Tuesday, February 16, 2016

4> उर्वशी ने क्यों दिया अर्जुन को नपुंसक होने का श्राप ? -

4>|| *उर्वशी***( 1 to 1 )

1>------------------उर्वशी ने क्यों दिया अर्जुन को नपुंसक होने का श्राप ? -
2>------------------क्या द्रोपदी थी अभिमन्यु के वध का कारण ? 

3>-----------------दुर्योधन की मृत्यु के समय=


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1>उर्वशी ने क्यों दिया अर्जुन को नपुंसक होने का श्राप ? -

Hindi Mahabaharta Story- Why Urvashi cursed Arjuna? यह प्रसंग पांडवों के वनवास के समय का है। अपने वनवास के समय एक बार पांडव वेदव्यास जी के आश्रम में पहुंचे और उन्हें अपना दुःख बताया। युधिष्ठर ने वेदव्यास जी से प्रार्थना करी की वो उन्हें अपना राज्य पुनः प्राप्त करने का कोई उपाय बताए। तब वेदव्यास जी ने कहा की पुनः अपना राज्य प्राप्त करने के लिए तुम्हे दिव्य अस्त्रों की आवश्यकता पड़ेगी क्योंकि कौरवो के पास भीष्म, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, कर्ण जैसे महारथी है। अतः बिना दिव्य अस्त्र प्राप्त किये तुम उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकते। युधिष्ठर के यह पूँछने पर की वो देवताओं से यह दिव्य अस्त्र कैसे प्राप्त करे, वेदव्यास जी ने कहा की आप सब में केवल अर्जुन ही देवताओं को प्रसन्न करके दिव्यास्त्र प्राप्त कर सकते है। अतः अर्जुन को देवताओं को तपस्या करके प्रसन्न करना चाहिए।

अर्जुन गए तपस्या करने
वेदव्यास जी के ऐसे वचन सुनकर अर्जुन तपस्या करने के लिए आगे अकेले ही रवाना हो गए। अर्जुन उत्तराखंड के पर्वतों को पार करते हुये एक अपूर्व सुन्दर वन में जा पहुँचे। वहाँ के शान्त वातावरण में वे भगवान की शंकर की तपस्या करने लगे। उनकी तपस्या की परीक्षा लेने के लिये भगवान शंकर एक भील का वेष धारण कर उस वन में आये। वहाँ पर आने पर भील रूपी शिव जी ने देखा कि एक दैत्य शूकर का रूप धारण कर तपस्यारत अर्जुन की घात में है। शिव जी ने उस दैत्य पर अपना बाण छोड़ दिया। जिस समय शंकर भगवान ने दैत्य को देखकर बाण छोड़ा उसी समय अर्जुन की तपस्या टूटी और दैत्य पर उनकी दृष्टि पड़ी। उन्होंने भी अपना गाण्डीव धनुष उठा कर उस पर बाण छोड़ दिया। शूकर को दोनों बाण एक साथ लगे और उसके प्राण निकल गये।

शूकर के मर जाने पर भीलरूपी शिव जी और अर्जुन दोनों ही शूकर को अपने बाण से मरा होने का दावा करने लगे। दोनों के मध्य विवाद बढ़ता गया और विवाद ने युद्ध का रूप धारण कर लिया। अर्जुन निरन्तर भील पर गाण्डीव से बाणों की वर्षा करते रहे किन्तु उनके बाण भील के शरीर से टकरा-टकरा कर टूटते रहे और भील शान्त खड़े हुये मुस्कुराता रहा। अन्त में उनकी तरकश के सारे बाण समाप्त हो गये। इस पर अर्जुन ने भील पर अपनी तलवार से आक्रमण कर दिया। अर्जुन की तलवार भी भील के शरीर से टकरा कर दो टुकड़े हो गई। अब अर्जुन क्रोधित होकर भील से मल्ल युद्ध करने लगे। मल्ल युद्ध में भी अर्जुन भील के प्रहार से मूर्छित हो गये।
देवताओं ने दिए अर्जुन को दिव्यास्त्र
थोड़ी देर पश्चात् जब अर्जुन की मूर्छा टूटी तो उन्होंने देखा कि भील अब भी वहीं खड़े मुस्कुरा रहा है। भील की शक्ति देख कर अर्जुन को अत्यन्त आश्चर्य हुआ और उन्होंने भील को मारने की शक्ति प्राप्त करने के लिये शिव मूर्ति पर पुष्पमाला डाली, किन्तु अर्जुन ने देखा कि वह माला शिव मूर्ति पर पड़ने के स्थान पर भील के कण्ठ में चली गई। इससे अर्जुन समझ गये कि भगवान शंकर ही भील का रूप धारण करके वहाँ उपस्थित हुये हैं। अर्जुन शंकर जी के चरणों में गिर पड़े। भगवान शंकर ने अपना असली रूप धारण कर लिया और अर्जुन से कहा, “हे अर्जुन! मैं तुम्हारी तपस्या और पराक्रम से अति प्रसन्न हूँ और तुम्हें पशुपत्यास्त्र प्रदान करता हूँ।” भगवान शंकर अर्जुन को पशुपत्यास्त्र प्रदान कर अन्तर्ध्यान हो गये। उसके पश्चात् वहाँ पर वरुण, यम, कुबेर, गन्धर्व और इन्द्र अपने-अपने वाहनों पर सवार हो कर आ गये। अर्जुन ने सभी देवताओं की विधिवत पूजा की। यह देख कर यमराज ने कहा, “अर्जुन! तुम नर के अवतार हो तथा श्री कृष्ण नारायण के अवतार हैं। तुम दोनों मिल कर अब पृथ्वी का भार हल्का करो।” इस प्रकार सभी देवताओं ने अर्जुन को आशीर्वाद और विभिन्न प्रकार के दिव्य एवं अलौकिक अस्त्र-शस्त्र प्रदान कर अपने-अपने लोकों को चले गये।

