तीर की जगह यह सर्प उनके हाथ में आ गया।
कर्ण ने पूछा, तुम कौन हो और यहां कहां से आ गए। तब सर्प ने कहा, हे दानवीर कर्ण, मैं अर्जुन से बदला लेने के लिए आपके तूणीर में जा बैठा था। कर्ण ने पूछा, क्यों? इस पर सर्प ने कहा, राजन! एक बार अर्जुन ने खांडव वन में आग लगा दी थी। उस आग में मेरी माता जलकर मर गई थी, तभी से मेरे मन में अर्जुन के प्रति विद्रोह है। मैं उससे प्रतिशोध लेने का अवसर देख रहा था। वह अवसर मुझे आज मिला है। कुछ रुककर सर्प फिर बोला, आप मुझे तीर के स्थान पर चला दें। मैं सीधा अर्जुन को जाकर डस लूंगा और कुछ ही क्षणों में उसके प्राण-पखेरू उड़ जाएंगे।
सर्प की बात सुनकर कर्ण सहजता से बोले, हे सर्पराज, आप गलत कार्य कर रहे हैं। जब अर्जुन ने खांडव वन में आग लगाई होगी तो उनका उद्देश्य तुम्हारी माता को जलाना कभी न रहा होगा। ऐसे में मैं अर्जुन को दोषी नहीं मानता। दूसरा अनैतिक तरह से विजय प्राप्त करना मेरे संस्कारों में नहीं है इसलिए आप वापस लौट जाएं और अर्जुन को कोई नुकसान न पहुंचाएं। सर्प वहां से उड़ गया और कर्ण को अपने प्राण गंवाने पड़े।
4.=अगले पन्ने पर, चौथी गलती...
ब्राह्मण का शाप : परशुरामजी के आश्रम से शिक्षा ग्रहण करने के बाद कर्ण वन में भटक रहे थे। इस दौरान वे शब्दभेदी विद्या सीख रहे थे। एक दिन जब वे इस विद्या का अभ्यास कर रहे थे तब उन्होंने एक गाय के बछड़े को अन्य वन्य पशु समझकर शब्दभेदी बाण चला दिया और उस बाण से बछडा़ मारा गया।
तब उस गाय-बछड़े के स्वामी ब्राह्मण ने कर्ण को शाप दे दिया कि जिस प्रकार उसने एक असहाय बछड़े को मारा है, वैसे ही एक दिन वह भी तब मारा जाएगा जबकि वह खुद को असहाय महसूस करेगा और जब उसका सारा ध्यान अपने शत्रु से कहीं अलग किसी और काम पर होगा।
हुआ भी यही था कि जब कर्ण का अर्जुन से घोर युद्ध चल रहा था तब उसके रथ का पहिया बार-बार भूमि में धंस जाता था और वह उसे निकालकर फिर से युद्ध करने लगता था। ऐसे समय में जब फिर से उसके रथ का पहिया भूमि में धंस गया तब वह फिर से उसे निकालने लगा और उसे उस समय घबराहट भी हो रही थी व उसका सारा ध्यान युद्ध के अलावा पहिए पर चला गया था। वह खुद को असहाय महसूस कर रहा था। ऐसे मौके का लाभ उठाकर अर्जुन ने कर्ण को मार दिया।
5.=अंत में पांचवीं गलती...
कुंती को दिया वचन : एक बार कुंती कर्ण के पास गई और उससे पांडवों की ओर से लड़ने का आग्रह करने लगी। कर्ण को मालूम था कि कुंती मेरी मां है। कुंती के लाख समझाने पर भी कर्ण नहीं माने और कहा कि जिनके साथ मैंने अब तक का अपना सारा जीवन बिताया उसके साथ मैं विश्वासघात नहीं कर सकता।
तब कुंती ने कहा कि क्या तुम अपने भाइयों को मारोगे? इस पर कर्ण ने बड़ी ही दुविधा की स्थिति में वचन दिया, 'माते, तुम जानती हो कि कर्ण के यहां याचक बनकर आया कोई भी खाली हाथ नहीं जाता अत: मैं तुम्हें वचन देता हूं कि अर्जुन को छोड़कर मैं अपने अन्य भाइयों पर शस्त्र नहीं उठाऊंगा।'
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2>> दानवीर कर्ण
तीन पत्तों वाला चमत्कारी वटवृक्ष।
हजारो वर्ष पुर्व महाभारत के समय का हैं यह वटवृक्ष.......
जब महाभारत के युद्ध मे अंगराज कर्ण कुरुक्षेत्र मे अर्जुन के वाणो से घायल व मरणासन्न पड़े थे तब, अर्जुन ने
उनका उपहास किया तब प्रभु श्री कृष्ण ने अंगराज की दानवीरता को समग्र विश्व मे प्रमाणित करने हेतु एक लीला की ......
प्रभु श्री कृष्ण एक साधु का वेश धारण करके अंगराज कर्ण के पास भिक्षा मांगने जाते हैं, तब महारथी कर्ण ब्राह्मण
देव से कहते हैं की, " हे ब्राह्मण देव मै तो स्वयं मरणासन्न हू , इस समय आपकी क्या सेवा करूँ, इसपर ब्राह्मण ने
कहाँ की " हे दानवीर मैंने आपकी दानवीरता की बड़ी महिमा सुनी हैं, की कोई भी आपके द्वार से रिक्त हाथ
नहीं जाता , बड़ी आस लेकर आया था ।
इसपर सूर्य पुत्र कर्ण को याद आया की उनके मुख मे एक स्वर्ण दन्त हैं जो की जन्मजात है उनके मुख में ....
तब कर्ण ने अपने वाण से उस दांत को निकाला व उस ब्राह्मण को दिया तब ब्राह्मण ने कहाँ हे " हे दानवीर इसपर
आपका रक्त लगा हैं मैं कैसे ग्रहण करू???
तब कर्ण ने अपने वाण से गंगा जी को प्रकट किया और उस दांत को धोकर ब्राह्मण देव को अर्पण किया....
तब उस ब्राह्मण देव( श्रीकृष्ण) ने अपना वास्तविक रुप धारण किया व कर्ण को दर्शन देते हुए कहाँ" धन्य हैं हे
दानवीर आपकी माताको जिसने आप जैसे दिव्यात्मा को जन्म दिया, व धन्य हैं आपका व्रत जो कभी कोइ याचक
आपके द्वार से रिक्त नहीं जाता। मैं आपसे अति प्रसन्न हू मुझसे कोइ वरदान मांगों अंगराज। यह सब देखकर
अर्जुन शर्मिंदा होता हैं। तब अंगराज कर्ण ने कहाँ" हैं प्रभु मैं केवल देता हूँ लेता नहीं।परंतु एक वीनंती हैं आपसे की
मै एक कुवारी माता का पुत्र हूँ तो मेरा दाह संस्कार भी कुवारी धरा पर ही हो।
इतना कहकर अंगराज कर्ण सदा सर्वदा के लिए सुर्यलोक को चले जाते हैं।
पुरे भारतवर्ष मे भ्रमण करने पर सुर्यपुर क्षेत्र के तापी तट पर ( हाल सूरत , गुजरात) सुई के नोक जितनी भुमि ही
निष्पाप मिली। तब भगवान श्री कृष्ण ने वहा सुइ को रखकर उ के उपर अपने कमाल समान हथेली को रखा
व इस पर महारथी कर्ण के पार्थिव देह को रखा और उनका अंतिम संस्कार किया।
तब सारे देवी देवता उस द्रव्य को निहारने वहाँ आए व पुष्प वर्षा की। परंतु पांडवों के मन मे संशय हुआ की,
क्या सत्य मे यह भूमि निष्पाप हैं?? तब आकाशवाणी हुई और कर्ण ने कहाँ की मेरे अनुजो मन मे संशय न रखे
यह कुवारी भूमि ही हैं ।यह अश्विनी कुमार की भुमि हैं जो मेरे भाई हैं इसलिए निश्चिंत हो जाओ।
पश्चात श्रीकृष्ण ने प्रमाण स्वरुप वहाँ पर जहां कर्ण की चिता भस्म थी वहाँ एक वटवृक्ष प्रकट हुआ जिसपर मात्र तीन