अर्जुन पहुंचे स्वर्ग
अर्जुन के पास से अपने लोक को वापस जाते समय देवराज इन्द्र ने कहा, “हे अर्जुन! अभी तुम्हें देवताओं के अनेक कार्य सम्पन्न करने हैं, अतः तुमको लेने के लिये मेरा सारथि आयेगा।” इसलिये अर्जुन उसी वन में रह कर प्रतीक्षा करने लगे। कुछ काल पश्चात् उन्हें लेने के लिये इन्द्र के सारथि मातलि वहाँ पहुँचे और अर्जुन को विमान में बिठाकर देवराज की नगरी अमरावती ले गये। इन्द्र के पास पहुँच कर अर्जुन ने उन्हें प्रणाम किया। देवराज इन्द्र ने अर्जुन को आशीर्वाद देकर अपने निकट आसन प्रदान किया।
अमरावती में रहकर अर्जुन ने देवताओं से प्राप्त हुये दिव्य और अलौकिक अस्त्र-शस्त्रों की प्रयोग विधि सीखा और उन अस्त्र-शस्त्रों को चलाने का अभ्यास करके उन पर महारत प्राप्त कर लिया। फिर एक दिन इन्द्र अर्जुन से बोले, “वत्स! तुम चित्रसेन नामक गन्धर्व से संगीत और नृत्य की कला सीख लो।” चित्रसेन ने इन्द्र का आदेश पाकर अर्जुन को संगीत और नृत्य की कला में निपुण कर दिया।
उर्वशी का अर्जुन को श्राप
एक दिन जब चित्रसेन अर्जुन को संगीत और नृत्य की शिक्षा दे रहे थे, वहाँ पर इन्द्र की अप्सरा उर्वशी आई और अर्जुन पर मोहित हो गई। अवसर पाकर उर्वशी ने अर्जुन से कहा, “हे अर्जुन! आपको देखकर मेरी काम-वासना जागृत हो गई है, अतः आप कृपया मेरे साथ विहार करके मेरी काम-वासना को शांत करें।” उर्वशी के वचन सुनकर अर्जुन बोले, “हे देवि! हमारे पूर्वज ने आपसे विवाह करके हमारे वंश का गौरव बढ़ाया था अतः पुरु वंश की जननी होने के नाते आप हमारी माता के तुल्य हैं। देवि! मैं आपको प्रणाम करता हूँ।” अर्जुन की बातों से उर्वशी के मन में बड़ा क्षोभ उत्पन्न हुआ और उसने अर्जुन से कहा, “तुमने नपुंसकों जैसे वचन कहे हैं, अतः मैं तुम्हें शाप देती हूँ कि तुम एक वर्ष तक पुंसत्वहीन रहोगे।” इतना कहकर उर्वशी वहाँ से चली गई।