पत्ते लगे थे व श्रीकृष्ण ने कहाँ इसपर कभी भी तीन से अधिक पत्ते नहीं रहेंगे यह तीनों पत्ते साक्षात् त्रिदेव
विराजमान रहेंगे व इसके तने मे अंगराज की दिव्य आत्मा।
कहाँ जाता हैं यहा मांगी हर मन्नत स्वयं अंगराज व त्रिदेव पुर्ण करते हैं
यहा पर रविवार के दिन किये दर्शन विशेष फलदायी होते हैं क्योंकि अंगराज स्वयं सुर्यपुत्र थे ।
जय हो तीन पत्तो वाले चमत्कारी वटवृक्ष की
जय हो लीला पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण की
जय हो दानवीर कर्ण की
जय हो माँ ताप्ती की
ताप्ती पुराण से लिया गया।
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👉3>जानिए महाभारत में कौन था कर्ण से भी बड़ा महादानी दानवीर
🌷हमारे देश के बहुत से धार्मिक स्थल चमत्कारों व वरदानों के लिए प्रसिद्ध हैं. उन्हें में से एक है राजस्थान का प्रसिद्ध “खाटू श्याम मंदिर”. इस मंदिर में भीम के पोते और घटोत्कच के बेटे बर्बरीक की श्याम-रुप में पूजा की जाती है. कहा जाता है कि जो भी इस मंदिर में जाता है उन्हें बाबा का नित नया रुप देखने को मिलता है. कई लोगों को तो इनके आकार में भी बदलाव नज़र आता है. कभी मोटा तो कभी दुबला. कभी हंसता हुआ तो कभी ऐसा तेज भरा कि नजरें टिकाना मुश्किल हो जाता है.मान्यता है कि इस बालक में बचपन से ही वीर और महान योद्धा के गुण थे. इन्होंने भगवान शिव को प्रसन्न कर उनसे तीन अभेद्य बाण प्राप्त किए थे. इसी कारण इन्हें तीन बाणधारी भी कहा जाता था. स्वयं अग्निदेव ने इनसे प्रसन्न होकर ऐसा धनुष प्रदान किया था जिससे वह तीनों लोकों में विजय प्राप्त करने का सामर्थ्य रखते थे.
🌷महाभारत के युद्ध की शुरुआत में बर्बरीक ने अपनी माता के समक्ष इस युद्ध में जाने की इच्छा प्रकट की. उन्होनें माता से पूछा- मैं इस युद्ध में किसका साथ दूँ? माता ने सोचा कौरवों के साथ तो उनकी विशाल सेना, स्वयं भीष्म पितामह, गुरु द्रोण, कृपाचार्य, अंगराज कर्ण जैसे महारथी हैं. इनके सामने पाण्डव अवश्य ही हार जाएँगे. ऐसा सोच वह बर्बरीक से बोली ” जो हार रहा हो तुम उसी का सहारा बनो.’’ बालक बर्बरीक ने माता को वचन दिया कि वह ऐसा ही करेंगे.
अब वो अपने नीले घोड़े पर सवार हो युद्ध भूमि की ओर निकल पड़े.
🌷अंर्तयामी, सर्वव्यापी भगवान श्रीकृष्ण युद्ध का अंत जानते थे. इसीलिए उन्होनें सोचा की अगर कौरवों को हारता देखकर बर्बरीक कौरवों का साथ देने लगा तो पाण्डवों की हार तय है. इसलिए श्रीकृष्ण ने ब्राह्मण का वेश धारण कर चालाकी से बालक बर्बरीक के सामने प्रकट हो उनका शीश दान में माँग लिया.
🌷बालक बर्बरीक सोच में पड़ गया कि कोई ब्राह्मण मेरा शीश क्यों माँगेगा? यह सोच उन्होंने ब्राह्मण से उनके असली रुप के दर्शन की इच्छा व्यक्त की. भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें अपने विराट रुप में दर्शन दिया. बर्बरीक ने भगवान श्रीकृष्ण से सम्पूर्ण युद्ध देखने की इच्छा प्रकट की. भगवान बोले -तथास्तु. ऐसा सुन बालक बर्बरीक ने अपने आराध्य देवी-देवताओं और माता को नमन किया और कमर से कटार खींचकर एक ही वार में अपने शीश को धड़ से अलग कर श्रीकृष्ण को दान कर दिया.
🌷श्रीकृष्ण ने तेजी से उनके शीश को अपने हाथ में उठाया एवं अमृत से सींचकर अमर करते हुए युद्ध-भूमि के समीप ही सबसे उँची पहाड़ी पर सुशोभित कर दिया, जहाँ से बर्बरीक पूरा युद्ध देख सकते थे.
🌷बर्बरीक मौन हो महाभारत का युद्ध देखते रहे. युद्ध की समाप्ति पर पांडव विजयी हुए. आत्म-प्रशंसा में पांडव विजय का श्रेय अपने ऊपर लेने लगे. आखिरकार निर्णय के लिए सभी श्रीकृष्ण के पास गये. भगवान श्रीकृष्ण बोले- ‘मैं तो स्वयं व्यस्त था. इसीलिए मैं किसी का पराक्रम नहीं देख सका. ऐसा करते हैं, सभी बर्बरीक के पास चलते हैं.’ बर्बरीक के शीश-दान की कहानी अब तक पांडवों को मालूम नहीं थी. वहाँ पहुँच कर भगवान श्रीकृष्ण ने उनसे पांडवों के पराक्रम के बारे में जानना चाहा. बर्बरीक के शीश ने उत्तर दिया – “भगवन युद्ध में आपका सुदर्शन नाच रहा था और जगदम्बा लहू का पान कर रही थी. मुझे तो ये लोग कहीं भी नजर नहीं आए.’’ बर्बरीक का उत्तर सुन सभी की नजरें नीचे झुक गई.
🌷तब श्रीकृष्ण ने बर्बरीक का परिचय कराया और बर्बरीक पर प्रसन्न होकर इनका नाम श्याम रख दिया. अपनी कलाएँ एवँ अपनी शक्तियाँ प्रदान करते हुए भगवान श्रीकृष्ण बोले- बर्बरीक धरती पर तुम से बड़ा दानी ना तो कोई हुआ है, और ना ही होगा. माँ को दिये वचन के अनुसार ‘ तुम हारे का सहारा बनोगे. कल्याण की भावना से जो लोग तुम्हारे दरबार में, तुमसे जो भी मांगेंगे उन्हें मिलेगा. तुम्हारे दर पर सभी की इच्छाएँ पूर्ण होगी.’ इस तरह से खाटू श्याम मंदिर अस्तित्व में आया.
🌷हमारे देश के बहुत से धार्मिक स्थल चमत्कारों व वरदानों के लिए प्रसिद्ध हैं. उन्हें में से एक है राजस्थान का प्रसिद्ध “खाटू श्याम मंदिर”. इस मंदिर में भीम के पोते और घटोत्कच के बेटे बर्बरीक की श्याम-रुप में पूजा की जाती है. कहा जाता है कि जो भी इस मंदिर में जाता है उन्हें बाबा का नित नया रुप देखने को मिलता है. कई लोगों को तो इनके आकार में भी बदलाव नज़र आता है. कभी मोटा तो कभी दुबला. कभी हंसता हुआ तो कभी ऐसा तेज भरा कि नजरें टिकाना मुश्किल हो जाता है.मान्यता है कि इस बालक में बचपन से ही वीर और महान योद्धा के गुण थे. इन्होंने भगवान शिव को प्रसन्न कर उनसे तीन अभेद्य बाण प्राप्त किए थे. इसी कारण इन्हें तीन बाणधारी भी कहा जाता था. स्वयं अग्निदेव ने इनसे प्रसन्न होकर ऐसा धनुष प्रदान किया था जिससे वह तीनों लोकों में विजय प्राप्त करने का सामर्थ्य रखते थे.