जब इन्द्र को इस घटना के विषय में ज्ञात हुआ तो वे अर्जुन से बोले, “वत्स! तुमने जो व्यवहार किया है, वह तुम्हारे योग्य ही था। उर्वशी का यह शाप भी भगवान की इच्छा थी, यह शाप तुम्हारे अज्ञातवास के समय काम आयेगा। अपने एक वर्ष के अज्ञातवास के समय ही तुम पुंसत्वहीन रहोगे और अज्ञातवास पूर्ण होने पर तुम्हें पुनः पुंसत्व की प्राप्ति हो जायेगी।”
अर्जुन बने बृहन्नला
इस शाप के कारण ही अर्जुन एक वर्ष के अज्ञात वास के दौरान बृहन्नला बने थे। इस बृहन्नला के रूप में अर्जुन ने उत्तरा को एक वर्ष नृत्य सिखाया था। उत्तरा विराट नगर के राजा विराट की पुत्री थी। अज्ञातवास के बाद उत्तरा का विवाह अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु से हुआ था।
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2>क्या द्रोपदी थी अभिमन्यु के वध का कारण ? जाने महाभारत की अनसुनी कहानी !

Draupadi :-

कुरुक्षेत्र के भूमि में लड़ी गयी महाभारत के युद्ध से तो हम सभी परिचित है ( draupadi ). अपने बचपन के दिनों से ही हम पांडवो और कौरवों के मध्य हुए भीषण युद्ध के बारे में सुनते और पढ़ते आये है. महाभारत का युद्ध पांडवो और कौरवों के बीच हस्तिनापुर के सम्राज्य को लेकर उनके बीच बिगड़ते रिश्तों पर आधारित था. कौरवों के अंदर अपने चचेरे भाइयो पांडवो के लिए पनप रही ईर्ष्या ही महाभारत जैसे भयंकर युद्ध का कारण बनी.

वैसे तो लालच, ईर्ष्या, जलन आदि ने पांडवो और कौरवों को एक-दूसरे से अलग रख रखा था, परतु जब से पांडवो का विवाह पांचाल नरेश की राजकुमारी द्रोपदी ( draupadi ) से हुआ तब से पांडवो और कौरवों के मध्य कुछ ऐसे घटनाक्रम घटित हुए जिसने महाभारत जैसे भीषण युद्ध की नींव रख दी.

महाभारत ग्रन्थ में बताई गई कई घटनाएं इस बात की ओर सपष्ट संकेत करती है की कहीं न कहीं द्रोपदी( draupadi ) के कारण ही अंतत: कौरवों को उनके पापो की सजा मिला पायी और समस्त कौरवों का पांडवो द्वार महाभारत के युद्ध में अंत कर दिया गया.
हम यह तो जानते है की द्रोपदी ( draupadi ) द्वारा दुर्योधन का एक बार भरी सभा में अपमान किया था जिसके प्रतिशोध में दुर्योधन ने भी द्रोपदी ( draupadi ) का भरी सभा में चीरहरण किया था जो महाभारत के युद्ध के कारणों में से एक था.

परन्तु बहुत सी अनेक घटनाएं भी ऐसी घटित हुई है की जो यह सिद्ध करती है की द्रोपदी ( draupadi ) ने भी महाभारत के युद्ध की बुन्याद रखी थी. अर्थात जहाँ पांडव और कौरव इस युद्ध के लिए जिम्मेदार थे उतना ही द्रोपदी भी इस युद्ध के लिए कहीं न कहीं बराबर की उत्तरदायी थी. आइये जानते कौन सी वे ऐसी घटनाएं थी जो द्रोपदी ( draupadi ) को भी महाभारत के युद्ध का बराबर का जिम्मेदार बनाती है.

1= .द्रोपदी ( draupadi ) से जुडी पहली घटना जिसने महाभारत युद्ध को अंजाम दिया था, जब इंद्रप्रस्थ राज्य में युवराज युधिस्ठर का राज्याभिषेक हो रहा था तब दुर्योधन भी उस अवसर पर इंद्रप्रस्थ पहुंचा था. इंद्रप्रस्थ के महल की रचना मयदानव ने की थी.


उसने अपनी माया से उस महल की रचना इस प्रकार से की थी की कोई भी व्यक्ति वहां की हर चीजों से धोखा खा सकता था. दुर्योधन भी इसी चाल में आ गया और फर्श समझकर तालाब में गिर गया. तब दुर्योधन की उस दशा को देखकर द्रोपदी ( draupadi ) बहुत जोर से हसी और दुर्योधन पर व्यंग्य कस्ते हुए कहा की ”अंधे का पुत्र तो अंधा ही होता है” . उस समय दुर्योधन ने अपनी भरी सभा में हुए अपमान का बदला लेने का दृढ़निश्चय किया था.