🌷महाभारत के युद्ध की शुरुआत में बर्बरीक ने अपनी माता के समक्ष इस युद्ध में जाने की इच्छा प्रकट की. उन्होनें माता से पूछा- मैं इस युद्ध में किसका साथ दूँ? माता ने सोचा कौरवों के साथ तो उनकी विशाल सेना, स्वयं भीष्म पितामह, गुरु द्रोण, कृपाचार्य, अंगराज कर्ण जैसे महारथी हैं. इनके सामने पाण्डव अवश्य ही हार जाएँगे. ऐसा सोच वह बर्बरीक से बोली ” जो हार रहा हो तुम उसी का सहारा बनो.’’ बालक बर्बरीक ने माता को वचन दिया कि वह ऐसा ही करेंगे.
अब वो अपने नीले घोड़े पर सवार हो युद्ध भूमि की ओर निकल पड़े.
🌷अंर्तयामी, सर्वव्यापी भगवान श्रीकृष्ण युद्ध का अंत जानते थे. इसीलिए उन्होनें सोचा की अगर कौरवों को हारता देखकर बर्बरीक कौरवों का साथ देने लगा तो पाण्डवों की हार तय है. इसलिए श्रीकृष्ण ने ब्राह्मण का वेश धारण कर चालाकी से बालक बर्बरीक के सामने प्रकट हो उनका शीश दान में माँग लिया.
🌷बालक बर्बरीक सोच में पड़ गया कि कोई ब्राह्मण मेरा शीश क्यों माँगेगा? यह सोच उन्होंने ब्राह्मण से उनके असली रुप के दर्शन की इच्छा व्यक्त की. भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें अपने विराट रुप में दर्शन दिया. बर्बरीक ने भगवान श्रीकृष्ण से सम्पूर्ण युद्ध देखने की इच्छा प्रकट की. भगवान बोले -तथास्तु. ऐसा सुन बालक बर्बरीक ने अपने आराध्य देवी-देवताओं और माता को नमन किया और कमर से कटार खींचकर एक ही वार में अपने शीश को धड़ से अलग कर श्रीकृष्ण को दान कर दिया.
🌷श्रीकृष्ण ने तेजी से उनके शीश को अपने हाथ में उठाया एवं अमृत से सींचकर अमर करते हुए युद्ध-भूमि के समीप ही सबसे उँची पहाड़ी पर सुशोभित कर दिया, जहाँ से बर्बरीक पूरा युद्ध देख सकते थे.
🌷बर्बरीक मौन हो महाभारत का युद्ध देखते रहे. युद्ध की समाप्ति पर पांडव विजयी हुए. आत्म-प्रशंसा में पांडव विजय का श्रेय अपने ऊपर लेने लगे. आखिरकार निर्णय के लिए सभी श्रीकृष्ण के पास गये. भगवान श्रीकृष्ण बोले- ‘मैं तो स्वयं व्यस्त था. इसीलिए मैं किसी का पराक्रम नहीं देख सका. ऐसा करते हैं, सभी बर्बरीक के पास चलते हैं.’ बर्बरीक के शीश-दान की कहानी अब तक पांडवों को मालूम नहीं थी. वहाँ पहुँच कर भगवान श्रीकृष्ण ने उनसे पांडवों के पराक्रम के बारे में जानना चाहा. बर्बरीक के शीश ने उत्तर दिया – “भगवन युद्ध में आपका सुदर्शन नाच रहा था और जगदम्बा लहू का पान कर रही थी. मुझे तो ये लोग कहीं भी नजर नहीं आए.’’ बर्बरीक का उत्तर सुन सभी की नजरें नीचे झुक गई.
🌷तब श्रीकृष्ण ने बर्बरीक का परिचय कराया और बर्बरीक पर प्रसन्न होकर इनका नाम श्याम रख दिया. अपनी कलाएँ एवँ अपनी शक्तियाँ प्रदान करते हुए भगवान श्रीकृष्ण बोले- बर्बरीक धरती पर तुम से बड़ा दानी ना तो कोई हुआ है, और ना ही होगा. माँ को दिये वचन के अनुसार ‘ तुम हारे का सहारा बनोगे. कल्याण की भावना से जो लोग तुम्हारे दरबार में, तुमसे जो भी मांगेंगे उन्हें मिलेगा. तुम्हारे दर पर सभी की इच्छाएँ पूर्ण होगी.’ इस तरह से खाटू श्याम मंदिर अस्तित्व में आया.
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दानवीर कर्ण एवं द्रोपदी दोनों करना चाहते थे एक दूसरे से विवाह परन्तु इसलिए नहीं चुना द्रोपदी ने कर्ण को अपना पति …
1>Karna :-
जब कर्ण ( karna ) का जन्म हुआ था उस समय कुंती अविवाहित थी. समाज के तानो एवं लांछनों से बचने के लिए कुंती ने अपने पुत्र कर्ण ( karna ) को नदी में बहा दिया. एक सूत परिवार को कर्ण जब बहते हुए मिला तो उन्होंने कर्ण ( karna ) को अपने पुत्र के रूप में पालने का निर्णय लिया. सूत दम्पति के पास पलने के कारण कर्ण ( karna ) सूतपुत्र कहलाए.
कर्ण ( karna ) ने अपनी शिक्षा दीक्षा परशुराम के आश्रम में सम्पन्न करी. कर्ण अंगदेश के राजा थे. एक बार कर्ण जब पांचाल नगरी अपने मित्र दुर्योधन के किसी कार्य से आये तो वहां उन्हें एक सुंदर कन्या दिखी जिसका नाम द्रोपदी था. द्रोपदी एवं कर्ण ( karna ) दोनों एक दूसरे को देखकर आकर्षित हो गए तथा दोनों एक दूसरे से विवाह करना चाहते थे.
स्वयम्बर से पूर्व द्रोपदी ने यह निर्णय लिया था की वह स्वयम्बर में कर्ण ( karna ) के गले में ही वह वरमाला डालेगी. परन्तु आखिर ऐसा किया हुआ की द्रोपदी ने स्वयंबर में अपना निर्णय बदल लिया और कर्ण की जगह अर्जुन के गले में वरमाला डाल दी ?
दरअसल स्वयंबर से पूर्व द्रोपदी इस बात से अपरिचित थी की कर्ण ( karna ) एक सूत पूत्र है तथा यह बात द्रोपदी को अपनी एक दासी से पता चली. अब यदि द्रोपदी कर्ण ( karna ) से विवाह करती तो उसके परिवार को अनेको लांछनों का समाना करना पड़ता अतः अपने परिवार के सम्मान को बचाने के लिए द्रोपदी को न चाहते हुए भी कर्ण के साथ विवाह के प्रस्ताव को ठुकराना पड़ा.
द्रोपदी के स्वयम्बर में महाराज द्रुपद ने यह शर्त रखी थी की जो भी वीर पुरुष सामने रखे धनुष को उठाकर, उसमे डोर चढ़ाकर उपर घूम रही मछली के आँखों में निशाना लगाएगा वही मेरी पुत्री से विवाह करने योग्य होगा.
परन्तु यह प्रतिस्प्रथा इतनी आसान नहीं थी जितनी लग रही थी. वास्तविकता में जो धनुष स्वयम्बर के लिए रखा गया था वह एक विशेष धातु से बना हुआ था जिस कारण उसका वजन बहुत अधिक हो गया था,
जिसे उठाने के लिए हाथी जितने बल की आवश्यकता पड़ती. तथा मछली की आँखों में निशाना निचे तेल से भरे बर्तन में मछली की परछाई देख कर लगाना था. इसके आलावा निशाने के लिए केवाल एक ही बाण का प्रयोग किया जा सकता था.
इस प्रकार के शर्त को पूरा करने का सामर्थ्य अर्जुन के अलावा केवल कर्ण ( karna ) के पास था. क्योकि धनुर्विद्या में वे अर्जुन के समान कुशाल थे, केवल कुशल ही नहीं कई बार उन्हें अर्जुन से ज्यादा सामर्थ्यावान माना गया है.