2 =.इंद्रप्रस्थ में हुए अपने अपमान का बदला लेने के लिए दुर्योधन ने पांडवो को जुए के खेल के लिए आमंत्रित किया. तथा इस खेल में दुर्योधन ने अपने मामा शकुनि के मदद से पांडवो के साथ छल किया और पांडवो का सारा राज्य जीत लिया. यहाँ तक की इस खेल में पांडव द्रोपदी ( draupadi ) का सम्मान भी हार गए.

दुर्योधन अपने अपमान का बदला भुला नहीं था उसने भरी सभा में अपने भाई दुःशासन के हाथो द्रोपदी का चिर हरण करने का प्रयास किया. पांडवो सहित भीष्म, दोणाचार्य सभी मूक बने रहे कोई भी द्रोपदी( draupadi ) का सम्मान बचा नहीं पाया. उस समय द्रोपदी ( draupadi ) ने यह प्रतिज्ञा ली थी की वह तब तक अपने खुले बालों को में जुड़ा नहीं करेगी जब तक वह दुःशासन के रक्त से अपने बाल धो ना ले. द्रोपदी( draupadi ) की यही प्रतिज्ञा ने पांडवो को भी क्रोधित किया और यह भी महाभारत के युद्ध की ओर बढ़ा एक कदम साबित हुआ.

3 =.पांडव के एक चोपड़ का दाँव हारने के कारण उन्हें वनवास भी मिला था. इस वनवास के लिए जब पांडव वन की ओर जा रहे थे तब द्रोपदी ( draupadi ) भी उनके साथ गई. पांडव द्रोपदी को महल में ही रखना चाहते थे परन्तु द्रोपदी ( draupadi ) का पांडवो के साथ वनवास की लिए चलने का मुख्य कारण यह था की पांडव चाहे जिस हाल में भी रहे परन्तु उन्हें अपनी पत्नी का अपमान सदैव याद रखना होगा. अतः पांडवो को अपने अपमान का प्रतिशोध याद दिलाने के लिए द्रोपदी ( draupadi ) ने भी पांडवो के साथ वनवास को चुना.

4 .= जुए में जब अपना सब कुछ गवां कर पांडव वनवास काट रहे थे तभी एक दिन वन में शिकार को आये दुर्योधन के जीजा जयद्रथ की नजर द्रोपदी ( draupadi ) पर पड़ी. उसने द्रोपदी को अपने साथ रथ में महल ले जाने का दुशाहस किया. परन्तु पांचो पांडवो ने जयद्रथ को ऐसा करते देख लिया तथा उन्होंने उसे पकड़कर बंधी बना लिया.
जब अर्जुन जयद्रध का वध करने के लिए आगे बढ़ा तो द्रोपदी ( draupadi ) ने अर्जुन को ऐसा करने से किसी तरह रोक लिया तथा जयद्रध का सर मुड़वाकर उसे पांच चोटी रखने की सजा दे दी. अब जयद्रध किसी को मुंह दिखाने के लायक नहीं रह गया था तथा अपने इसी अपमान का प्रतिशोध लेने के लिए जयद्रध ने महभारत युद्ध में चक्रव्यूह में फसे अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु का वध किया था.

5 .=द्रोपदी ( draupadi ) के पिता ने दोणाचार्य के वध की प्रतिज्ञा ले रखी थी और वह यह जानते थे की अर्जुन के अल्वा कोई अन्य द्रोण का वध नहीं कर सकता अतः उन्होंने अपनी पुत्री द्रोपदी ( draupadi ) का विवाह पांडवो से करवाया था.

6= . द्रोपदी कर्ण से विवाह करना चाहती परन्तु कर्ण के सूतपुत्र होने के कारण ऐसा सम्भव नहीं हो पाया. तथा द्रोपदी के स्वयम्बर में कर्ण का अपमान हो गया जिसके प्रतिशोध के लिए कर्ण ने भी द्रोपदी ( draupadi ) के चीर हरण के दौरान द्रोपदी ( draupadi ) की रक्षा करने की जगह यह कह दिया की ” जिस स्त्री के पांच पति हो सकते है उसका किया सम्मान”. इस बात से द्रोपदी को बहुत ठेस पहुंची और उसने पांडवो को महाभारत जैसे युद्ध के लिए उकसाया.
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3>दुर्योधन की मृत्यु के समय=


दुर्योधन की मृत्यु के समय श्रीकृष्ण ने किया था इस रहस्य का खुलासा, पांडव एवं उनकी सम्पूर्ण सेना सिर्फ एक दिन में ही हो सकती थी पराजित !
महाभारत के युद्ध समाप्ति के बाद जब कुरुक्षेत्र के मैदान में दुर्योधन मरणासन अवस्था में अपनी अंतिम सासे ले रहा था तब भगवान श्री कृष्ण उससे मिलने गए. हालाँकि भगवान श्री कृष्ण को देख दुर्योधन क्रोधित नहीं हुआ परन्तु उसने श्री कृष्ण को ताने जरूर मारे.