कर्ण ( karna ) स्वयम्बर में रखी गई शर्त को पूरा करने के लिए उठे तथा उन्होंने उस अत्यधिक वजनी धनुस को एक ही बार में उठा लिया. उनके इस पराक्रम को देख सभा में सभी आश्चर्यचकित रह गए. उधर द्रोपदी जानती थी की कर्ण ( karna ) स्वयंबर में रखे गए शर्त को अवश्य ही पूरा कर लेंगे. और वह ऐसा चाहती थी परन्तु अपने परिवार के सम्मान को ध्यान में रख द्रोपदी ने कर्ण को अपमानित कर उन्हें स्वयंबर की शर्त पूरी करने से रोक दिया.
4>दानवीर कर्ण एवं द्रोपदी दोनों करना चाहते थे एक दूसरे से विवाह
दानवीर कर्ण एवं द्रोपदी दोनों करना चाहते थे एक दूसरे से विवाह परन्तु इसलिए नहीं चुना द्रोपदी ने कर्ण को अपना पति …
1>Karna :-
जब कर्ण ( karna ) का जन्म हुआ था उस समय कुंती अविवाहित थी. समाज के तानो एवं लांछनों से बचने के लिए कुंती ने अपने पुत्र कर्ण ( karna ) को नदी में बहा दिया. एक सूत परिवार को कर्ण जब बहते हुए मिला तो उन्होंने कर्ण ( karna ) को अपने पुत्र के रूप में पालने का निर्णय लिया. सूत दम्पति के पास पलने के कारण कर्ण ( karna ) सूतपुत्र कहलाए.
कर्ण ( karna ) ने अपनी शिक्षा दीक्षा परशुराम के आश्रम में सम्पन्न करी. कर्ण अंगदेश के राजा थे. एक बार कर्ण जब पांचाल नगरी अपने मित्र दुर्योधन के किसी कार्य से आये तो वहां उन्हें एक सुंदर कन्या दिखी जिसका नाम द्रोपदी था. द्रोपदी एवं कर्ण ( karna ) दोनों एक दूसरे को देखकर आकर्षित हो गए तथा दोनों एक दूसरे से विवाह करना चाहते थे.
स्वयम्बर से पूर्व द्रोपदी ने यह निर्णय लिया था की वह स्वयम्बर में कर्ण ( karna ) के गले में ही वह वरमाला डालेगी. परन्तु आखिर ऐसा किया हुआ की द्रोपदी ने स्वयंबर में अपना निर्णय बदल लिया और कर्ण की जगह अर्जुन के गले में वरमाला डाल दी ?
दरअसल स्वयंबर से पूर्व द्रोपदी इस बात से अपरिचित थी की कर्ण ( karna ) एक सूत पूत्र है तथा यह बात द्रोपदी को अपनी एक दासी से पता चली. अब यदि द्रोपदी कर्ण ( karna ) से विवाह करती तो उसके परिवार को अनेको लांछनों का समाना करना पड़ता अतः अपने परिवार के सम्मान को बचाने के लिए द्रोपदी को न चाहते हुए भी कर्ण के साथ विवाह के प्रस्ताव को ठुकराना पड़ा.
द्रोपदी के स्वयम्बर में महाराज द्रुपद ने यह शर्त रखी थी की जो भी वीर पुरुष सामने रखे धनुष को उठाकर, उसमे डोर चढ़ाकर उपर घूम रही मछली के आँखों में निशाना लगाएगा वही मेरी पुत्री से विवाह करने योग्य होगा.
परन्तु यह प्रतिस्प्रथा इतनी आसान नहीं थी जितनी लग रही थी. वास्तविकता में जो धनुष स्वयम्बर के लिए रखा गया था वह एक विशेष धातु से बना हुआ था जिस कारण उसका वजन बहुत अधिक हो गया था,
जिसे उठाने के लिए हाथी जितने बल की आवश्यकता पड़ती. तथा मछली की आँखों में निशाना निचे तेल से भरे बर्तन में मछली की परछाई देख कर लगाना था. इसके आलावा निशाने के लिए केवाल एक ही बाण का प्रयोग किया जा सकता था.
इस प्रकार के शर्त को पूरा करने का सामर्थ्य अर्जुन के अलावा केवल कर्ण ( karna ) के पास था. क्योकि धनुर्विद्या में वे अर्जुन के समान कुशाल थे, केवल कुशल ही नहीं कई बार उन्हें अर्जुन से ज्यादा सामर्थ्यावान माना गया है.
कर्ण ( karna ) स्वयम्बर में रखी गई शर्त को पूरा करने के लिए उठे तथा उन्होंने उस अत्यधिक वजनी धनुस को एक ही बार में उठा लिया. उनके इस पराक्रम को देख सभा में सभी आश्चर्यचकित रह गए. उधर द्रोपदी जानती थी की कर्ण ( karna ) स्वयंबर में रखे गए शर्त को अवश्य ही पूरा कर लेंगे. और वह ऐसा चाहती थी परन्तु अपने परिवार के सम्मान को ध्यान में रख द्रोपदी ने कर्ण को अपमानित कर उन्हें स्वयंबर की शर्त पूरी करने से रोक दिया.
जैसे ही कर्ण ( karna ) मछली की आँख में निशाना लगाने वाले थे. उसी समय द्रोपदी उठी और उसने उच्ची आवाज में चिल्लाते हुए कहा ” में एक सूत पुत्र से विवाह नहीं कर सकती “, द्रोपदी की इस बात को सुन सभा में उपस्थित सभी व्यक्ति हसने लगे. कर्ण द्रोपदी द्वारा किये गए अपने इस अपमान को सहन नहीं कर पाये तथा उसी समय स्वयम्बर को छोड़ वहां से चले गए.
द्रोपदी द्वार हुए अपमान के कारण कर्ण ने विवाह का विचार ही छोड़ दिया था परन्तु अपने पिता के जिद के कारण उनके दो विवाह हुए. उनकी पहली पत्नी का रुषाली थी तथा दूसरी पत्नी सुप्रिया थी. अपनी दोनों पत्नियों से कर्ण को नौ पुत्रों की प्राप्ति हुई. सुप्रिया का वर्णन महाभारत में बहुत ही कम हुआ है.
वृशसेन, वृशकेतु, चित्रसेन, सत्यसेन, सुशेन, शत्रुंजय, द्विपात, प्रसेन और बनसेन ये कर्ण के नौ पुत्र थे. कर्ण ( karna ) के सभी पुत्र महाभारत के युद्ध में शामिल हुए, जिनमें से 8 वीरगति को प्राप्त हो गए. प्रसेन की मौत सात्यकि के हाथों हुई, शत्रुंजय, वृशसेन और द्विपात की अर्जुन, बनसेन की भीम, चित्रसेन, सत्यसेन और सुशेन की नकुल के द्वारा मृत्यु हुई थी.
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द्रोपदी द्वार हुए अपमान के कारण कर्ण ने विवाह का विचार ही छोड़ दिया था परन्तु अपने पिता के जिद के कारण उनके दो विवाह हुए. उनकी पहली पत्नी का रुषाली थी तथा दूसरी पत्नी सुप्रिया थी. अपनी दोनों पत्नियों से कर्ण को नौ पुत्रों की प्राप्ति हुई. सुप्रिया का वर्णन महाभारत में बहुत ही कम हुआ है.
वृशसेन, वृशकेतु, चित्रसेन, सत्यसेन, सुशेन, शत्रुंजय, द्विपात, प्रसेन और बनसेन ये कर्ण के नौ पुत्र थे. कर्ण ( karna ) के सभी पुत्र महाभारत के युद्ध में शामिल हुए, जिनमें से 8 वीरगति को प्राप्त हो गए. प्रसेन की मौत सात्यकि के हाथों हुई, शत्रुंजय, वृशसेन और द्विपात की अर्जुन, बनसेन की भीम, चित्रसेन, सत्यसेन और सुशेन की नकुल के द्वारा मृत्यु हुई थी.
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