श्री कृष्ण ने दुर्योधन से उस समय कुछ न कहा परन्तु जब वह शांत हुआ तब श्री कृष्ण ने दुर्योधन को उसकी युद्ध में की गई उन गलतियों के बारे में बताया जो वह न करता तो आज महाभारत का युद्ध वह जीत चुका होता.

 कुरुक्षेत्र में लड़े गए युद्ध में कौरवों के सेनापति पहले दिन से दसवें दिन तक भीष्म पितामह थे, वहीं ग्याहरवें से पंद्रहवे तक गुरु दोणाचार्य ने ये जिम्मेदारी संभाली. लेकिन द्रोणाचार्य के मृत्यु के बाद दुर्योधन ने कर्ण को सेनापति बनाया.

यही दुर्योधन के महाभारत के युद्ध में सबसे बड़ी गलती थी इस एक गलती के कारण उसे युद्ध में पराजय का मुख देखना पड़ा. क्योकि कौरवों सेना में स्वयं भगवान शिव के अवतार मौजूद थे जो समस्त सृष्टि के संहारक है.
अश्वथामा ( ashwathama ) स्वयं महादेव शिव के रूद्र अवतार है और युद्ध के सोलहवें दिन यदि दुर्योधन कर्ण के बजाय अश्वथामा ( ashwathama ) को सेनापति बना चुका होता तो शायद आज महाभारत के युद्ध का परिणाम कुछ और ही होता.

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इसके साथ ही दुर्योधन ने अश्वथामा ( ashwathama ) को पांडवो के खिलाफ भड़काना चाहिए था जिससे वह अत्यधिक क्रोधित हो जाए. परन्तु कहा जाता है की ”विनाश काले विपरीत बुद्धि ” दुर्योधन अपने मित्र प्रेम के कारण इतना अंधा हो गया था की अश्वथामा ( ashwathama ) अमर है यह जानते हुए भी उसने कर्ण को सेनापति चुना.

 कृपाचार्य अकेले ही एक समय में 60000 योद्धाओं का मुकाबला कर सकते थे लेकिन उनका भांजा ( कृपाचर्य की बहन कृपी अश्वथामा की बहन थी ) अश्वथामा ( ashwathama ) में इतना समार्थ्य था की वह एक समय में 72000 योद्धाओं के छक्के छुड़ा सकता था.

अश्वथामा ( ashwathama ) ने युद्ध कौशल की शिक्षा केवल अपने पिता से ही गृहण नहीं करी थी बल्कि उन्हें युद्ध कौशल की शिक्षा इन महापुरषो परशुराम, दुर्वासा, व्यास, भीष्म, कृपाचार्य आदि ने भी दी थी.

ऐसे में दुर्योधन ने अश्वथामा ( ashwathama ) की जगह कर्ण को सेनापति का पद देकर महाभारत के युद्ध में सबसे बड़ी भूल करी थी.
भगवान श्री कृष्ण के समान ही अश्वथामा भी 64 कलाओं और 18 विद्याओं में पारंगत था.

युद्ध के अठारहवे दिन भी दुर्योधन ने रात्रि में उल्लू और कौवे की सलाह पर अश्वथामा ( ashwathama ) को सेनापति बनाया था. उस एक रात्रि में ही अश्वथामा ( ashwathama ) ने पांडवो की बची लाखो सेनाओं और पुत्रों को मोत के घाट उतार दिया था.

अतः अगर दुर्योधन ऐसा पहले कर चुका होता था तो वह खुद भी न मरता और पांडवो पर जीत भी दर्ज कर चुका होता, हालाँकि यह काम अश्वथामा( ashwathama ) ने युद्ध की समाप्ति पर किया था. जब अश्व्थामा( ashwathama ) का यह कार्य दुर्योधन को पता चला था तो उसे शकुन की मृत्यु प्राप्त हुई थी.
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